रिपोर्ट : LegendNews
वो 3 कलंक कौन से हैं जिन्हें शीघ्र मथुरा के माथे से नहीं मिटाया तो नियंत्रण से बाहर होंगे हालात!
कभी मधु नामक दानव के आधिपत्य वाली मधुपुरी (मथुरा) पर त्रेता युग में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के अनुज शत्रुघ्न ने उसके पुत्र लवणासुर को मारकर धर्म का शासन स्थपित किया था।
द्वापर युग में भगवान विष्णु के आठवें अवतार श्रीकृष्ण ने अत्याचारी शासक कंस का वध कर उसके पिता उग्रसेन को मथुरा का राजा बनाया।
अब कलियुग चल रहा है। आधुनिक काल-गणना के अनुसार कलियुग का प्रारंभ 3102 ईसा पूर्व से हुआ था। यानी करीब 5 हजार साल पहले। दुर्भाग्य से इस युग में मथुरा के माथे पर एक-दो नहीं, तीन-तीन कलंक लग चुके हैं किंतु इन्हें मिटाने को कोई सूत्रधार सामने नजर नहीं आ रहा।
पहले जान लें कि ये तीनों कलंक कौन-कौन से हैं और इनका मथुरा के माथे से हटना अत्यंत आवश्यक क्यों है।
सबसे बड़ा और पहला कलंक है यमुना का प्रदूषण
मथुरा के माथे पर लगा सबसे बड़ा और पहला कलंक है यमुना का प्रदूषण। करोड़ों आस्थावान जिसे यमुना मैया कहते हैं, वह नदी आज मृतप्राय है। कृष्ण की पटरानी कहलाने वाली कालिंदी (यमुना) में आज जल के नाम पर जो दिखाई दे रहा है वो सिर्फ नाले-नालियों का दूषित पानी और कल-कारखानों का अपशिष्ट है।
1998 में पहली बार यमुना को प्रदूषण मुक्त किए जाने को लेकर इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कुछ दिशा-निर्देश जारी किए थे। इसके लिए कोर्ट ने मथुरा में एडीएम स्तर के एक अधिकारी को नोडल अधिकारी की हैसियत से तमाम अधिकार भी दिए। 25 साल बीत गए किंतु हाईकोर्ट के आदेश-निर्देश किसी काम नहीं आए।
पांच दशक पहले मथुरा के दरेसी रोड पर जो स्लॉटर हाउस संचालित किया जाता था, वो सरकारी फाइलों पर तो बंद दिखा दिया गया लेकिन हकीकत में यहां पशुओं का कटान कभी नहीं रुका।
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने यमुना को प्रदूषण मुक्त रखने के लिए जो कार्य बहुत जरूरी बताए थे, उनमें मथुरा के स्लॉटर हाउस पर पूरी तरह ताला लगाया जाना भी शामिल था। तब इस स्लॉटर हाउस में जो पशु कटान होता था, उसकी परमीशन नगर पालिका से लेनी होती थी और उसके लिए बाकायदा एक संख्या निर्धारित थी किंतु आज अनगिनत पशु कटते हैं क्योंकि अब किसी परमीशन की जरूरत नहीं रह गई। जरूरत है तो सिर्फ सक्षम अधिकारियों से सेटिंग की, जिसे करना कोई कठिन काम नहीं है।
शिकायत होने पर कभी-कभी पशुओं के मांस से भरे वाहन पकड़े जाते हैं परंतु आज तक उसके लिए किसी को कोई सजा मिली हो, ऐसा उदाहरण भी देखने को नहीं मिला।
इसी तरह हाई कोर्ट ने कल-कारखानों का कचरा और नाले-नालियों की गंदगी यमुना में गिरने से रोकने की मुकम्मल व्यवस्था करने का भी आदेश प्रशासन को दिया था लेकिन कोर्ट के ये आदेश कब विभिन्न विभागों एवं वहां तैनात अधिकारियों की अतिरिक्त आमदनी का स्थायी जरिया बन गए, आम लोगों को पता ही नहीं चल पाया।
पता है तो सिर्फ इतना कि यमुना एक्शन प्लान के नाम पर 25 सालों में रिलीज किया गया करोड़ों रुपया भ्रष्टाचारियों की भेंट चढ़ चुका है।
आज स्थिति यह है कि यमुना मैया एक ऐसा चुनावी मुद्दा भर है जो नामांकन दाखिल करने से पहले उम्मीदवार के काम आता है। मथुरा से चुनाव मैदान में उतरने वाले उम्मीदवार पर्चा भरने से पहले यमुना का पूजन करना नहीं भूलते ताकि भावनाओं को भुनाया जा सके। उसके बाद उन्हें यमुना की ओर आंख उठाकर देखना गवारा नहीं होता।
दूसरा बड़ा कलंक है श्रीकृष्ण जन्मस्थान को लेकर विवाद
मथुरा के माथे पर लगा दूसरा बड़ा कलंक है श्रीकृष्ण जन्मस्थान को लेकर विवाद। रामजन्म भूमि के विवाद का सुप्रीम कोर्ट से निपटारा हो जाने के बाद बेशक मथुरा का मामला चर्चा में है लेकिन ऐसा लग नहीं रहा कि जल्द ये विवाद खत्म होगा। लंबी कानूनी प्रक्रिया और कोर्ट दर कोर्ट सुनवाई का सिलसिला कितने वर्षों तक जारी रहेगा, इसकी समय-सीमा शायद ही कोई निर्धारित कर सके लिहाजा ''कालिंदी की तरह कृष्ण भी कानून के फेर में फंसे हुए हैं।''
तुष्टीकरण की राजनीति और कट्टरपंथी सोच चूंकि किसी विवाद को मिल-बैठकर हल करने का कोई मौका नहीं देती, इसलिए यह उम्मीद करना निरर्थक है कि अदालतों से बाहर इस विवाद का कोई समाधान निकलेगा। संभावना इस बात की अधिक है कि जैसे-जैसे यह मुद्दा किसी निर्णायक मोड़ पर पहुंचेगा, वैसे-वैसे इसे राजनीतिक रंग दिए जाने की कोशिशें बढ़ती जाएंगी जिससे यह लंबा खींचा जा सके।
मोक्षदायिनी सप्तपुरियों में शुमार मथुरा का कृष्ण जन्मस्थान भले ही आज उतनी दयनीय दशा को प्राप्त नहीं है जितना भव्य राम मंदिर बनने से पहले अयोध्या में राम का मंदिर था, किंतु इससे उस विवाद का महत्व कम नहीं हो जाता जिसका इतिहास आक्रातांओं के अत्याचारों से जुड़ा है।
द्वारिकाधीश की जन्मस्थली मथुरा के माथे से इस कलंक का मिटना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि न्याय पाने का अधिकार संविधान प्रदत्त है और कानून के जरिए इसे हासिल करने में कहीं कोई बुराई नहीं है। सैकड़ों साल पहले भी यदि कहीं कुछ गलत किया गया था तो उसे सुधारा जाना न्यायहित में उचित होगा।
मथुरा के माथे पर तीसरा कलंक बन चुकी है यातायात अव्यवस्था
धार्मिक पर्यटन की ओर तेजी से बढ़ते रुझान और इस कारण धार्मिक स्थलों पर बढ़ती भीड़ से मथुरा का आमजन इस समय बेहद व्यथित है। इसमें कोई दो राय नहीं इस स्थिति से रोजी-रोजगार के साधन पैदा होते हैं, लोगों को घर बैठे यह आमदनी का एक जरिया बनता है किंतु एक बड़ा वर्ग इससे अपनी सुख-शांति खो रहा है। उसका अपने ही घर से निकलना दूभर हो चुका है। जरूरी से जरूरी काम के लिए भी निकलने से पहले उसे दस बार सोचना पड़ता है कि वह कहां-कहां फंसेगा और किस-किस से उसे उलझना होगा।
वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर पर उमड़ रहे लोगों के सैलाब की सूचना तो शासन तक को है क्योंकि भीड़ के कारण दुर्घटना होना लगभग हर रोज की बात हो गई है। गोवर्धन, बरसाना और कोकिला वन के शनिदेव मंदिर पर बढ़ती भीड़ भी अब चिंता का कारण बन चुकी है किंतु प्रशासन नित नए प्लान बनाने के अलावा कुछ नहीं करता।
एक प्लान फेल होता है तो दूसरा प्लान बनाने बैठ जाते हैं। मीटिंगें बुलाई जाती है। चर्चा होती हैं परंतु स्थिति में कोई सुधार नहीं होता क्योंकि व्यवस्था में विशिष्टजन आड़े आ जाते हैं। जनता भाड़ में जाए, विशिष्टजनों को असुविधा नहीं होनी चाहिए। अधिकारियों को भी वीआईपी तथा वीवीआईपी की खिदमत में महारत हासिल है। पता नहीं, कब कौन कहां काम आ जाए। आश्चर्य इस बात का है कि विशिष्टजनों की खिदमत में व्यस्त जिला प्रशासन को अपनी जिम्मेदारी का अहसास तक नहीं होता।
वृंदावन, गोवर्धन, बरसाना और कोकिला वन के साथ-साथ अब तो जिला मुख्यालय मथुरा भी दिन-दिन भर लगने वाले जाम तथा यातायात की प्रशासनिक कुव्यवस्था से आजिज आ चुका है।
हाईवे और नेशनल हाईवे तक यातायात की अव्यवस्था के शिकार हैं। चौराहे-तिराहों और प्रमुख मार्गों पर खड़ी पुलिस मूकदर्शक बनी रहती है। उसकी रुचि यदि किसी में है तो उन बाहरी वाहनों को रोकने में जिनसे अतिरिक्त आमदनी की उम्मीद हो, बाकी आम शहरी कितनी देर से फंसा हुआ है इससे उन्हें कोई वास्ता नहीं।
डग्गेमार वाहनों पर उनकी ''कृपा'' का आलम यह है कि वह किसी भी सड़क को उनकी आंखों के सामने घेरकर खड़े हो सकते हैं। जहां चाहें वहां से सवारी भर सकते हैं और बीच सड़क पर सवारी उतार सकते हैं लेकिन उन्हें रोकने-टोकने की हिमाकत कोई नहीं कर सकता। अगर यह कहा जाए कि डग्गेमार वाहन चालक पुलिस के लिए दुधारू गाय बने हुए हैं, तो कुछ गलत नहीं होगा।
रही-सही कसर पुलिस-प्रशासन ने शहर के अंदर वनवे ट्रेफिक करके और नेशनल हाईवे अथॉरिटी ने कई-कई किलोमीटर तक कट बंद करके पूरी कर दी है। सर्विस रोड पर पुलिस के संरक्षण में व्यावसायिक वाहन खड़े हो सकते हैं लेकिन प्राइवेट वाहन निकल भी नहीं सकते क्योंकि वो इस सुविधा का शुल्क नहीं देते। पुलिस के लिए वो दूर से मोबाइल द्वारा फोटो खींचकर चालान का कोटा पूरा करने के काम आते हैं जिससे एक पंथ दो काज की कहावत पूरी होती रहे।
जो भी हो लेकिन इतना तय है कि यदि समय रहते मथुरा के माथे पर लगे इन कलंकों को मिटाने का कोई ठोस इंतजाम नहीं किया गया तो एक दिन ये ऐसे विस्फोटक हालातों के कारण बन सकते हैं जिन्हें नियंत्रित करना आसान नहीं रह जाएगा क्योंकि तब तक बहुत देर हो चुकी होगी।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी

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