योर ऑनर! इन विघ्‍नसंतोषी और छिद्रान्वेषी परजीवियों का भी कुछ इंतजाम कीजिए

एक शब्‍द है विघ्‍नसंतोषी, और एक दूसरा शब्‍द है छिद्रान्वेषी। विघ्‍नसंतोषी वो लोग होते हैं जिन्‍हें दूसरों के काम में विघ्‍न आने पर संतोष का अनुभव होता है। ये लोग स्‍वयं भी विघ्‍न डालने का काम करते हैं।
ऐसे लोगों के बारे में कहा जाता है कि वो दूसरों के दुख से ही प्रसन्‍नता को प्राप्‍त होते हैं। अपनी स्‍थिति-परिस्‍थितियों से सुख-दुख का अनुभव नहीं करते।
इसी प्रकार इंसानों में एक नस्‍ल छिद्रान्वेषियों की भी होती है। विघ्‍नसंतोषियों की तरह छिद्रान्‍वेषी लोग भी हर जगह पाए जाते हैं।
इस तरह के लोग पद वाले भी हो सकते हैं और बिना पद वाले भी। मंद बुद्धि भी हो सकते हैं और बौद्धिक अजीर्ण वाले भी। आधे-पौने होशियारों में भी यह नस्‍ल पायी जाती है और डेढ़ होशियारों में भी।
कहने का तात्‍पर्य यह है कि यह नस्‍ल सर्वत्र विद्यमान है।
ये अपने जीवन में न तो खुद कभी कोई काम सहजता से कर पाते हैं और न दूसरों की उपलब्‍धि को सहज स्‍वीकार करते हैं। हर काम को वे ऐसे सूंघते हैं, जैसे किसी सस्‍ते जासूसी उपन्‍यास के पात्र हों या फिर अपनी घ्राणशक्‍ति का इस्तेमाल करने वाले इंसान रूपी जानवर।
अयोध्‍या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला एक ओर जहां देश की बड़ी आबादी को राहत दे रहा है और वो उससे पूरी तरह संतुष्‍ट है वहीं दूसरी ओर कुछ विघ्‍नसंतोषी तथा छिद्रान्वेषी लोग पंचपरमेश्‍वर के फैसले में किंतु-परंतु करने से बाज नहीं आ रहे।
कोर्ट के डंडे का डर इन्‍हें इनकी जुबान को लगाम में रखने पर बाध्‍य न करता तो ये मुंह के अंदर भरे पेट्रोल से आग लगाने का काम कर रहे होते।
जैसे इसी नस्‍ल के एक व्‍यक्‍ति ने कोर्ट के निर्णय को स्‍वीकार करते हुए यह कहकर अस्‍वीकार किया कि वकील के तौर पर उसे उसमें खोट दिखाई देता है। उसके कहने का मकसद यदि समझें तो वो सर्वोच्‍च न्‍यायालय के पांच-पांच विद्वान न्‍यायाधीशों से अधिक योग्‍यता रखता है और मौका मिला तो पिटीशन दायर करने से पीछे नहीं हटेगा।
बौद्धिक अजीर्णता के शिकार नस्‍ल वाले एक अन्‍य व्‍यक्‍ति ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले में मस्‍जिद के लिए जमीन मुहैया कराने के आदेश को ‘खैरात’ बता डाला। जैसे सुप्रीम कोर्ट का काम खैरात बांटना रह गया हो।
इस व्‍यक्‍ति के अनुसार वह भीख मांगकर 5 एकड़ जमीन खरीद सकता है।
हो सकता है कि उसे इसका कोई पूर्व अनुभव हो किंतु फिर भी समझना चाहिए कि दर-दर भीख मांगने से सुप्रीम कोर्ट की खैरात कहीं ज्‍यादा उचित है क्‍योंकि सुप्रीम कोर्ट ने यह काम करने का आदेश सरकार को दिया है और सरकार हर देशवासी की है।
देश अगर देशवासियों के लिए कुछ करता है तो वो खैरात नहीं होती, कर्तव्‍य होता है। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से कर्तव्‍य निर्वहन करने को ही कहा है, इसके अलावा कुछ नहीं कहा।
ऐसे ही एक तथाकथित इतिहासकार की सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर जो टिप्‍पणी आई है, उसके मुताबिक कानून की आड़ में आस्‍था को तरजीह दी गई है। उनके अनुसार पुरातत्‍व विज्ञान ही दोषपूर्ण है।
इन महाशय का दावा है कि एएसआई ने अयोध्या विवाद में हमेशा संदेहास्पद भूमिका निभाई है। एएसआई ने जो खुदाई की, वो पहले से बनी एक मान्यता के साथ की। इसने उन सबूतों को दबा दिया, जो मंदिर की थ्योरी को काटते थे। इन विघ्‍नसंतोषियों में सुप्रीम कोर्ट के ही एक पूर्व जस्‍टिस भी शामिल हैं।
वो कहते हैं, ”अल्पसंख्यकों ने पीढ़ियों से देखा कि वहां एक मस्जिद थी। मस्जिद तोड़ी गई। अब सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के अनुसार वहां एक मंदिर बनेगा। इस फ़ैसले ने मेरे मन में एक शक पैदा किया है। संविधान के एक स्टूडेंट के तौर पर मुझे इसे स्वीकार करने में थोड़ी दिक़्क़त हो रही है।”
उनका यह भी कहना है कि ”1856-57 में भले नमाज़ पढ़ने के सबूत न मिले हों लेकिन 1949 से यहां नमाज़ पढ़ी गई है। यह सबूत है। हमारा संविधान जब अस्तित्व में आया तो नमाज़ यहां पढ़ी जा रही थी। एक वैसी जगह जहां नमाज़ पढ़ी गई और अगर उस जगह पर एक मस्जिद थी तो फिर अल्पसंख्यकों को अधिकार है कि वो अपनी धार्मिक स्वतंत्रता का बचाव करें। यह संविधान में लोगों को मौलिक अधिकार मिला हुआ है।” सुप्रीम कोर्ट क्या इस बात को भूल जाएगा कि जब संविधान आया तो वहां एक मस्जिद थी? संविधान में प्रावधान हैं और सुप्रीम कोर्ट की ज़िम्मेदारी है कि वो उसकी रक्षा करे।”
सवा सौ करोड़ से अधिक की आबादी वाले इस देश में ये अथवा इनके जैसे और चंद लोगों की टीका-टिप्‍पणी को खारिज करने या उन पर ध्‍यान न देने की सलाह देने वाले भी कम नहीं हैं। इन सलाहकारों की बात पहली नजर में भले ही बड़ी उपयुक्‍त लगती हो परंतु उपयुक्‍त है नहीं।
वो इसलिए कि बड़े से बड़े तालाब के शांत पानी में हलचल मचाने को किसी के भी द्वारा उछाला गया एक कंकड़ काफी होता है। उस कंकड़ से पानी में उठने वाली तरंगें न सिर्फ दूर तक जाती हैं बल्‍कि जलचरों को प्रभावित भी करती हैं।
खा-खाकर अघाये हुए ये सो कॉल्‍ड बुद्धिजीवी, माना कि संख्‍याबल में नगण्‍य हैं परंतु ये परजीवियों की भांति इतने भर से अपनी खुराक पूरी कर लेते हैं और उनकी यही खुराक देश के लिए घातक है।
बेशक अयोध्‍या पर अंतिम फैसला आ चुका है, किंतु अभी बहुत से फैसलों की देश को दरकार है। कुछ सरकार के स्‍तर से लिए जाने हैं तो कुछ कोर्ट से होने हैं लिहाजा जरूरी हो जाता है कि ऐसे विघ्‍नसंतोषियों, छिद्रान्‍वेषियों और परजीवियों के मुंह पर सख्‍त लगाम लगाई जाए।
हो सकता है कि वो लोकतंत्र की दुहाई दें, अभिव्‍यक्‍ति की स्‍वतंत्रता का रोना रोएं, मानवाधिकार हनन का ढिंढोरा पीटें किंतु उनका कोई अधिकार उस कर्तव्‍य से बड़ा नहीं हो सकता जो देश को एकसूत्र में पिरोने के लिए अत्‍यंत आवश्‍यक है। इसलिए सरकार और कोर्ट दोनों को इनके अनर्गल प्रलाप पर पाबंदी लगाने का कोई ऐसा मुकम्‍मल इंतजाम करना चाहिए जो भविष्‍य के लिए नजीर बन सके और जिसके बाद कोई कुछ भी बोलने से पहले दस बार सोचने को मजबूर हो।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

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