यमुना मैया कहे पुकार, हर प्रत्याशी धोखेबाज़

पतित पावनी यमुना, जीवन दायिनी यमुना, कलकल करती यमुना और अब दिन-प्रतिदिन कलुषित होती यमुना। कालिंदी और कृष्ण ही हैं समूचे विश्व में मथुरा की पहचान। कभी कालिया रूपी नाग के कलुष से कालिंदी को मुक्‍त कराने वाले कृष्ण भी आज कलियुग के कालियाओं से जैसे हार मान बैठे हैं। बावजूद इसके यमुना का धार्मिक महत्व कम होता दिखाई नहीं देता। तभी तो लोकतंत्र के हर पर्व पर विभिन्न राजनीतिक दल व उनके प्रत्याशी यमुना के धार्मिक महत्व और उससे जुड़ी जनभावनाओं को भुनाने में पीछे नहीं रहते।
जन्म-जन्मातरों के पापों से मुक्ति दिलाने वाली करोड़ों जनमानस की आराध्य यमुना अब चुनावी नैया पार कराने का जरिया बन चुकी है। ये बात अलग है कि चुनावी मौसम में अंजुलि भरकर यमुना को प्रदूषण मुक्‍त कराने का संकल्प लेने वाले नेता चुनाव बीत जाने के बाद उसकी ओर पलटकर देखना तक गवारा नहीं करते।
एकबार फिर लोकतंत्र का पर्व विधानसभा चुनावों के रूप में सामने है। एकबार फिर यमुना पूजन करके पर्चा दाखिल करने वाले विभिन्‍न राजनीतिक दलों के उम्‍मीदवार चुनावी वैतरिणी पार करने को सक्रिय हैं, किंतु इस बार एक फर्क है। फर्क यह है कि अब किसी भी दल के प्रत्यााशी पर आम जनता का भरोसा नहीं रहा। पिछले विधानसभा चुनावों तक जो थोड़ा-बहुत भरोसा कायम था, वह भी अब पूरी तरह उठ चुका है। हालांकि पिछली बार किसी प्रत्यााशी को यमुना पूजन कराने के लिए कोई पुरोहित खड़ा नहीं हुआ। हुआ तो इतना कि जिस दिन विधायक प्रदीप माथुर यमुना पूजन करने जा रहे थे, उस दिन उनके खिलाफ यमुना किनारे पोस्टर चस्पा किए गए, बाद में पुलिस द्वारा वो पोस्टर बलपूर्वक हटवा दिए गए।
प्रदीप माथुर के खिलाफ पोस्टर चस्पा किए जाने की वजह शायद यह रही कि यमुना को प्रदूषण मुक्‍त कराने में लगे लोगों को सर्वाधिक उम्मीद उन्हीं से थी, लेकिन कई बार विधायक बनने के बाद भी उन्होंने यमुना के लिए कुछ नहीं किया।
करीब आठ साल पहले की बात है, जब केंद्र में प्रदीप माथुर की पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार काबिज हुआ करती थी। तब यमुना को प्रदूषण मुक्त कराने के लिए बाबा जयकृष्ण दास ने हजारों लोगों के साथ मथुरा से दिल्ली कूच किया था। बाबा जयकृष्ण दास के नेतृत्व में यमुना भक्तों की इस फौज को आगे बढ़ते देख एकबार तो केंद्र सरकार के भी हाथ-पैर फूल गए थे लेकिन फिर उसने इस फौज को पीछे धकेलने के लिए अपनी बिसात बिछानी शुरू की, और उसके लिए मोहरा बनाया गया उस समय के कांग्रेसी विधायक प्रदीप माथुर को।
प्रदीप माथुर ने बाबा जयकृष्ण दास के सामने तत्‍कालीन केंद्रीय जल संसाधन मंत्री हरीश रावत से वार्तालाप कर यमुना को प्रदूषण मुक्त कराने का कथित ठोस प्रस्ताव पेश किया, जिसे बाबा ने सहर्ष स्वीकार कर लिया। बाबा जयकृष्ण दास को जाल में फंसता देखते ही प्रदीप माथुर और केंद्र सरकार के दूसरे नुमाइंदों ने बाबा को इस बात पर राजी कर लिया कि वह अपने साथ चल रहे लोगों को आश्वस्त कर लौटने को कहेंगे। हुआ भी यही, लिहाजा फरीदाबाद पहुंचते-पहुंचते यमुना भक्तों का कारवां बिखर चुका था। केंद्र सरकार और उनके कांग्रेसी नुमाइंदों की चाल कामयाब हो चुकी थी, जबकि बाबा जयकृष्णद दास किसी भी चाल से पूरी तरह अनभिज्ञ थे।
दिखावे के लिए बाबा सहित कुछ चुनिंदा लोगों की केंद्रीय जल संसाधन मंत्री हरीश रावत से मीटिंग कराई गई और इस मीटिंग में यमुना को प्रदूषण मुक्त कराने का पूरा खाका भी खड़ा किया गया।
दरअसल, यह खाका ही यमुना एवं यमुना के लिए आंदोलनरत लोगों के खिलाफ एक ऐसा षड्यंत्र था जिसके कारण यमुना को प्रदूषण मुक्त कराने का पूरा आंदोलन न सिर्फ ठप्प पड़ गया बल्कि वह पहले दोफाड़ हुआ और फिर कई फाड़ होकर लक्ष्य से ही भटक गया।
उधर, वर्ष 2009 के लोकसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी के सहयोग से राष्ट्रीय लोकदल के युवराज जयंत चौधरी अपना पहला चुनाव मथुरा से लड़ने उतरे। जयंत चौधरी ने विश्राम घाट पर हजारों लोगों की मौजूदगी में यमुना को प्रदूषण मुक्त कराने का संकल्प लिया, वह लाखों मत के अंतर से चुनाव जीते भी, परंतु यमुना के लिए कुछ नहीं कर पाए। चुनावों के दौरान मथुरा की जनता से यहीं घर बसाकर रहने का वायदा करने वाले जयंत चौधरी ने चुनाव जीतने के बाद न जनता की सुध ली और न यमुना की। उनके अपने लोग भी उनसे एक मुलाकात को पूरे पांच साल तरसते रहे। भाजपा के सहयोग से चुनाव जीतने वाले जयंत चौधरी के पिता व उनकी पार्टी रालोद के मुखिया चौधरी अजीत सिंह ने इस बीच कांग्रेस से पैक्ट करके अपने लिए जरूर केंद्र में मलाईदार मंत्रीपद हासिल कर लिया और सत्तासुख भोगते रहे।
यही कारण रहा कि 2014 और फिर 2019 के लोकसभा चुनावों में भाजपा की प्रत्याशी तथा बॉलीवुड में स्वप्न सुंदरी का खिताब प्राप्त अभिनेत्री हेमा मालिनी भारी मतों से विजयी रहीं।
मथुरा की जनता ने नरेन्द्र मोदी के चेहरे पर अभिनेत्री हेमा मालिनी को दो मर्तबा बड़ी जीत दिलाई, बावजूद इसके हेमा मालिनी भी दूसरे नेताओं की तरह यमुना के साथ छलावा करने से नहीं चूकीं।
2014 में हेमा मालिनी को जिताने की अपील करने मथुरा आए खुद नरेन्द्र मोदी ने चुनावी रैली में यमुना प्रदूषण का मुद्दा उठाया और ब्रजवासियों को भरोसा दिया कि यदि सत्ता उनके पास आती है तो वह प्राथमिकता के आधार पर यमुना को प्रदूषण मुक्त कराने का काम करेंगे। उनकी अपील पर हेमा मथुरा से दो बार सांसद चुनी गईं और खुद मोदी भी तब से लगातार प्रधानमंत्री के पद पर काबिज हैं लेकिन यमुना के साथ छल किए जाने का सिलसिला अब भी नहीं टूटा।
मथुरा की सांसद हेमा मालिनी, पांच में से चार विधायक भाजपा के, इनमें से दो विधायक मंत्री, मथुरा नगर निगम के मेयर मुकेश आर्यबंधु भाजपा से और जिला पंचायत भी भाजपा का कब्‍जा, परंतु केंद्र एवं प्रदेश में सत्ताधारी दल के नेताओं की इतनी बड़ी फौज भी नाले-नालियों का गंदा पानी आज तक सीधा यमुना के अंदर गिरने से नहीं रोक सकी।
अब इन चुनावों में मथुरा-वृंदावन विधानसभा सीट पर फिर से भाजपा ने ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा को चुनाव मैदान में उतारा है जबकि उनके सामने हैं कांग्रेस के रटे-रटाए चेहरे प्रदीप माथुर, भाजपा से बगावत करके उतरे बहुजन समाज पार्टी के प्रत्याशी एसके शर्मा।
पिछले पूरे कार्यकाल में कबीना मंत्री श्रीकांत शर्मा यूं तो एक रस्म अदायगी की तरह यमुना को प्रदूषण मुक्त कराने की बात कहीं-कहीं करते सुनाई पड़ते रहे लेकिन उनकी बात में किसी स्तर पर दम नजर नहीं आया
रहा सवाल बसपा के प्रत्याशी एसके शर्मा का, तो वह जरूर यमुना को प्रदूषण मुक्‍त कराने का वायदा कर रहे हैं किंतु कौन नहीं जानता कि वर्तमान परिस्‍थितियों में बसपा प्रत्‍याशी की हैसियत से उनका वादा किसी मजाक से कम नहीं है। वैसे उनकी पार्टी ने पहले भी कभी यमुना को प्रदूषण मुक्त कराने के किसी प्रयास में कोई रुचि नहीं दिखाई।
शहरी सीट के इतर अन्य चार सीटों गोवर्धन, मांट, छाता तथा बल्देव में अपना भाग्य आजमा रहे प्रत्याशी तो यमुना को प्रदूषण मुक्त कराने के वायदे से भी खुद को पूरी तरह अलग रखते हैं। उनको लगता है कि यमुना के बारे में बात करना सिर्फ और सिर्फ मथुरा-वृंदावन क्षेत्र के विधायक की जिम्मेदारी है अन्यथा मांट क्षेत्र से 8 बार विधायक रहे श्याम सुंदर शर्मा का चुनावी क्षेत्र मांट भी यमुना किनारे बसा हुआ है छाता क्षेत्र की विधायकी से कबीना मंत्री तक की कुर्सी हासिल करने वाले चौधरी लक्ष्मीानाराण का चुनाव क्षेत्र भी यमुना की खादरों का हिस्सा है।
बल्देव (सुरक्षित) से पिछली बार भाजपा की टिकट पर लड़कर चुनाव जीतने वाले पूरन प्रकाश इस बार भी भाजपा के उम्मीमदवार हैं। बल्देव क्षेत्र भी यमुना से अछूता नहीं है और इसके मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा यमुना किनारे बसता है किंतु पूरन प्रकाश ने यमुना को प्रदूषण मुक्त कराने की दिशा में कभी कोई प्रयास नहीं किया।
ऐसे में गोवर्धन सीट पर चुनाव लड़ने जा रहे प्रत्‍याशियों से कोई उम्मीद कैसे की जा सकती है क्योंकि उनके अपने चुनाव क्षेत्र का यमुना से कोई सीधा संबंध नहीं है। उनके लिए यमुना प्रदूषण मुक्ति के काम से पल्ला झाड़ना बहुत आसान है।
सच तो यह है कि नेता चाहे कोई पुराना हो अथवा नया, वो जानता है कि यमुना के नाम पर जनभावनाओं का दोहन करना तथा उसकी आड़ लेकर जितने संभव हों उतने वोट बटोरना काफी आसान है इसलिए वह यमुना की बात करता है। वह खूब समझता है कि चुनाव बीत जाने के बाद यमुना प्रदूषण का मुद्दा अगले चुनाव तक के लिए ठंडे बस्ते में चला जाना है। रह-रह कर इसके लिए कोई आवाज़ यदि उठती भी है तो उसे उसी प्रकार अनसुना किया जा सकता है जिस प्रकार अब तक किया जाता रहा है।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी

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