WWW इन MATHURA ऑन New-Year

जी हां! WWW मतलब वाइन…वूमेन…और वेल्‍थ, जिनका MATHURA में New-Year पर पिछले कई वर्षों से जमकर इस्‍तेमाल होता है।
बेशक कुछ लोग आज भी ऐसे होंगे जिन्‍हें इस धार्मिक नगरी के इस बदले हुए स्‍वरूप पर आश्‍चर्य हो, संभव है कुछ को यकीन ही न आए, परंतु हकीकत यही है।
कभी भांग, भजन एवं भोजन के लिए मशहूर और यम, यमुना तथा योगीराज श्रीकृष्‍ण की पावन जन्मस्‍थली के रूप में पहचानी जाने वाली मथुरा आज अय्याशी का प्रमुख केंद्र बन चुकी है।
कछुआ, बंदर और लाल पत्‍थरों की सड़कों में से शहर के अंदरूनी हिस्‍से की शिनाख्‍त अब मात्र बंदरों के कारण होती है क्‍योंकि यमुना का प्रदूषण कछुओं को तथा विकास का अंधानुकरण लाल पत्थरों की विशिष्‍ट सड़कों को करीब दो दशक पहले निगल चुका है।
कान्‍हा की क्रीड़ास्‍थली कहलाने वाले वृंदावन में अब न वृंदा (तुलसी) दिखाई देती हैं और न वन, लिहाजा वृंदावन अपनी सार्थकता खोने को अभिशप्‍त है।
वृंदावन को नष्‍ट-भ्रष्‍ट करके खड़े किए गए फ्लैट्स, विला एवं बंगलो आज WWW यानी वाइन…वूमेन…और वेल्‍थ से सराबोर हैं।
अरावली पर्वत श्रृंखला से आच्‍छादित जो गोवर्धन कुछ समय पहले तक गुमनाम तपस्‍वियों की साधना स्‍थली हुआ करता था और जप एवं तप से उसकी तलहटी परिक्रमार्थियों को भी आध्‍यात्‍म के रास्‍ते पर चलने को प्रेरित करती थी, वहां अब चारों ओर ”माया का जाल” फैल चुका है।
यूं इस विश्‍व प्रसिद्ध धार्मिक स्‍थल को पर्यटन केंद्र का जामा पहनाने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा गठित तीर्थ विकास परिषद भी सक्रिय है और तथाकथित समाजसेवियों द्वारा स्‍थापित NGO’s भी, परंतु दोनों की ढपली से निकलने वाले अलग-अलग राग असली हालात खुद-ब-खुद बयां कर देते हैं।
ऐसे में मथुरा-वृंदावन की तरह गोवर्धन भी विकास के नाम पर सिर्फ और सिर्फ आधुनिक सुख-सुविधाओं से युक्‍त एक ऐसा कस्‍बा बनकर रह गया है, जहां धर्म की आड़ में अधर्म का खेल खुलकर खेला जाता है।
मथुरा-वृंदावन एवं गोवर्धन के अलावा बरसाना और थोड़े से समय में लोगों की पसंद बन चुका कोकिलावन स्‍थित शनि मंदिर क्षेत्र भी बाहरी लोगों के लिए WWW के इस्‍तेमाल का पसंदीदा स्‍थान बना हुआ है।
यही कारण है कि वीकेंड पर अब मथुरा, वृंदावन, गोवर्धन और बरसाना सहित कोकिलावन भी लग्‍जरी गाड़ियों वाले सुविधा संपन्‍न सो-कॉल्‍ड श्रद्धालुओं की भीड़ से इस कदर भरा रहता है कि आम स्‍थानीय लोगों को घर के बाहर कदम रखने से पहले कई बार सोचना पड़ता है।
श्रद्धा-भक्‍ति और धर्म व आध्‍यात्‍म की चादर ओढ़कर आने वाले तमाम लोगों के लिए दरअसल ये धार्मिक स्‍थान एक सुरक्षित ऐशगाह में तब्‍दील हो चुके हैं। यहां वह अपने घर-परिवार को धोखा देकर सुरा और सुंदरी का भरपूर भोग करते हैं। माथे पर चंदन और तिलक लगाकर गले में कंठी-माला धारण करने वाले इन लोगों ने अपने लिए यहां सारे इंतजाम पहले से किए हुए हैं।
न्‍यू ईयर को भी धर्म की आड़ में एंज्वॉय करने का सिलसिला शुरू तो कुछ वर्षों पहले ही हुआ था, लेकिन अब यह बड़ी तादाद में लोगों की पहली पसंद बन गया है।
अब आलम यह है कि होली-दीवाली और कृष्‍ण जन्‍माष्‍टमी जैसे प्रमुख त्‍योहारों की तरह नए साल पर भी इस धर्म नगरी में न तो कोई होटल खाली मिलता है, न गेस्‍ट हाउस और न पांच सितारा स्‍टेटस वाले नामचीन आश्रम।
ऐसे लोगों की भी कमी नहीं जिन्‍होंने अपने भोग-विलास की पूर्ति के लिए इन स्‍थानों पर या इनके आस-पास डेवलप पॉश कालॉनियों एवं मल्‍टी स्‍टोरी बिलडिंग्‍स में बाकायदा घर खरीद लिए हैं। ये घर तभी खुलते हैं जब ये या इनसे ऑब्‍लाइज इनके कोई घनिष्‍ठ लोग इनकी जैसी ”धार्मिक यात्रा” पर आते हैं।
वैसे तो इनकी सेटिंग इतनी अच्‍छी रहती है कि हर बार किसी अलग महिला के साथ होने पर भी इनके स्‍थानीय परिचित अपना मुंह नहीं खोलते किंतु फिर भी कभी-कभी ऐसे मौके आ जाते हैं जब इन्‍हें अपने कु-कर्मों की कीमत चुकानी पड़ती है।
चूंकि उनके लिए कोई भी कीमत अहमियत नहीं रखती इसलिए वह उसे खुशी-खशी अदा करने में कोई संकोच नहीं करते ताकि व्‍यवस्‍था कायम रहे और धर्म का चोगा भी काया से अलग न हो।
विश्‍वस्‍त सूत्रों से प्राप्‍त जानकारी के अनुसार वीकेंड और विशेष अवसरों की आड़ में कथित धार्मिक यात्रा पर आने वाले अनेक लोगों ने तो यहां उच्‍च शिक्षा के लिए रह रहीं बाहरी लड़कियों से भी सेटिंग कर ली है।
कैंपस होस्‍टल से अलग नेशनल हाईवे पर बनी कॉलोनियों में रहने वाली ऐसी बहुत सी लड़कियों के साथ इनके ताल्‍लुकात पूरी तरह प्रोफेशनल हैं इसलिए किसी स्‍तर पर कोई परेशानी नहीं होती। सबकुछ म्‍यूचुअल अंडरस्‍टेंडिग के तहत सुचारु रूप से चलता रहता है।
वर्ष 2019 अपने अंतिम चरण में है और नया साल दस्‍तक दे रहा है। कृष्‍ण की नगरी में अतिरिक्‍त चहल-पहल देखी जा सकती है। कड़ाके की ठंड ने इसमें चार-चांद लगा दिए हैं।
धर्म की आड़ में अधर्म और भक्‍ति के नाम पर वासना का खेल खेलने के इंतजाम मुकम्‍मल हैं। सोने पर सुहागा ये कि कानून-व्‍यवस्‍था के रखवाले सीएए और एनसीआर से उपजे हालातों में उलझे हैं। उलझे न भी होते तो कोई खास फर्क पड़ने वाला नहीं था क्‍योंकि शिकवा-शिकायत की गुंजाइश छोड़ी नहीं जाती।
यदि कभी कोई ऊंच-नीच होती भी है तो स्‍थानीय संरक्षक किस काम आएंगे। आखिर उनका भी तो धंधा है। चाहे गंदा ही सही।
शायद इसीलिए कहा जाता है कि ”थ्री डब्‍ल्‍यू” का बोलबाला हमेशा कायम था और हमेशा कायम रहेगा। ठीक उसी तरह जिस तरह धर्म कोई भी हो, वह अधर्म की हमेशा बड़ी आड़ बना रहेगा क्‍योंकि अधर्म के लिए धर्म से बड़ा कोई सुरक्षा कवच कभी हो ही नहीं सकता।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

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