ब्लूम्सबरी पब्ल‍िशर्स से खफा हुए लेखक: रद्द कर रहे कांट्रेक्ट

नई द‍िल्ली। द‍िल्ली दंगों के पीछे और देश की छव‍ि बदनाम करने की साज‍िश को बेनकाब करती पुस्तक ”दिल्ली रायट्स 2020: द अनटोल्ड स्टोरी” का प्रकाशन करने से मना करने वाली ब्लूम्सबरी इंडिया के ख‍िलाफ अब लेखक ही सामने आ गए हैं, उन्होंने पब्ल‍िश‍िंग हाउस के साथ अपने कॉंट्रेक्ट रद्द करने शुरू कर द‍िए हैं। उधर द‍िल्ली दंगों का सच बताने वाली पुस्तक की लेख‍िकाओं (द‍िल्ली यूनि. की प्रोफेसर सोनाली च‍ितलकर, सुप्रीम कोर्ट की वकील मोन‍िका अरोरा व एक अन्य प्रोफेसर प्रेरणा मल्होत्रा) ने कहा क‍ि ये अभ‍िव्यक्त‍ि की आज़ादी का हनन है। हालांक‍ि इससे पहले यह पुस्तक अमेजन पर बेस्ट सेलर के रूप में बिक रही थी।

ब्लूम्सबरी इंडिया के किताब का प्रकाशन करने का फैसला वापस लेने पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए अरोड़ा ने कहा, ‘‘यदि एक प्रकाशक मना करता है, तो दस और आ जाएंगे, बोलने की आज़ादी के मसीहा इस किताब से डरे हुए हैं।”
मिश्रा ने कहा, ‘‘दुनिया की कोई भी शक्ति इस पुस्तक को आने से नहीं रोक सकती है और लोग इसे पढ़ना चाहते हैं” और ‘‘बोलने की स्वतंत्रता के ठेकेदार डरते हैं कि पुस्तक यह उजागर करेगी कि दंगों के लिए प्रशिक्षण कैसे दिया गया था और दुष्प्रचार तंत्र इसमें शामिल था।”

अरोड़ा ने कहा कि दिल्ली दंगों की जांच एनआईए द्वारा की जानी चाहिए. उन्होंने दावा किया कि ये दंगे ‘‘सुनियोजित”थे। उन्होंने कहा कि पुस्तक को आठ अध्यायों और पांच अनुलग्नकों में विभाजित किया गया है, जो दंगा प्रभावित क्षेत्रों में जमीनी अनुसंधान पर आधारित हैं। उन्होंने कहा कि पुस्तक के अध्याय भारत में शहरी नक्सवाल और जिहादी थ्योरी, सीएए, शाहीन बाग और अन्य के बारे में हैं। मल्होत्रा ने कहा कि पुस्तक का उन ‘‘तथाकथित वामपंथी विचारकों और बुद्धिजीवियों” द्वारा विरोध किया गया, जिन्होंने पहले ‘‘झूठ फैलाया” था कि मुसलमानों के खिलाफ नागरिकता कानून था।  चितलकर ने कहा कि पुस्तक ‘‘पूरी तरह से जमीनी शोध का एक परिणाम है।” उन्होंने दावा किया, ‘‘हमने मुसलमानों सहित सभी से बात की।
हम पक्षपाती नहीं हैं. यह किताब शहरी नक्सलियों और इस्लामिक जिहादियों के खिलाफ रूख अपनाती हैं, यह मुस्लिम विरोधी किताब नहीं है।”

पुस्तक की तीन लेखिकाओं में से एक प्रोफेसर सोनाली चितलकर ने बताया कि यह बेहद दुखद है कि एक लोकतांत्रिक देश में पुस्तक लिखकर कुछ कहने की कोशिश को रोकने का प्रयास किया जा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि पुस्तक को प्रकाशित करने से रोकने के लिए ब्लूम्सबरी पर चौतरफा दबाव डाला गया। यह करने वाले वही लोग हैं जो स्वयं को अभिव्यक्ति की आजादी का सबसे बड़ा समर्थक बताते हैं। लेकिन वे इस पुस्तक को अन्य विकल्पों के जरिए लोगों तक लाने की कोशिश करेंगी क्योंकि लोगों के लिए यह जानना बेहद जरूरी है कि इन दंगों के जरिए किस तरह की भयानक साजिश को अंजाम दिया गया और भारत के भविष्य की दृष्टि से यह कितना खतरनाक साबित हो सकता है। पुस्तक लेखिकाओं का दावा है कि यह सब एक सोची-समझी साजिश के तहत भारत के मजबूत होते कद को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रभावित करने के लिए किया गया।

पुस्तक की अन्य दो लेखिकाओं में सुप्रीम कोर्ट की वकील मोनिका अरोड़ा और एक अन्य प्रोफेसर प्रेरणा मल्होत्रा हैं। पुस्तक के लिए साक्ष्य जुटाने का काम ‘ग्रुप ऑफ़ इंटेलेक्चुअल्स एंड एकेडेमिशियंस’ (GIA) ने किया था। इस ग्रुप से कई शिक्षण संस्थानों के प्रोफेसर, उप कुलपति, वकील, डॉक्टर और उद्योगपति जुड़े हुए हैं।

जेएनयू के प्रोफेसर और वैज्ञानिक आनंद रंगनाथन ज‍िन्हें ब्लूम्सबरी ने उनकी नई क‍िताब के ल‍िए एडवांस पेमेंट क‍िया है, का कहना है क‍ि अगर दिल्ली दंगों पर आने वाली पुस्तक के प्रकाशन रोकने का फैसला वापस नहीं लिया जाता है वो और उनके सह-लेखक उस धनराशि को वापस लौटा देंगे और अपनी आगामी पुस्तक का प्रकाशन अधिकार भी उससे छीन लेंगे।
– Legend News

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