नौकरी, व्यवसाय, उद्यम की दीवार पर लिखी इबारतें

अब एक छोटा बच्चा भी जानता है कि अपना मनपसंद खाना खाने के लिए उसे “चाचा का ढाबा” तक दौड़ लगाने की जरूरत नहीं है। वह ज़मैटो या स्विगी के ऐप से चाचा का ढाबा का ही नहीं, उस जैसे कई और ढाबों या रेस्टोरेंट्स का मैन्यू देख सकता है, अपने मनपसंद का खाना आर्डर कर सकता है और वह खाना उसे उसके घर पर ही मिल जाएगा तथा उसके लिए उसे कुछ फालतू पैसे भी नहीं खर्च करने पड़ेंगे। हमने कहीं जाना हो तो हमें कोई टैक्सी वाला ढूंढ़ना नहीं पड़ता, मोल-भाव नहीं करना पड़ता, ओला और उबर की सुविधा मौजूद है। गाड़ी हमारे घर के दरवाज़े पर पहुंच जाएगी और हमें हमारे गंतव्य तक पहुंचा भी देगी। राशन मंगवाना हो तो भी बिग बाज़ार और बिग बास्केट जैसी कंपनियां हमारी सेवा में हाज़िर हैं। यही नहीं, एमेज़ॉन और फ्लिपकार्ट जैसी कंपनियां तो दुनिया की हर चीज़ आपको आपके घर तक पहुंचाने के लिए तत्पर हैं। ओला और उबर ने जहां पारंपरिक टैक्सी सेवा को नये सिरे से परिभाषित किया है वहीं बिग बाज़ार और बिग बास्केट जैसी कंपनियों ने छोटे दुकानदारों के लिए अस्तित्व का संकट खड़ा कर दिया है।
अभी पिछले ही हफ्ते महिला उद्यमियों के एक संगठन ने मुझे अपने सदस्यों का व्यवसाय बढ़ाने के टिप्स देने की बात कही तो मैंने महिलाओं को उनके अपने व्यक्तिगत जीवन से सीख लेने की सलाह दी। एक बेटी जब शादी के बाद ससुराल जाती है तो उसकी दुनिया ही बदल जाती है। नया वातावरण, नये लोग, नया रंग-ढंग, नई सोच। सब कुछ बदल जाता है और उस अकेली लड़की को ही नई जरूरतों के मुताबिक खुद को ढालना होता है। यह काम आसान तो बिलकुल नहीं है, पर वह लड़की सब कुछ करती है। उसके बाद जब वह मां बनती है तो एक बार फिर एक बड़ा बदलाव आता है और वह खुद को उसके मुताबिक एडजस्ट कर लेती है। उद्यम का नियम भी ऐसा ही है। हर क्षण कुछ नया होता है, कुछ नया बनता है और कुछ नया करने की जरूरत हो जाती है। महिलाएं बदल जाने में माहिर हैं। बेटी से बीवी, बीवी से मां की यात्रा में वे बार-बार बदलती हैं और खुद को सहेज लेती हैं। महिला अपने अंदर आये इस बदलाव को सहज रूप में स्वीकार कर लेती है और तन से ही नहीं, मन से भी बदल जाती है। महिलाओं की इस खूबी में एक बहुत बड़ा पाठ छिपा पड़ा है जिससे हम सब बहुत कुछ सीख सकते हैं और अपने व्यवसाय को भी आगे बढ़ा सकते हैं।
जीवन का यह अनुभव छोटा नहीं है कि एक लड़की, एक नन्ही सी कली, फूल बनी, पराग कण आये, नया फूल आया और वह कली फूल बनकर एक नन्हे शिशु के पालन-पोषण में व्यस्त हो गई। इनमें से कोई भी बदलाव छोटा नहीं था। बड़े-बड़े बदलाव थे, पुरुष महसूस नहीं करता, स्त्री अनायास ही ये बदलाव अपना लेती है। इससे हम जो सीख सकते हैं वह हर उद्यमी के लिए भी बहुत उपयोगी है।
बदलते ज़माने में दीवार पर लिखी इबारत यह है कि अब हर व्यवसाय तकनीक आधारित होगा, तकनीक से चलेगा। बही-खाते हाथ से नहीं बनेंगे, पब्लिसिटी मैटीरियल किसी ट्रेडल मशीन पर नहीं छपेगा, अखबारों में छपने वाले विज्ञापन कम हो जाएंगे और उनका बहुत बड़ा हिस्सा सोशल मीडिया खा जाएगा या उसका एक बड़ा हिस्सा अखबारों के डिजिटल संस्करण में चला जाएगा। ग्राहकों को प्रोमोशनल मैटीरियल पैंफलेट के रूप में मिलने के बजाए ह्वाट्सऐप, टेलिग्राम मैसेंजर और ईमेल से मिलेगा। ग्राहकों को भुगतान का तकादा करने का तरीका भी बदल जाएगा और उसमें भी ऑटोमेशन की भूमिका बढ़ जाएगी। बिज़नेस का बहुत बड़ा हिस्सा इंटरनेट और इंट्रानेट आदि से संचालित होने लगेगा। सबसे बड़ी बात यह है कि आपका व्यवसाय कुछ भी हो, वह ऑनलाइन रूप में भी उपलब्ध होगा। वह ज़माना गया जब कंपनियां यह सोचती थीं कि उन्हें तकनीक का प्रयोग भी करना चाहिए। अब स्थिति यह है कि कंपनी खड़ी ही तकनीक के सहारे होती है, व्यवसाय चाहे कोई भी हो।
छोटे व्यवसायी अक्सर इसलिए छोटे नहीं रह जाते कि उनके पास तकनीक को अपनाने के लिए पैसा नहीं था, बल्कि इसलिए छोटे रह जाते हैं क्योंकि वे समय रहते तकनीक को अपनाने की पहल नहीं करते। वो यही सोचते रह जाते हैं कि हमारे व्यवसाय में तकनीक के दखल की आवश्यकता नहीं है, ये बड़ी कंपनियों के चोंचले हैं, हम इन फालतू के चोंचलों पर पैसा बर्बाद क्यों करें? वे इसे निवेश नहीं मानते, इन्वेस्टमेंट नहीं मानते, यहां तक कि खर्च भी नहीं मानते बल्कि समय और पैसे की बर्बादी मान लेते हैं और हमेशा के लिए कूप-मंडूक बने रहते हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि व्यवसाय की उन्नति के कुछ मूलभूत नियमों का पालन किये बिना हम एक हद से ज्यादा बड़े नहीं बन सकते। छोटे व्यवसायी अक्सर यहीं गलती करते हैं कि वे व्यवसाय की उन्नति के उन मूलभूत नियमों को नहीं समझ पाते और सारी उम्र यही कहते रहते हैं कि हमारे पास वैसा बजट कहां कि हम पैसा बर्बाद कर सकें।
बहुत से व्यवसायियों के साथ भी यही हुआ है कि उनका व्यवसाय बंद हो गया है। दरअसल हम किसी संकटकालीन स्थिति के लिए तैयारी ही नहीं करते और इसी का हश्र होता है कि जब संकट आता है तो हम धराशायी हो जाते हैं। ज़माना अब डिजिटल का है और हर व्यवसाय धीरे-धीरे पूरी तरह से तकनीक आधारित होता जा रहा है। इसलिए इलाज यही है कि हम तकनीक का प्रयोग करना सीखें, उसे जीवन में उतारें और ऐसा कुछ भी सीखें ताकि अनपेक्षित स्थितियों के लिए भी तैयार हों, संकटकालीन स्थिति के लिए भी तैयार हों। ऐसा नहीं करेंगे तो दरअसल हम अपने व्यवसाय में रहते हुए भी असल में नौकरी कर रहे होंगे, व्यवसायी होते हुए भी हमारी स्थिति एक ऐसे कर्मचारी की तरह की होगी जिसे वेतन कुछ ज्यादा मिलता है, हम व्यवसायी नहीं बन पायेंगे। इससे भी आगे बढ़कर यदि हम सहायकों की टीम नहीं बनाएंगे, उन्हें उचित प्रशिक्षण नहीं देंगे और उनके हर काम में बेजा दखल देते रहेंगे तो व्यवसायी तो बन जाएंगे पर उद्यमी नहीं बन पायेंगे। उद्यमी, टीम को प्रशिक्षित करता है, उसे सामर्थ्यवान बनाता है और उनसे काम लेता है। एक उद्यमी जानता है कि कंपनी कितनी ही बड़ी हो, कर्मचारियों का आना-जाना लगा ही रहेगा। उसे मालूम है कि कोई कर्मचारी जब तक उसका कर्मचारी रहेगा तब तक वह बेहतर काम कर सके, उसके लिए उसका प्रशिक्षित होना जरूरी है। वह इस डर से, कि कोई कर्मचारी उससे ही प्रशिक्षण लेकर उसका प्रतियोगी बन जाएगा, प्रशिक्षण देना बंद नहीं करता। वह जानता है कि उसका काम, रोज़मर्रा के कामों में उलझना नहीं, बल्कि उद्यम के विकास की रणनीति बनाना है। यही एक फर्क है जो उसे कर्मचारी से व्यवसायी बनाता है और फिर व्यवसायी से उद्यमी बनाता है। इस फर्क को समझ लेंगे तो व्यवसाय में उन्नति आसान हो जाएगी। हम समर्थ बनेंगे और देश की अर्थव्यवस्था की मजबूती में भी योगदान दे सकेंगे।

PK Khurana

 

– पी. के. खुराना,
हैपीनेस गुरू , मोटिवेशनल स्पीकर

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