पहले ओल्ड ऐज में भी कम क्‍यों नहीं होता था त्वचा का ग्लो?

-हममें से ज्यादातर लोगों के दादा-दादी और नाना-नानी ने 80 साल की उम्र को क्रॉस किया है। वहीं, ऐसे लोगों की संख्या भी बड़ी है जिनके ग्रांट पेरेंट्स ने 100 साल की उम्र से अधिक का जीवन जिया है। खास बात ये है कि हमारी दादी-नानी के बाल 80 साल की उम्र में घने, मुलायम और काले रहते थे।
– हम लोगों के बाल तो 20 साल की उम्र में ही सफेद होने लगे हैं। जबकि फिटनेस को लेकर जानकारी जुटाने के साधन हम लोगों के पास ज्यादा हैं। जिम से लेकर तरह-तरह की एक्सर्साइज के विकल्प हम लोगों के पास उन लोगों से कहीं ज्यादा हैं।
– फिर ऐसा क्या था कि ओल्ड ऐज में भी उन लोगों की त्वचा का ग्लो कम नहीं होता था? उनके बालों की चमक फीकी नहीं पड़ती थी और बुढ़ापे में भी उनके सिर पर इतने घने बाल होते थे…
देसी घी का जमकर उपयोग
-हमारी दादी-नानी अधिकतर काम खुद ही करती थीं। जैसे, घर में ही दही, छाछ और घी बनाना, चक्की से आटा पीसना, सूखे और खड़े मसाले घर पर ही तैयार करना इत्यादि। इसलिए वे अपने खाने में देसी घी, तिल का तेल, नारियल तेल इत्यादि का जमकर उपयोग करते थीं।
-दादाजी-नानाजी तो नहाने से पहले अपने सिर में देसी घी की मालिश किया करते थे। यानी उनकी लाइफ में फैट के लिए हम लोगों की तरह कोई ‘नो’ नहीं था। वे फैट का उपयोग दैनिक जीवन में करते थे। खासतौर पर स्वस्थ और हेल्दी फैट, इनमें भी देसी घी प्रमुख रहता था। इससे उनकी त्वचा सालों-साल जवां बनी रहती थी।
दोपहर के खाने में दाल जरूर होती थी
-हमारे पूर्वजों का लंच दाल के बिना पूरा नहीं होता था। गांवों में तो आज भी हर दिन दोपहर के समय दाल-चावल खाने का चलन है। क्योंकि दाल से शरीर को प्रोटीन की प्राप्ति होती है तो चावल हेल्दी स्टार्च की कमी को पूरा करता है।
-हर दिन दाल और चावल का उपयोग आपके बाल, आपकी त्वचा और आपके नाखूनों को प्राकृतिक रूप से सुंदर बनाता है। यही वही है कि हमारे पूर्वजों के बाल 80 साल की उम्र में भी घने और मोटे बने रहते थे।
खड़े मसालों का उपयोग
-पुराने समय में ज्यादातर मसाले घर पर ही तैयार किए जाते थे। साथ ही इन मसालों को पाउडरी फॉर्म की जगह साबुत उपयोग किया जाता था या फिर उपयोग से तुरंत पहले ही इन्हें पीसा जाता था। ऐसा करने से इनकी प्राकृतिक खुशबू और गुण बरकरार रहते थे और मसालों का पूरा पोषण उनके शरीर को मिलता था।
-जबकि हम लोग ज्यादातर मसाले पिसे हुए खरीदते हैं। इनकी शुद्धता की कोई गारंटी भी हमें पता नहीं होती। साथ ही लंबे समय तक इन्हें स्टोर करने से इनकी प्राकृतिक सुगंध फीकी पड़ने लगती है। नतीजा यह होता है कि हमारे शरीर और त्वचा को इनका पूरा पोषण नहीं मिल पाता।
सब्जियों का छिलके सहित उपयोग करना
-हम सभी लोग सब्जी और फलों का उपयोग छीलकर करते हैं। जबकि हमारे पूर्वज ज्यादातर फलों और सब्जियों का उपयोग या तो छिलके सहित करते थे या फिर उनके छिलकों को अलग से भोजन का हिस्सा बनाते थे। जैसे, लौकी, तौरी, कद्दू, तरबूज, पका हुआ केला इत्यादि के छिलकों की सब्जी बनाकर उपयोग करते थे।
-ऐसा इसलिए क्योंकि छिलकों सहित सब्जी और फलों का उपयोग करने से हमरे शरीर में पर्याप्त मात्रा में फाइबर्स जाते हैं। फाइबर्स वे महीन रेशे होते हैं, जो पाचन को सही बनाए रखते हैं। इससे हम जो भी खाते हैं उसका पूरा पोषण हमारे शरीर को प्राप्त होता है और हम जवां बने रहते हैं।
छाछ और लस्सी हर दिन
-आप छाछ और लस्सी का सेवन ऑकेजनली करते हैं। लेकिन दादी-नानी के समय में हर दिन छाछ और लस्सी का सेवन किया जाता था। इससे त्वचा हाइड्रेट रहती थी। आपको बता दें कि पुराने वक्त में लोग हर दिन अपनी सुबह की शुरुआत तांबे में रखे पानी के साथ करते थे।
-रात को सोने से पहले तांबे के बर्तन में पानी रख दिया जाता था और सुबह उठकर उकड़ू बैठकर लोग इस पानी का सेवन करते थे। इससे उनका पेट साफ रहता था और इसका असर उनके चेहरे की कांति पर साफ दिखता था। सर्दी के मौसम में वे धूप में बैठकर गुड़ के साथ छाछ पिया करते थे।
मीठा उनकी डायट का अभिन्न अंग था
-आपको बता दें कि फिटनेस के नाम पर आप भले ही मीठे से दूर रहते हों। लेकिन हमारे पूर्वज गुड़ और बूरे का उपयोग अपने दैनिक जीवन में नियमित रूप से किया करते थे।
– ऐसा करने से उनकी त्वचा के टॉक्सिन्स क्लीन होते थे और शरीर में ऊर्जा रहती थी। साथ ही पर्याप्त मात्रा में हीमोग्लोबिन रहता था। इस कारण उनके चेहरे पर नैचरली रेडिऐंट ग्लो रहा करता था।
-दरअसल, गुड़ खाने से लीवर की सफाई होती है। महिलाओं को पीरियड्स के दौरान दर्द और क्रैप्स कम आते हैं। शरीर से टॉक्सिन्स बाहर निकलते हैं। इसलिए हमारे पूर्वज हर दिन एक गुड़ खाया करते थे। इसे तो आप आज भी आपनी डायट का हिस्सा बनाकर स्वस्थ रह सकते हैं। यदि आपको शुगर नहीं है तब।
मौसम के हिसाब से सब्जी का उपयोग
-आज के समय में हर सब्जी हर मौसम में उपलब्ध है। यह आपके शरीर और सुंदरता के लिए बिल्कुल भी अच्छा नहीं है। क्योंकि प्रकृति हमें मौसम की जरूरत के हिसाब से फल और सब्जियां देती है। इससे ये सभी फूड्स उन गुणों से भरपूर होते हैं, जिन गुणों की जरूरत हमारे शरीर को उस खास मौसम में होती है।
-इससे हमारे शरीर को सही पोषण मिलता है। इसका असर यह होता है कि मौसम बदलने के कारण हेयर फॉल की दिक्कत नहीं होती है। त्वचा संबंधी बीमारियां नहीं होती हैं। हेयर ग्रोथ, नेल ग्रोथ, नेल शाइन और स्किन ग्लो सबकुछ मेंटेन रहता है। इसलिए हमारे पूर्वज बिना कॉस्मेटिक्स के उपयोग के भी इतने आकर्षक लगते थे।
सप्ताह में एक व्रत जरूर
-हमारी दादी-नानी सप्ताह में एक दिन व्रत जरूर करती थीं। ऐसा दादा और नानाजी भी किया करते थे। या फिर वे लोग सप्ताह में एक दिन सिर्फ और सिर्फ मूंग दाल की खिचड़ी और दही खाते थे।
-ऐसा करने से उनकी बॉडी डिटॉक्स हो जाती थी और त्वचा का ग्लो बरकरार रहता था। यानी हमारे पूर्वज बिना कॉस्मेटिक और बिना ताम-झाम के अपनी त्वचा को ग्लोइंग भी बनाते थे और उस ग्लो को मेंटेन भी रखने के लिए भी प्राकृतिक तरीका ही अपनाते थे।
फ्रेश चीजें खाना
-हमारे पूर्वज कभी भी रखा हुआ या बासी खाना नहीं खाते थे। दिन में तीनों समय ताजा भोजन बनता था और उसी का सेवन किया जाता था। जबकि हम लोग फ्रिज में स्टोर करके दो-दो दिन तक सब्जी का उपयोग करते रहते हैं।
-इसके साथ ही हमारे पूर्वज लोकल फूड का उपयोग अधिक करते थे। क्योंकि ऐसा करने से उन्हें अपने आस-पास के वातावरण के हिसाब से पोषक तत्वों की प्राप्ति होती थी। जबकि हम लोग दुनिया के अलग-अलग देशों से आए हुए फ्रूट्स और फूड्स का सेवन करते हैं।
रात को सोने से पहले दूध पीना
-अपने पैरंट्स से पूछकर देखिए, उन्हें भी याद होगा कि बचपन में सोने से पहले कैसे उन्हें एक गिलास गुनगुना दूध पीने को मिलता था। दरअसल, रात को गुनगुना दूध पीकर सोने से नींद अच्छी आती है। दूध से हमारे शरीर को प्रोटीन के अतिरिक्त मेलाटॉनिन, लेक्टोस या लेक्टिक एसिड की प्राप्ति होती है।
-ये अच्छी और गहरी नींद में मदद करते हैं। इससे सुबह के समय एकदम फ्रेश होकर आंखें खुलती हैं। यही वजह है कि हमारे दादी-दादा बुढ़ापे में भी सुबह 5 बजे जगकर स्नान कर लेते थे, वो भी हैंडपंप के पानी में। और हम लोगों की गीजर के पानी में भी इतनी सुबह नहाने की हिम्मत नहीं होती है।
सबसे प्रभावी रहा है यह तरीका
-हमारे पूर्वज सूरज छिपने से पहले रात का भोजन कर लेते थे और रात को 8 बजे तक सो जाते थे। जबकि अगले दिन उनकी सुबह रात के 3 बजे हो जाती थी। इस समय नहाकर सुबह की पूजा करना और अपने दैनिक कार्यों को निपटाना शुरू कर देते थे।
-ऐसा करने से उनका शरीर हमेशा स्वस्थ रहता था। पाचन सही रहता था और स्लीप साइकल मेंटेन रहता था। ना तो उन्हें हॉर्मोनल डिसबैलंस की समस्या होती थी और ना ही मानसिक तनाव इत्यादि का सामना करना पड़ता था। स्वस्थ शरीर का प्रभाव उनकी त्वचा के सौंदर्य पर अलग ही रौनक रखता था। यही वजह थी कि 80 और 100 साल की उम्र में भी हमारे पूर्वजों की झुर्रियों में भी ग्लो दिखता था। अगर आप भी चाहते हैं कि बिना केमिकल और कॉस्मेटिक्स के आप भी चिरयुवा नजर आएं तो यहां बताई गई बातों को जीवन में उतार लीजिए।
-एजेंसियां

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