क्यों खास है देवी अन्नपूर्णा की मूर्ति, ज‍िसका पीएम ने ‘मन की बात’ में क‍िया ज़‍िक्र

नई द‍िल्ली। 18वीं सदी पुरानी देवी अन्नपूर्णा की मूर्ति लगभग 100 साल पहले वाराणसी से चुरा ली गई और कनाडा पहुंच गई. अब देवी अन्नपूर्णा (goddess Annapurna) की मूर्ति की वापसी का जिक्र खुद पीएम नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) ने किया है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मन की बात में कनाडा से मां अन्नपूर्णा की मूर्ति वापस लाने की बात बताई. वाराणसी (तत्कालीन बनारस) से लगभग सौ साल पहले ये मूर्ति तस्करी के जरिए कनाडा पहुंच गई. मूर्ति का इतिहास काफी पुराना है और इसके लौटने को अच्छा संकेत माना जा रहा है. बता दें कि कुछ महीनों पहले ही शिव प्रतिमा के भी ब्रिटेन से वापस लौटने का एलान हुआ.

क्या खास है मूर्ति में
माता अन्नपूर्णा यानी हिंदू माइथोलॉजी में अन्न और संपदा की देवी की ये मूर्ति 18वीं सदी की बताई जा रही है. 100 साल पहले वाराणसी में ये तस्करों के हाथ लगी और इंटरनेशनल बॉर्डर पार करते हुए कनाडा जा पहुंची. लंबे समय से ये यूनिवर्सिटी ऑफ रेजिना के मैंकेंजी आर्ट गैलरी (MacKenzie Art Gallery) का हिस्सा बनी हुई थी. अब भारत ने तस्करी से गायब हुई कलाकृतियों को वापस पाने का अभियान चलाया है, जिसके तहत कनाडा सरकार से भी बात हुई.

फिलहाल मूर्ति ओटावा में भारतीय हाई कमिश्वर को दी जा चुकी है. वैसे मूर्ति के भारतीय कनेक्शन को खोजने का किस्सा काफी दिलचस्प है. मूर्ति के हाथों में खीर से भार कटोरा और चम्मच है. ये देखकर पीबॉडी एसेक्स म्यूजियम में सेवाएं दे रहे भारतीय अधिकारी ने पहचाना लिया कि ये मां अन्नपूर्णा की प्रतिमा है.

हमेशा से होती आई है तस्करी
देश से कलाकृतियों की चोरी कोई नई घटना नहीं. एक अनुमान के मुताबिक देश से हर साल औसतन 10000 प्राचीन मूर्तियां और कलाकृतियां चोरी की जाती हैं और तस्करी से विदेशों में चली जाती हैं. इनमें से कई बहुत ज्यादा भारी और मूल्यवान होती हैं. तांबे और कांसे या मिश्रित धातुओं से बनी कई मूर्तियां 15 से 16 टन तक की होती हैं.

हर दशक में कम से कम 10 हजार बहुमूल्य कृतियां भारत से तस्करी की जाती हैं. विजय भारतीय मूर्तियों की चोरी को लगभग दो दशकों से देख रहे हैं. इस बारे में साल 2018 में एक किताब भी आई है, द आइडल थीफ यानी मूर्ति चोर. किताब में देश के मूर्तियों की तस्करी कैसे होती है, इस बारे में बताया गया है.

अधिकतर मूर्तियां समुद्र के रास्ते से स्मगल होती हैं. भारी मूर्तियों को तब कस्टम से बचाते हुए लाया जाता है और कहीं पकड़ाई में आ भी गए तो उन्हें पीतल की बगीचे में सजाने वाली मूर्तियां बताया जाता है. इसके लिए भारी रिश्वत भी दी जाती है. समुद्री रास्ते से एक देश से दूसरे देश पहुंचने के बाद काला बाजार में उन्हें भारी कीमत पर बेचा जाता है. जहां से तस्करों का ही सफेदपोश गिरोह मूर्तियों को विदेशी रईसों को और ऊंची कीमत पर बेच देता है. इसके बाद भी ये कीमत मूर्ति की असल कीमत से काफी कम होती है.

– एजेंसी

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