भारत-पाक बंटवारे का मामला अब क्यों पहुंचा ब्रिटिश ट्राइब्यूनल में?

भारत में ब्रितानी हुकूमत को खत्म हुए एक अरसा हो चुका है, लंबा अरसा। आजादी के 75 साल होने को हैं, इसी तरह बंटवारे की त्रासदी को भी। अब इतने सालों बाद ब्रिटेन में भारत-पाकिस्तान बंटवारे से जुड़े कुछ ऐतिहासिक दस्तावेजों पर बहस छिड़ी है। मामला ब्रिटिश ट्राइब्यूनल में पहुंचा है और विवाद के केंद्र में है माउंटबेटन पेपर्स, जिसमें उनकी निजी डायरियां भी शामिल हैं। तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड माउंटबेटन की निष्पक्षता सवालों में है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड माउंटबेटन ने भारत-पाकिस्तान को बांटने के लिए खींची गई लकीर को प्रभावित किया था। क्या उन्होंने रेडक्लिफ लाइन खींचे जाने में दखल दिया था?
समझते हैं क्या है पूरा मामला

ब्रिटिश इतिहासकार Andrew Lownie

माउंटबेटन पर किताब लिखने वाले ब्रिटिश लेखक एंड्रयू लोनी ने माउंटबेटन पेपर्स को पूरी तरह सार्वजनिक करने की मांग को लेकर ट्राइब्यूनल का रुख किया है। मांग की गई है कि लॉर्ड माउंटबेटन और लेडी माउंटबेटन के बीच हुए पत्राचार समेत सभी प्राइवेट डायरियों को सार्वजनिक किया जाए। ट्राइब्यूनल में क्लारा हैमर लेखक एंड्रयू लोनी का प्रतिनिधित्व कर रही हैं। उन्होंने लेडी माउंटबेटन और पंडित जवाहर लाल नेहरू के बीच पत्राचार को भी सार्वजनिक करने की मांग की है।
लॉर्ड माउंटबेटन की डायरी के 47 वोल्यूम सुरक्षित
प्राइवेट डायरीज समेत माउंटबेटन से जुड़े ये ऐतिहासिक दस्तावेज यूनिवर्सिटी ऑफ साउथैम्पटन के ब्रॉडलैंड आर्काइव्स में रखे हुए हैं। ब्रॉडलैंड आर्काइव्स में 4,500 बक्सों में पेपर्स और दस्तावेज रखे गए हैं। इनमें लॉर्ड माउंटबेटन की डायरी के 47 वोल्यूम हैं। इसके अलावा लेडी माउंटबेटन की डायरियों के 36 वोल्यूम हैं।
यूनिवर्सिटी का कहना है कि वह इन बेहद संवेदनशील पेपर्स को सार्वजनिक नहीं कर सकती क्योंकि इन पेपर्स का स्वामित्व उनके पास नहीं है, वह तो सिर्फ इन्हें स्टोर की हुई है। अब ट्राइब्यूनल में इस बात पर सुनवाई हो रही है कि इन पेपर्स को सार्वजनिक किया जाना चाहिए या नहीं।
क्यों उठ रहे माउंटबेटन की निष्पक्षता पर सवाल?
क्लारा हैमर ने ट्राइब्यूनल में दलील दी कि माउंटबेटन की डायरी में 12 जुलाई 1947 की एंट्री बताती है कि उन्होंने ब्रिटिश जज सर सिरिल रेडक्लिफ और क्रिस्टोफर ब्यूमोंट के साथ डिनर की थी। रेडक्लिफ बाउंडरी कमिशन के अध्यक्ष थे और ब्यूमोंट इसके सेक्रटरी। इसी कमिशन ने भारत-पाकिस्तान को बांटने वाली लाइन खींची थी जिसे रेडक्लिफ लाइन यानी रेडक्लिफ रेखा कहते हैं, लेकिन 12 जुलाई के उस डिनर के अगले दिन माउंटबेटन की डायरी में ऑरिजिनल एंट्री में इस आधार पर बदलाव किया गया है कि इससे भारत और पाकिस्तान के साथ ब्रिटेन के संबंध प्रभावित हो सकते हैं।
लेखक एंड्रयू लोनी की प्रतिनिधि हैमर ने ट्राइब्यूनल में कहा, ‘मुद्दा यह है कि क्या माउंटबेटन निष्पक्ष थे। यह तथ्य है कि उन्होंने रेडक्लिफ और ब्यूमोंट से ऐसे वक्त में मुलाकात की, जब उनसे उम्मीद की गई हो कि वह निष्पक्षता को बनाए रखने के लिए बाउंडरी कमिशन से जुड़े लोगों से मुलाकात नहीं करेंगे। यह इस बात का सबूत हो सकता है कि लॉर्ड माउंटबेटन में निष्पक्षता की कमी थी।’
माउंटबेटन ने रेडक्लिफ लाइन खींचने में किया खेल?
हैमर ने ट्राइब्यूनल के सामने सवाल उठाया है कि डायरी में 13 जुलाई 1947 की एंट्री में जो बदलाव किए गये हैं क्या उनका वास्ता एक रात पहले हुए उस डिनर से है जिसमें लॉर्ड माउंटबेटन, सर रेडक्लिफ और ब्यूमोंट शामिल थे? क्या डायरी में एंट्री से जुड़े बदलाव का वास्ता भारत और पाकिस्तान के बीच विभाजन रेखा खींचे जाने से था? हैमर ने कहा, ‘अगर ऐसा है तो यह जनहित का मुद्दा है जिसमें पूरी पारदर्शिता जरूरी है।’
आजादी से एक हफ्ते पहले की डायरी एंट्रीज में क्यों और क्या हुए बदलाव?
इतना ही नहीं, हैमर ने यह भी सवाल उठाया है कि भारत और पाकिस्तान की आजादी से सिर्फ 8-9 दिन पहले 6 अगस्त 1947 और उसके बाद की डायरी एंट्री में बदलाव क्यों किया गया। उन्होंने कहा, ‘यह न सिर्फ जनहित से जुड़ा मसला है बल्कि उन इतिहासकारों के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण है जो उस दौर की घटनाओं को जानना-समझना चाहते हैं।’ हैमर ने ट्राइब्यूनल को बताया कि लोनी का मानना है कि उस वक्त जॉइंट डिफेंस काउंसिल की मीटिंग हुई होगी जिसमें माउंटबेटन ने भी हिस्सा लिया होगा।
बेहद संवेदनशील हैं माउंटबेटन पेपर्स
दूसरी तरफ, यूनिवर्सिटी ऑफ साउथैम्पटन लाइब्रेरी के रिटायर्ड आर्काइविस्ट और क्यूरेटर प्रोफेसर क्रिस बूलगर ने अपने उस फैसले का बचाव किया है जिसमें उन्होंने माउंटबेटन पेपर्स को अति संवेदनशील बताते हुए कैबिनेट ऑफिस को अलर्ट किया था। प्रोफेसर बूलगर के मुताबिक, माउंटबेटन पेपर्स में जो जानकारियां हैं वो बहुत ही संवेदनशील हैं। वो शाही परिवार या फिर भारत और पाकिस्तान से जुड़ी हुई हैं। ट्राइन्बयूनल को बताया गया कि कैबिनेट ऑफिस इस बात पर सहमत है कि कुछ फाइलों को बंद कर दिया जाना चाहिए क्योंकि भारत और पाकिस्तान से जुड़ी सामग्री बेहद संवेदनशील है।
-एजेंसियां

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