गुरू ने क्यों कहा, ना बिल्ली पालना और ना लँगोटी रखना

संसार को लेकर इतनी परिभाषाएँ, इतनी व्याख्याएँ हो रहीं है कि सदैव एक भ्रम ही बना हुआ है। कभी सोचते हैं कि संसार छूटेगा तो ईश्वर की प्राप्ति होगी, कभी सोचते हैं कि ईश्वर तो कण कण में है तो क्यों न संसार में ही खोज लिया जाये।
यह सारा चिंतन “मन” का ही चल रहा है। पूछो, भैया परमात्मा कहाँ मिलेंगे तो मन दसों दिशाओं में संकेत कर रहा है कि ईश्वर सर्वव्यापी है और अपने भीतर आत्मा में भी परमात्मा का संकेत हो रहा है।

जब अन्दर और बाहर दोनों ही जगह परमात्मा का ही वास है तो कौन सा संसार बाधा बना हुआ है? प्रचलित कथन है कि “मन के हारे हार है और मन के जीते जीत”।
बाहर और भीतर के बीच में जो दीवार बन कर खड़ा है, वह “मन” है और यह जो मन है, इसी में सारा संसार विद्यमान है। जितने मनुष्य हैं, सबकी एक अलग ही दुनिया है – संसार है और यह संसार अपने अपने मन का ही विस्तार है।

जो हम देख रहे हैं अपनी आँखों से, यह संसार नहीं है अपितु यह तो संसार का वह रूप है, जो व्यक्ति की कामनाएँ और वासनाएँ उसे दिखा रही हैं। ऐसी दृष्टि न तो शुद्ध है और न निर्मल, इसमें तो अनेकों राग-द्वेष-अहंकार समाहित हैं।
अंतः-बाह्य दोनों में ही परमात्मा का शाश्वत अस्तित्व है और इनके बीच में मन खड़ा हुआ है। मन ने अपने ही राग छेड़े हैं और सबको अपने रंग में रंगे हैं, जब तक मन का कठोरता से दमन नहीं होगा, तब तक परमात्मा के स्वरूप को नहीं समझ सकते।
तुम्हारा मन तुम्हीं देख सकते हो इसलिए तुम्हारी दुनिया तुम्हीं को दिखती है, तुम्हीं को ज्ञात है, कोई और इस दुनिया को न देख सकता है और न समझ सकता है। तुम्हारी दुनिया तो रंग बिरंगी है, मन ने सबको अपने ही रंग में रंगा हुआ है।

कोई अपना-कोई पराया, कोई मित्र-कोई शत्रु, सत्य यही है कि जो तुम्हारी कामनाओं और वासनाओं के अनुरूप हो वही अपना-वही मित्र है और जो इनके प्रतिकूल है वही पराया-वही शत्रु है। किसी के सामीप्य की अभिलाषा रखते हो और किसी का चेहरा भी देखना नही चाहते, यह सब मन ही तो करा रहा है।

किसी धनवान का बेटा घर छोड़ कर भाग गया। बाप था महाकृपण सो दोनों में जमी नहीं। पहले तो पिता अकड़ में रहा कि अपने आप आ जाएगा, मैं क्यों खोजूँ? समय गुजरता गया, बाप वृद्ध हो चला, अकड़ कुछ कम हुई, सोचा सारी सम्पत्ति व्यर्थ ही चली जाएगी, इकलौता बेटा था और वह भी चला गया है। अब ढूढ़ना शुरू किया, ख़बरी लगाए परन्तु कोई पता न मिला।
एक दिन पत्र आया लड़के का कि बहुत मुसीबत में हूँ। पिता को लिखा कि आपके पास आने की हिम्मत नहीं हो रही है, अपने को आपका अपराधी समझता हूँ और बहुत शर्मिंदा हूँ। यदि आप मुझे लेने आ जाएँ तो समझूँगा कि आपने मुझे माफ़ कर दिया है। पिता तत्काल चल पड़ा अपने बेटे को लाने, उस शहर तक पहुँचने में रात हो गयी। अब तो सुबह ही खोजूँगा, सोचकर समीप के होटल में रुक गया।

मध्य रात्रि में अचानक उसकी नींद टूट गयी और लगा कमरे के बाहर कोई खाँस-खंखार रहा है। उससे जाने को कहा परंतु वह आदमी हटने को तैयार नहीं, बाहर बर्फ़ गिर रही है और वह बीमार तो था ही। उसने धक्के देकर उसे बरामदे के बाहर कर दिया और फिर जाकर वह आराम से सो गया।

सुबह कमरे से बाहर निकला तो देखा मैदान में भीड़ लगी है और कोई मरा पड़ा है। समीप जाकर देखा तो समझ गया कि यह तो वही आदमी है जिसको रात में बाहर किया था। थोड़ा और समीप गया तो चेहरा पहचाना सा लगा और वह दहाड़ें मार मार कर रोने लगा क्योंकि मरने वाला उसका पुत्र ही था, जिसको वह वर्षों से खोज रहा था। अब वह जीवन भर ग्लानि में रहेगा कि मैंने ही अपने बेटे को मार दिया।

विचार करें कि यदि अभी कोई अन्य व्यक्ति उसको आकर कह दे कि तुमको भ्रम हो रहा है, यह तो फ़लाना व्यक्ति है, क्षण में रोना रुक जाएगा, प्रफुल्लता वापिस आ जाएगी क्योंकि मन का भाव बदला तो जग बदल जाएगा-सब बदल जाएगा।

ज़िंदगी की कहानी बहुत विचित्र है, सब कुछ “मेरा और तेरा” पर निर्भर है , मेरा है तो अलग दृष्टिकोण-अलग भाव, तेरा है तो अलग दृष्टिकोण – अलग भाव और यही संसार है। जब इस चराचर में सभी, यह पृथ्वी, नदी, पहाड़, आकाश, पवन, परमात्मा का है और इन पर उसी की सत्ता है, तो मेरा और तेरा सब मन समझा रहा है और यह मन का ही खेल है, वही अपनी अलग दुनिया बना रहा है, अपनी ही ढपली बजा रहा है।

यह भ्रम है कि संसार परमात्मा के मार्ग में बाधा है, यदि कोई बाधा है तो वह है मन, जो खड़ा है बाधा बनकर। जिसको संसार कहते हो, उसको छोड़ कर हिमालय पर चले भी गए तो क्या अन्तर पड़ेगा? वहाँ झोपड़ी बना कर रहने लगे और एक दिन उस पर किसी ने क़ब्ज़ा करने की कोशिश की तो झगड़ा शुरू कर दोगे कि यह झोपड़ी मेरी है, यदि आसन पेड़ के नीचे लगा लिया तो कहोगे यह पेड़ मेरा है। देखोगे कि झोपड़ों/ आश्रमों के लिए भी झगड़े कम नहीं होते हैं। यहाँ महल के लिए झगड़े हैं और वहाँ झोंपड़े/आश्रम के झगड़े, कोई अन्तर ही नहीं पड़ा, संसार तो तुम्हारी दृष्टि में बसा है। चेले चपाटे बन जाएँगे, कुछ सेवक बन जाएँगे, तुम उनके सुख-दुःख के साझेदारी हो जाओगे और बस गयी अपनी दुनिया-बन गया अपना संसार। कोई अन्तर नहीं पड़ा, स्थिति जस की तस है।

एक संत के संसार त्यागने का समय आ गया, शिष्य दुःखी हो रहे थे और पूछा कि महाराज हमारे लिए कोई निर्देश हो तो कहें। संत ने कहा मेरे गुरु का अंतिम समय का ज्ञान है, मैंने तो भुला दिया था परन्तु तुम भटकना नहीं। सभी शिष्य सजग हो गए, सोचा महाप्रस्थान से पूर्व गुरुजी ज़रूर कोई विशिष्ट रहस्योद्घाटन करेंगे।

गुरू जी ने कहा कि कभी “बिल्ली मत पालना”। शिष्य भ्रमित रहे कि कहीं मृत्यु से पहले गुरूजी को मतिभ्रम तो नहीं हो गया। सभी एक स्वर में बोले- महाराज जी यह कौन सा ज्ञान समझा रहे हैं ? हम आपसे कुछ दिव्य सूत्र की अभिलाषा कर रहे हैं और आप कह रहे हो कि बिल्ली मत पालना। गुरू बोले तुम मेरी कहानी सुनो सब स्पष्ट हो जाएगा। कहने लगे जब मेरे गुरू ने कहा था कि कभी बिल्ली मत पालना तो मैंने भी सोचा था कि मृत्यु के समय इनका दिमाग़ चल गया है और वहीं चूक गया। यही गलती तुम सब भी कर रहे हो, चूक रहे हो।

समय गुजरता गया और मैं सब मोह माया छोड़छाड़ कर जंगल में रहने लगा। साधन-भजन चल रहा था। कुछ पास न था, बस दो लंगोटियाँ थीं। एक ही कष्ट था झोपड़ी में चूहे बहुत थे और वो लँगोटी काट देते थे। कभी कभी पड़ोस के गाँव से कुछ भक्त आ जाते थे, उन्होंने कहा क‍ि महाराज जी यदि एक बिल्ली पाल ली जाए तो इस कष्ट से छुटकारा मिल जाएगा। गुरू के अन्तिम वाक्य विस्मृत हो गए और लगा कि शास्त्रों में संन्यासी को पत्नी की तो मनाही है परन्तु बिल्ली पालने में तो कोई आपत्ति है नहीं। यह भी सोचा कहाँ चूहों के हिसाब-किताब, गिनती में लगा हूँ और यदि बिल्ली आ गयी तो चूहों का हिसाब-किताब खुद ही देख लेगी। बिल्ली पाल ली, बिल्ली को कभी चूहे मिलते और कभी नहीं। बिल्ली को भूखी देखकर हृदय को पीड़ा होती थी, जिन्होंने बिल्ली पालने की सलाह दी थी, वही बोले महाराज जी एक गाय आपको दान कर देते हैं, आपको भी गौदुग्ध मिल जाएगा और बिल्ली भी भूखी नहीं रहेगी, सो गौमाता आ गयीं। जब कभी भक्त चारा न ला पाएँ तो भूखी गौ को देख कर हृदय को बड़ा कष्ट होता था, जिन्होंने बिल्ली और गौ पालने की सलाह दी, वही बोले- महाराज जी समीप में ही दो खेत दान कर देते हैं, कुछ गौ का चारा हो जाएगा और कुछ गेहूँ भी हो जाएँगे। गौसेवा भी होती रहेगी और कुछ संत सेवा भी हो जाएगी। खेत भी आ गए और जब कभी स्वास्थ ख़राब हो जाये तो खेत पर मजदूर भी काम करने लगे। गाय-बिल्ली-खेत सभी में निरंतर वृद्धि होने लगी। खेती महत्वपूर्ण हो गयी और भजन-ध्यान- साधना खूँटी पर टंग गए।
आयु का प्रभाव कहो, अब सारे काम सम्भालना मुश्किल होने लगा। जिन्होंने बिल्ली – गाय-खेत के फेरे में डाला, उन्हीं ने कहा कि महाराज जी गाँव में एक लड़की है, बहुत ही धार्मिक है और पूजा पाठ में उसका बड़ा मन लगता है, उसका विवाह हो नहीं पाया है, यदि आपके सानिध्य में रहेगी तो उसका भी साधन भजन बना रहेगा और सेवा व्यवस्था भी सँभाल लेगी, बड़ी कृपा यदि उसको आप आश्रम की सेवा के लिए रख लो। कन्या भी आ गयी, बहुत सेवाभावी थी, आश्रम-खेत-गौशाला सब सँभाल लिए। जब मैं थक जाता तो बड़े भाव से पैर भी दबा देती थी। धीरे धीरे प्रेम जागा, मोह बन गया, बिल्ली ने सब कुछ दे दिया। जिन गाँववालों ने बिल्ली-गौ-खेत-सेविका सब दिया, उन्होंने ही कहा कि यह सब अनैतिक है, जब राग बन ही गया है तो आप विवाह कर लो। विवाह हुआ और बच्चे भी आ गए और मरते वक्त अब याद आया कि गुरु ने कहा था कि बिल्ली मत पालना और वही मैं तुम सबको समझा रहा हूँ। उसने कहा मैं तुमको इसके आगे का रहस्य बताता हूँ, मेरे गुरु ने कहा कि बिल्ली मत पालना और मैं कहता हूँ कि लँगोटी ही मत रखना क्योंकि झंझट तो लँगोटी से शुरू हुआ था।

कहाँ भाग कर जा सकते हो, संसार महत्वपूर्ण नहीं है, मैं भावना काम कर रही है और यह जो ”मैं” है, अहं का भाव है, यही लँगोटी है अर्थात् तुम ही लँगोटी हो। यदि “तुम” हो तो लँगोटी, चूहे-बिल्ली सब इकट्ठे कर देगी, एक लँगोटी पूरा जमावड़ा लगा देगी। यह सब बड़े दबे पाँव होगा, धीरे – धीरे, कदम दर कदम, तुमको आभास ही नहीं होगा कि बढ़ोतरी हो रही है। सांसारिक वासनाएँ एक दम से नहीं झपटतीं, यदि लँगोटी सीधे पत्नी लेकर आती तो दिखायी पड़ता और सचेत हो जाते। रोग-शोक तो बड़े चुपचाप जीवन में प्रवेश कर जाते हैं, कब आ गये -कहाँ से आए? पता ही नहीं चलता, न कोई शोरगुल और न कोई पदचाप।

यही नियम है, संसार सीढ़ियों से मिलता है और परमात्मा के लिए छलांग लगानी पढ़ती है। यदि संसार छलांग लगा कर आता तो सोए हुये भी जाग जाते और परमात्मा छलांग से ही मिलेंगे क्योंकि सोते हुए भाव को ही तो जागना है और जीवन में ऐसी धन्यता जब भी प्रकट होगी, वह एक छलांग में-एक क्षण में प्रकट हो जाएगी।

जब तक अपने अस्तित्व को परमात्मा में समर्पित नहीं करते, अहं नहीं जा सकता।
करोड़ों रुपये हैं तुम्हारे पास, तो अहंकार हो सकता है और यदि करोड़ों को ठोकर मार दी तो और भारी अहंकार हो सकता है क्योंकि करोड़ों तो बहुतों के पास हैं, ठोकर मारने वाले कम ही हैं। करोड़ों की सम्पत्ति को त्याग कर साधु बनने वाले के अंदर भी अहम् हो सकता है, त्यागी जीवन में शरीर दुबला-पतला दीख रहा होगा परन्तु अहंकार तो उसका भी मोटा हो सकता है।

जीवात्मा और परमात्मा का मिलन तो एक अति सहज अनुभूति है, इसके लिए तो जितने भी प्रयास कर रहे हैं, उन सबकी कोई आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी, यदि जीवात्मा और परमात्मा के बीच जो “मन “ रूपी दीवार है, इसको हटा सकें तो। यह जो अहंकार-वासनाओं रूपी मन है, इसने हमें नहीं जकड़ा है, बल्कि हम ही इसको छोड़ना नही चाहते। कष्ट अथवा दुःख ने ठान नहीं रखी है कि हमारे जीवन में उनको आना ही है , इनको तो हम निमन्त्रण भेज भेज कर बुला रहे हैं अपने जीवन में। विचार तो यह करना चाहिए कि कौन से मार्ग हैं जिनके माध्यम से हम कष्टों को आमंत्रित कर रहे हैं ? यदि उन मार्गों को ही बंद कर दोगे तो जीवन से कष्ट स्वतः चले जाएँगे। मोक्ष प्राप्ति के लिए सब साधन बनाते रहते हैं, यदि संसार से सुलझ सको तो मोक्ष तो स्वतः मिल ही जाएगा , प्रयास से ही प्रसाद की प्राप्ति होगी।

यदि अलौकिक प्राप्तियाँ और कृपा सहज ही हो जाती है तो फिर मीरा, सूरदास, तुलसीदास, रविदास, आदि मात्र पर ही क्यों होती ? सभी पर होनी चाहिए थी। यदि ईश्वर कृपा मात्र से मिलते हैं, तब तो बड़ी विचित्र स्थिति है, कि कुछ को मिल रहे हैं और कुछ को नहीं, इस भाव में तो कृपानिधि की सहज कृपा तो दिख नहीं रही है। कृपा प्राप्ति के लिए साधन बनाने होंगे, प्रयास करने होंगे, जब प्रयास करेंगे तभी कृपा प्रसाद की प्राप्ति होगी और अगर प्रयास के बिना परमात्मा मिलता होता, तो सभी को मिलना चाहिए।

यह भी सत्य है कि प्रभु की कृपा तो निरन्तर बरस रही है, तुम्हारी मटकी ही उल्टी कर रखी है, कृपा आएगी कहाँ? यह तो ऐसे ही है कि जैसे वर्षा का जल अपने पूरे वेग से बरस रहा है और हम अपनी मटकी उल्टी कर लें तो जल नहीं मिलेगा और फिर हम कहें कि हम पर तो कृपा हो नहीं रही है। यह भी सत्य है कितनी भी अपनी मटकी सीधी कर लें किंतु भरेगी प्रभु की कृपावृष्टि से ही। श्रम करो, साधन-भजन करो, यह बहुत ज़रूरी है मटकी सीधी करने के लिए ! श्रम साधन भजन से प्रभु नहीं मिलेंगे परंतु उनकी कृपा अवश्य मिलेगी और जब कृपा मिल जाएगी तो संभव है कृपा से परमात्मा भी मिल जाएँ।

साधन भजन सब इस भाव से करें कि मुझे ही करना है और कृपा स्वयं के प्रयास से ही मिलेगी, स्वयं की लगन पर ही निर्भर है और अंतस में यह भी चलता रहे कि मुझ क्षुद्र प्राणी की क्या बिसात, क्या क्षमता? मेरे से तो त्रुटि बनी ही रहेंगी परंतु जो बन सकेगा मनसा -वाचा-कर्मणा करता रहूँगा ताक‍ि प्रभु आपकी कृपा मिल सके। मेरा कुछ नहीं है जो कुछ होगा आपकी कृपा से ही होगा। कर्ता के भाव से तो बचना ही चाहिए, पुण्य हो या पाप में “मेरे “ का भाव नहीं रखना चाहिए। जब पुण्य कर्म तुम कर रहे हो तो जाने अनजाने में जो सारे पाप कर्म हो रहे हैं, वो भी तुम्हारे ही मत्थे पड़ेंगे। मेरा मंदिर कहो अथवा मेरी दुकान, कोई विशेष अन्तर नहीं पड़ेगा, क्योंकि जो “मेरा “ है वो तुम्हें परमात्मा से बहुत दूर कर रहा है। किसी महापुरुष ने कहा है कि कर्ता का भाव स्वयं में ही पाप है और जो यह “मेरा” है, यही संसार है। यदि अहंकार और वासनाओं का कठोरता से दमन कर लिया तो कोई पाप कर्म होगा ही नहीं।

साधन-भजन निर्मल भाव से ही बनेगा और इसी भाव से दिव्य प्राप्तियाँ सम्भव है।जैसे छोटे बच्चे को कुछ न कुछ चाहिए ही और बड़े उनकी सभी माँगों पर ध्यान भी नही देते। अतः कामना वह हो जो स्वीकार हो सके , पात्रता के अनुरूप हो। नए बच्चे का जन्म होने वाला है, माँ अपने चार वर्ष के बच्चे को समझा रही है, तैयार कर रही है, जिससे वह आनेवाले बच्चे से प्रेमपूर्वक सहज तालमेल बैठा सके, जैसे सभी माँ करती हीं हैं। बोल रही हैं कि तुमको खुश होना चाहिए, भगवान तुम्हारा छोटा भाई भेज रहे हैं। बच्चा और उदास, माँ सोच रही है कि इसको क्या हुआ और पूछा कि क्या तुझे ख़ुशी नहीं हो रही है? बच्चा बोला ”नहीं” क्योंकि मैं तो रोज़ भगवान से प्रार्थना कर रहा हूँ कि भाई नहीं छोटा घोड़ा भेज दो। लगता है मेरी प्रार्थना नहीं सुनी गयी।

बच्चे निर्मल और निर्दोष हैं, बच्चों की कामना बच्चों की कामनाएँ ही हैं, परंतु हमारी कामनाएँ कौन सी परिपक्व हैं। बच्चों की माँगे निर्दोष हैं और हमारी माँगों में कपट – चालबाजी भरी रहतीं हैं। सांसारिक जीवन में भी प्रार्थना शब्द का अर्थ ही “माँगना“ कर दिया है, इसलिए माँगने वाले को लिखते हैं “प्रार्थी “।

वासनाएँ रूपी मन के पर्दे हटा कर प्रभु से प्रेम करो। परमात्मा की इस सृष्टि में सर्व सर्वत्र अलौकिक अनुभूतियाँ शुरू हो जाएँगी। “मैं “ और “मेरा “ का भाव नष्ट हो जाएगा और आत्मा से साक्षात्कार हो उठेगा। इस परमानंद की अवस्था के लिए “अहं “ के ऊपर खड़े होकर इस चिदानंद “आत्मा“ की तरफ़ एक छलांग भर लगानी है। चंद्रमा की रश्मियों सी निर्मल यह अवस्था, वासनाओं को तत्काल नष्ट कर देगी और जब वासनाएँ ही नष्ट हो जाएँगी तो मोक्ष तुम्हारी प्रतीक्षा करेगा। तुम देखोगे कि दीनदयालु क्षणमात्र में कृपा की ऐसी वृष्टि करेंगे कि तुम्हारी झोली छोटी पड़ जाएगी- कृपावृष्टि के जल से तुम्हारी मटकी छलछला उठेगी।

दृष्टि का विस्तार कर सोच को यथार्थ से जोड़ने का समय

 

– कप‍िल शर्मा,
सच‍िव, श्री कृष्ण जन्मस्थान,
मथुरा

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