600 से ज्यादा डाकुओं को आत्मसमर्पण कराने वाले सुब्बाराव का निधन

चंबल के बीहड़ों में डकैतों की बंदूकों को शांत कराने वाले गांधीवादी एसएन सुब्बाराव नहीं रहे। बुधवार सुबह जयपुर में उनका निधन हो गया। 7 फरवरी 1929 को कर्नाटक के बेंगलुरू में पैदा हुए सुब्बाराव ने 1970 के दशक में चंबल को अपना कार्यक्षेत्र बनाया और 600 से ज्यादा डाकुओं को आत्मसमर्पण के लिए तैयार किया।
सुब्बाराव का शुरुआती जीवन बेंगलुरू के श्रीनगर इलाके में बीता था। अंग्रेजी शासन के विरोध में साल 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन शुरू हुआ था, तब उनकी उम्र 13 साल थी। इतनी छोटी उम्र में ही सुब्बाराव इस आंदोलन में कूद पड़े थे। उन्हें दीवार पर भारत छोड़ो लिखते हुए पकड़ा गया था। हालांकि, बाद में बच्चा समझकर छोड़ दिया गया था।
डकैतों को मनाने के लिए परिवार का लिया सहारा
1970 के दशक में सुब्बाराव ने जब चंबल क्षेत्र को अपना कार्यक्षेत्र बनाया, तब यहां डकैतों का बोलबाला था। उन्होंने डकैतों को हिंसा छोड़ मुख्यधारा में शामिल होने को कहा, लेकिन वे तैयार नहीं हुए। सुब्बाराव डाकुओं के परिवार वालों को लेकर उनके पास गए। उन्हें आश्वासन दिया कि सरकार की ओर से नई जिंदगी शुरू करने के लिए उन्हें सहूलियतें दी जाएंगी। वे राजी हुए तो उन्होंने सरकार से इस बारे में बात की।
माधौ सिंह, मलखान सिंह… सबको शांति के रास्ते पर लाए
चंबल की बीहड़ों में खौफ का पर्याय रहे माधौ सिंह, मलखान सिंह और मुहर सिंह जैसे डकैतों को सुब्बाराव ने सरेंडर के लिए तैयार किया था। दस्यु सरदार माधौ सिंह की गैंग में 400 से ज्यादा डाकू थे, लेकिन पुलिस उन तक पहुंच नहीं पाती थी। सुब्बाराव अकेले उसके पास पहुंचे। सरेंडर के लिए नहीं माना तो उसके परिवार को साथ लेकर गए। मुहर सिंह व मलखान सिंह जैसे डाकुओं को सरेंडर करने के लिए भी उन्होंने यही तरीका अपनाया।
एक साथ 70 डाकुओं का कराया सरेंडर
सुब्बाराव के प्रयासों से डकैतों के लिए खुली जेल स्थापित की गई। डकैतों के ऊपर लगे सभी केस वापस लिए गए। उनके परिवार के सदस्यों को पुलिस में नौकरी दिलवाई। सरकार की ओर से डकैतों के परिवारों को जमीन दी गई। इसके बाद जौरा के पास पगारा गांव में 70 डाकुओं ने एक साथ आत्मसर्मपण किया था। इस मौके पर आचार्य विनोवा भावे, जयप्रकाश नारायण व एमपी के तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रकाश चन्द्र शेट्‌टी मौजूद थे। सुब्बाराव के प्रयासों से चंबल क्षेत्र के कुल 672 डाकुओं ने आत्मसमर्पण किया था।
जौरा में पहला गांधी आश्रम स्थापित किया
महात्मा गांधी की शांति की विचारधारा के अनुयायी सुब्बाराव ने इसके बाद जौरा में पहला गांधी आश्रम स्थापित किया। वे खुद भी इसी आश्रम में रहते थे। इसके बाद देश के कई हिस्सों में गांधी आश्रम बनाए गए। आज करीब 20 देशों में गांधी आश्रम चल रहे हैं।
-एजेंसियां

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