जब मुल्‍ला नसरुद्दीन के गांव में हाथी बिकने आया

मंदिरों में जाने वाले लोगों को देखकर यह मत समझ लेना कि वो परमात्‍मा की खोज कर रहे हैं। यह भी हो सकता है कि वह भेड़चाल के तहत दुनिया को दिखाने के लिए मंदिर में घंटी बजाने पहुंच जाते हों।
मुल्‍ला नसरुद्दीन के गांव में एक हाथी बिकने के लिए आया। मुल्‍ला ने इससे पहले इतने निकट से कभी हाथी नहीं देखा था इसलिए वह कभी हाथी को पीछे से जाकर देखता, कभी आगे से।
उधर, हाथी बेचने वाले ने समझा कि हो न हो इसे हाथियों की अच्‍छी जानकारी है। ऐसा हुआ तो यह मेरे हाथी में कोई ऐब ढूंढकर सबको बता देगा। फिर तो मेरा हाथी बिकने से रहा।
हाथी मालिक ने चुपचाप जेब से सौ रुपए का नोट निकाला और मुल्‍ला को दे दिया। मुल्‍ला ने सौ की नोट तो जेब में रख ली किंतु फिर हाथी के आगे-पीछे घूमने लगा।
हाथी मालिक ने मुल्‍ला को सौ रुपए का एक और नोट दे दिया। मुल्‍ला ने वह नोट भी अपनी जेब के हवाले किया लेकिन हाथी के आगे-पीछे घूमना बंद नहीं किया।
इस बार हाथी वाले ने झुंझलाकर मुल्‍ला से पूछ ही लिया- मियां, दो सौ रुपए आपको दे दिए लेकिन आप हैं कि मानते ही नहीं। आखिर मैं भी तो सुनूं कि मेरे हाथी में ऐसा कौन सा ऐब है जिसे आप घूम-घूम कर देख रहे हो।
यह सुनकर मुल्‍ला ने कहा- नाहक परेशान हो रहे हो भाई, मैं तो यह जानना चाहता हूं कि यह खाता कहां से है। मुझे कहीं इसका मुंह दिखाई नहीं दे रहा।