क्या है होल‍िकाष्टक की ज्योतिषीय धारणा, क्यों नहीं क‍िए जाते शुभ कार्य

मानवमन होलाष्टक के आठों दिन में कई मस्तिष्क विकारों, शंकाओं और दुविधाओं आदि से घिरा रहता है जिसके चलते शुरू किए गए कार्य के बनने के बजाय बिगड़ने की संभावना ज्यादा रहती है।

ग्रह-नक्षत्र के कमजोर होने के कारण इस दौरान जातक की निर्णय क्षमता कम हो जाती है जिससे गलत फैसले से हानि की संभावना रहती है।
ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, फाल्गुन माह में होली के कुछ दिनों पहले सभी ग्रह और नक्षत्र अशुभ स्थिति में पहुंच जाते हैं जिस कारण से चारों ओर काफी मात्रा में नकारात्मक ऊर्जा फैल जाती है। जिस कारण से होलाष्टक आरंभ होने लेकर इसके सामाप्त होने तक कोई भी शुभ काम नहीं किया जाता है।

इस वर्ष होलाष्टक का आरंभ 22 मार्च से होने जा रहा है। यह फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि रहेगी। इस तिथि पर चंद्रमा मिथुन राशि में विराजमान रहेंगे। आद्र्रा नक्षत्र रहेगा। वृष राशि में राहु और मंगल, वृश्चिक राशि में केतु, मकर राशि में गुरू और शनि, कुंभ राशि में बुध और मीन राशि में सूर्य व शुक्र विराजमान रहेंगे।

होलाष्टक का प्रभाव तीर्थ क्षेत्र में नहीं माना जाता है। लेकिन इन 8 दिनों तक मौसम परिवर्तित हो रहा होता है। व्यक्ति रोग की चपेट में आ सकता है। ऐसे में मन की स्थिति भी अवसाद ग्रस्त रहती है। इसलिए शुभ कार्य वर्जित माने गए हैं। होलाष्टक के आठ दिनों में व्रत, पूजन और हवन की दृष्टि से अच्छा समय माना गया है। ज्योतिष विद्वानों की मानें तो अष्टमी को चंद्रमा, नवमी तिथि को सूर्य, दशमी को शनि, एकादशी को शुक्र और द्वादशी को गुरु, त्रयोदशी को बुध, चतुर्दशी को मंगल तथा पूर्णिमा को राहु उग्र स्वभाव के हो जाते हैं। इन ग्रहों के निर्बल होने से मनुष्य की निर्णय क्षमता निर्बल हो जाती है जिसके चलते मनुष्य अपने स्वभाव के विपरीत फैसले लेने लगता है। यही कारण है कि व्यक्ति के मन को रंगों और उत्साह की ओर मोड़ दिया जाता है।

Dharm Desk – Legend News

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