क्‍या कहती हैं ‘टीपू’ और ‘पप्‍पू’ के बारे में ‘बाबा नास्त्रेदमस’ की भविष्‍यवाणियां?

सुना है कि मशहूर फ्रांसीसी भविष्‍यवक्‍ता ‘बाबा नास्त्रेदमस’ 16वीं सदी के उत्तरार्ध में ही बोल गए थे कि भारत एक और ‘टीपू’ को जन्‍म देगा।
20वीं सदी के विदाकाल से ठीक पहले जन्‍मा यह ‘सॉफ्ट लायन’ कुलभूषण अक्‍ल के मामले में अपने हमउम्र उस ‘चंपू’ से लगातार प्रतिस्‍पर्धा करेगा, जिसे राजनीति जगत में लोग ‘पप्‍पू’ उपनाम से संबोधित करेंगे।
‘बाबा नास्त्रेदमस’ की भविष्‍यवाणी पर भरोसा करें तो राजनीति में समकालीन ये ‘टीपू’ और ‘पप्‍पू’ अपने-अपने कुल के ऐसे ‘चिराग’ साबित होंगे जिनसे कोई ‘जिन्‍न’ भी सौ कोस दूर भागेगा क्‍योंकि इनकी काबिलियत ही ऐसी होगी।
मसलन ये जिस थाली में खाएंगे उसी में छेद करने के आदी होंगे और जिस पेड़ की डाल पर बैठेंगे, उस पर तब तक आरी चलाते रहेंगे जब तक कि डाल टूटकर धराशायी न हो जाए।
मुगलिया सल्‍तनत के कुछ खास किरदारों से प्रभावित ये ‘टीपू’ और ‘पप्‍पू’ अपनी फितरत से राजनीतिक जगत को तब तक चौंकाते रहेंगे जब तक कि अपनी-अपनी पार्टी और परिवार को अदृश्‍य साबित न कर लें।
विलायत से पढ़-लिखकर राजनीतिक विरासत को संभालने वाले ये ‘टीपू’ और ‘पप्‍पू’ अक्‍सर सार्वजनिक रूप से अपनी नायाब अक्‍ल का नमूना पेश करने में पीछे नहीं रहेंगे ताकि कोई उन्‍हें विस्‍मृत न कर सके।
जनता के साथ-साथ उनके जन्‍मदाता भी यह न भूल सकें कि उन्‍होंने किन नमूनों को जन्‍म दिया है।
‘बाबा नास्त्रेदमस’ का तो यहां तक कहना है कि उनके बाद वाली पीढ़ियां इस बात पर आसानी से भरोसा नहीं करेंगी कि अक्‍ल के अंधे लेकिन गांठ के पूरे ऐसे-ऐसे कालीदासों ने कभी किसी राज्‍य पर और पार्टी पर आधिपत्‍य कायम किया था।
उन्‍हें उस दौर की जनता पर भी आश्‍चर्य होगा जो उन्‍हें न सिर्फ ढोती रही बल्‍कि उनकी जय-जयकार भी करती रही। वो भी तब जबकि जनता की आंखों के सामने दोनों ने एक-दो बार नहीं बार-बार खुद को खुदगर्ज साबित किया। किसी ने बाप-चाचाओं से भरे-पूरे परिवार को बर्फ में लगा दिया तो किसी ने परिवार का इतना ‘नियोजन’ कर डाला कि ‘परिवार ही पार्टी’ बनकर रह गया।
चूंकि ‘बाबा नास्त्रेदमस’ अपनी समस्‍त भविष्‍यवाणियां सांकेतिक भाषा में करके गए हैं इसलिए मजबूरी में यहां भी सब-कुछ संकेतों में ही समझाया जा रहा है। शायद हमारी तरह ‘बाबा नास्त्रेदमस’ भी जानते होंगे कि 2022 आते-आते तत्‍कालीन जनता सब समझ जाएगी। वो ये भी समझ जाएगी कि विरासत से राजयोग लिखने का समय सदियों पहले बीत गया। अब तो जो मिलेगा, रामजी की कृपा और जनता रूपी जनार्दन के मताधिकार से मिलेगा।
टीपू और पप्‍पू की सबसे बड़ी उलझन यही है, उन्‍हें समझ में नहीं आ रहा कि वो …मेरा पिया घर आया ओ रामजी, गाएं या फिर अपनी-अपनी पार्टी के लिए इसी प्रकार राम-नाम सत्‍य बुलवाने का बंदोबस्‍त करते रहें।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

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