काल बनता संक्रमणकाल- श्रीप्रकाश शुक्ला

भारत ही नहीं समूची दुनिया इस समय कोरोना के कारण संक्रमणकाल से गुजर रही है। हर मुल्क के सामने आज अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूती देने की बजाय अपनी आवाम के जीवन को सुरक्षित रखना है। यह काम आसान नहीं कहा जा सकता। लॉकडाउन ने पुरुषों की अपेक्षा महिला और बच्चों के जीवन को अधिक मुश्किल में डाल रखा है। आज हर तरफ असुरक्षा की भावना बलवती हो गई है। भारत जैसे विकासशील देश के सामने आसन्न संकट इस बात का साफ संकेत है कि आने वाले दिन कतई मुफीद नहीं हैं। सच तो यह है कि हम इस लड़ाई को जोश से नहीं होश में रहकर ही जीत पाएंगे।

श्रीप्रकाश शुक्ला

देशव्यापी लॉकडाउन का तीसरा सप्ताह शुरू होते ही  हर तरफ इस बात के कयास लगाये जा रहे हैं कि 14 अप्रैल के बाद देशव्यापी बंदी खत्म होगी या नहीं।  भारत में जिस तरह की स्थिति है उसे देखते हुए लॉकडाउन हटाने का निर्णय आत्मघाती साबित हो सकता है। कोरोना संक्रमण के खिलाफ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की चिन्ता जायज है। यह चिन्ता इसलिए भी कि सारे प्रयासों के बावजूद देश में संक्रमितों और मरने वालों का आंकड़ा लगातार बढ़ रहा है। लॉकडाउन के चलते चिकित्सा उपकरणों व दवाओं का उत्पादन जहां सामान्य तरीके से नहीं हो पा रहा है वहीं रबी की फसल खेतों में ही जमींदोज हो रही है। ऐसे नाजुक समय में यदि अनाज खरीद की अनुमति भी दी जाती है तो मंडियों में सोशल डिस्टेंसिंग की समस्या जटिल हो सकती है। दुकानें बंद होने से दुकानदारों का धंधा चौपट हो रहा है तो असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले कामगारों के उदरपूर्ति की समस्या भी मुंहबाए खड़ी है। यदि लॉकडाउन बढ़ता है तो इस तबके की दुश्वारियां बेहद चिन्ताजनक हो जाएंगी।

संक्रमणकाल के इस दौर में केन्द्र सरकार भी मंथन की स्थिति में है, इसकी वजह भारतीय दवा उद्योग, वाहन उद्योग, केमिकल उद्योग, खिलौना कारोबार तथा इलेक्ट्रिकल एवं इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे अनेक कारोबारों का ठप हो जाना है। चूंकि ये सभी प्रमुख कारोबार चीन से आयातित कच्चे माल एवं वस्तुओं पर आधारित हैं, सो अब इनकी आपूर्ति रुक गई है।  इतना ही नहीं, हम चीन को जिन वस्तुओं का निर्यात करते हैं, वे उद्योग-कारोबार भी कोरोना संक्रमण के कारण बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं। चीन सहित विभिन्न देशों को निर्यात के सौदे रुक गए हैं, जिससे इस क्षेत्र में भी नई रोजगार चुनौतियां उत्पन्न हो गई हैं। दरअसल, न केवल चीन पर आधारित आयात-निर्यात घटा है, वरन देश के सम्पूर्ण आंतरिक उद्योग-कारोबार और विदेश व्यापार में भी कमी आ गई है। ऐसे में कई उद्योग-कारोबार कर्मचारियों को बिना वेतन अवकाश भी देते हुए दिखाई दे रहे हैं। इतना ही नहीं, दैनिक मजदूरी करने वालों को भी काम की कमी हो गई है।

लॉकडाउन के कारण उद्योग-कारोबार निराशाजनक दौर में पहुंच गए हैं। देश के उद्योग-कारोबार सेवा क्षेत्र और कृषि क्षेत्र में रोजगार की सम्भावनाएं क्षीण हो गई हैं। देश के कोने-कोने में छोटे और बड़े शहरों से लाखों की संख्या में प्रवासी मजदूर अपने-अपने गांवों की ओर पलायन कर गए हैं। कोरोना प्रकोप से देश के उद्योग-कारोबार में कार्यरत लोगों की नौकरियां स्थायी रह पाएंगी इसमें भी संदेह है। देखा जाए तो देश के कुल कार्यबल में गैर-संगठित क्षेत्र की हिस्सेदारी 90 फीसदी है। साथ ही देश के कुल कार्यबल में 20 फीसदी लोग रोजाना की मजदूरी से ही अपना और अपने परिवार का जीवन-यापन करते हैं। देखा जाए तो लॉकडाउन के कारण देश में चारों ओर रोजगार सम्बन्धी चिन्ताएं लोगों को मानसिक रूप से परेशान कर रही हैं।

ऐसे नाजुक समय में यदि सरकार किसी सीमा तक लॉकडाउन में छूट देकर अर्थव्यवस्था को गति भी देना चाहे तो आवाम का जीवन संकट में पड़ सकता है।  नि:संदेह जब हम दो-तिहाई लॉकडाउन खत्म होने के बाद भी कोरोना संक्रमण के खतरे से नहीं उबर पाये हैं और हॉट-स्पॉटों का विस्तार जारी है तो पूरी तरह से लॉकडाउन हटाने का औचित्य नजर नहीं आता। भारत जैसे सघन जनसंख्या वाले देश में ऐसी अवस्था में थोड़ी सी छूट भी विनाशकारी साबित हो सकती है। निःसंदेह अगले कुछ दिनों की स्थिति ही किसी निर्णय पर पहुंचने का आधार बन पाएगी। देश को महामारी से बचाना सरकारों की पहली प्राथमिकता है। फिर भी राज्यों में संक्रमण की स्थितियों को श्रेणियों में बांटकर कुछ निर्णय लिये जा सकते हैं। इसके बावजूद सोशल डिस्टेंसिंग की नीति का सख्ती से पालन सुनिश्चित करना जरूरी है।

संकेत मिल रहे हैं कि स्कूल-कॉलेज, सिनेमाघर व धार्मिक स्थलों पर फिलहाल निर्णय नहीं लिया जा सकता है। ऐसे में चरणबद्ध तरीके से लॉकडाउन खोलने पर ही विचार होगा। सरकार चीन द्वारा वुहान में लॉकडाउन हटाने के अनुभव का लाभ भी ले सकती है। जहां पांच दिन तक कोई मामला नहीं आने पर ही यह निर्णय लिया गया। वहां ढील शर्तों के साथ दी गई, मगर संक्रमण को ट्रैक करने के लिए ऐप का सहारा लिया गया। चीन में लोगों को ट्रैक करने के लिए बड़ी योजना है और नेशनल आईडी के जरिये हर मूवमेंट को ट्रैक किया जाता है, जो भारत में फिलहाल सम्भव नहीं दिखता। वहीं सिंगापुर का विकल्प सख्ती से सोशल डिस्टेंसिंग को लागू करना भी है। जाहिर है कि सरकार देश के लगभग तीन सौ जिलों के संक्रमण के दायरे में आने के बाद उन इलाकों को सीमित राहत दे सकती है, जहां संक्रमण का कोई भी मामला प्रकाश में नहीं आया है। हॉट-स्पॉट इलाकों को अलग ढंग से नियंत्रित करना होगा तथा जांच का दायरा बढ़ाने के साथ-साथ अस्पतालों की व्यवस्थाओं को और भी चाक-चौबंद किया जाना जरूरी है। कोरोना संक्रमण के खिलाफ लड़ाई लम्बी खिंच सकती है ऐसे में हर देशवासी का यह कर्तव्य है कि वह सब्र से काम लेते हुए सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करे। जीवन सुरक्षित होगा तभी हम खुशहाल भविष्य की उम्मीद कर सकते हैं।

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