कल है वैशाख अमावस्या: पानी में क्यों म‍िलाते हैं गंगाजल व तिल

वैशाख अमावस्या पर गंगाजल व त‍िल म‍िलाकर स्नान करने का व‍िधान शास्त्रों बताया गया है, इसके पीछे के वैज्ञान‍िक कारण आज हम सभी को समझ आ रहे होंगे जबक‍ि कोरोना ने अपने व‍िष से पूरे वातावरण को दूष‍ित कर द‍िया है। गंगा जल की शुद्धता और उसमें त‍िल म‍िलाकर नहाने से गर्मी की ऋतु में होने वाले त्वचा संबंधी रोग नहीं होते। कल 11 मई मंगलवार को वैशाख महीने की अमावस्या है।

इसके अलावा इस अमावस्या पर श्राद्ध से पितृ तृप्त होते हैं व इस दिन अन्न और जल का दान करने से कई यज्ञों का फल मिलता है। इस दिन प्रदोष काल यानी शाम को दीपदान करने से अकाल मृत्यु नहीं होती और बीमारियों से छुटकारा मिलता है।

पौराणिक कथा के मुताबिक इस पर्व पर पिंडदान, श्राद्ध या तर्पण करने से पितरों को तृप्ति मिलती है। दक्षिण भारत में वैशाख अमावस्या पर शनि जयंती भी मनाई जाती है। इसलिए इस दिन शनिदेव की पूजा और आराधना का भी महत्व है। साथ ही वैशाख महीने की अमावस्या पर कुछ बातों का खासतौर से ध्यान रखना चाहिए।

वैशाख अमावस्या के दिन ये करें
वैशाख अमावस्या पर व्रत करना चाहिए। इससे संयम, आत्मबल और आत्मविश्वास बढ़ता है। इस दिन सूर्योदय से पहले उठकर पानी में गंगाजल और तिल मिलाकर नहाना चाहिए। ऐसा करने से हर तरह के दोष और बीमारियां दूर होने लगती हैं। इसके बाद पानी में तिल मिलाकर सूर्य को अर्घ्य देने से ग्रह दोष दूर होते हैं। फिर पीपल के पेड़ के नीचे दीपक जलाना चाहिए। ऐसा करने से बीमारियों से छुटकारा मिलता है। पितरों के लिए श्राद्ध करना चाहिए और जरूरतमंद लोगों को खाना खिलाना चाहिए। इस दिन किए गए अन्न और जल दान से कई यज्ञों को फल मिलता है।

अमावस्या पर उड़द खाने से बचें
अमावस्या पर उड़द या इससे बनी कोई भी चीज न खाएं। इस दिन मांसाहार और किसी भी तरह का नशा नहीं करना चाहिए। भोग और विलासिता से बचने की कोशिश करनी चाहिए। मांगलिक कार्य, शुभ कामों के लिए खरीदारी और नए काम की शुरुआत नहीं करनी चाहिए।

वैशाख अमावस्या की पौराणिक कथा

वैशाख अमावस्या के महत्व से जुड़ी पौराणिक कथा के अनुसार धर्मवर्ण नाम के एक ब्राह्मण थे। एक बार उन्होंने किसी महात्मा के मुख से सुना कि कलियुग में भगवान विष्णु के नाम स्मरण से ज्यादा पुण्य किसी भी काम में नहीं है।

इसके बाद धर्मवर्ण ने सांसारिक जीवन छोड़ दिया और संन्यास लेकर भ्रमण करने लगे। एक दिन घूमते हुए वे पितृलोक पहुंचें। वहां उनके पितर बहुत कष्ट में थे। पितरों ने बताया कि ऐसी हालत तुम्हारे संन्यास के कारण हुई है। क्योंकि उनके लिए पिंडदान करने वाला कोई नहीं है।

पितरों ने कहा अगर तुम वापस जाकर गृहस्थ जीवन की शुरुआत करो, संतान उत्पन्न करो और साथ ही वैशाख अमावस्या के दिन विधि-विधान से पिंडदान करो। तो हमें राहत मिल सकती है।

धर्मवर्ण ने उन्हें वचन दिया कि वह उनकी ये इच्छा पूरी करेंगे। इसके बाद उन्होंने संन्यासी जीवन छोड़कर फिर से सांसारिक जीवन अपनाया और वैशाख अमावस्या पर विधि विधान से पिंडदान कर अपने पितरों को मुक्ति दिलाई।

Dharma Desk – Legend News

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *