आज सुमित्रानंदन पंत के जन्‍मदिन पर पढ़िए उनकी दो कविताएं

छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक सुमित्रानंदन पंत का आज जन्‍मदिन है। इस युग को जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ और रामकुमार वर्मा जैसे कवियों का युग कहा जाता है। उनका जन्म उत्तराखंड के प्रसिद्ध पर्यटन स्‍थल कौसानी (बागेश्वर) में 20 मई सन् 1900 को हुआ था। 28 दिसम्बर 1977 को यूपी के इलाहाबाद में उनका देहांत हुआ।
झरना, बर्फ, पुष्प, लता, भ्रमर-गुंजन, उषा-किरण, शीतल पवन, तारों की चुनरी ओढ़े गगन से उतरती संध्या ये सब तो सहज रूप से काव्य का उपादान बने। निसर्ग के उपादानों का प्रतीक वबिम्ब के रूप में प्रयोग उनके काव्य की विशेषता रही। उनका व्यक्तित्व भी आकर्षण का केंद्र बिंदु था। गौर वर्ण, सुंदर सौम्य मुखाकृति, लंबे घुंघराले बाल, सुगठित शारीरिक सौष्ठव उन्हें सभी से अलग मुखरित करता था। सुमित्रानंदन पंत को 1961 में पद्म भूषण और 1968 में ज्ञानपीठ पुरस्‍कार देकर सम्‍मानित किया गया। तो चलिए इसी बात पर हो जाए उनकी दो कविताएं जो हमें अपनी जड़ों तक ले जायेंगी वरना कौन ऐसा कर सकता है कि सात वर्ष की उम्र में, जब वे चौथी कक्षा में ही पढ़ रहे थे, उन्होंने कविता लिखना शुरु कर दिया था।

पहली कविता: तितली जिसका रचनाकाल: मई 1935 है…

नीली, पीली औ’ चटकीली

पंखों की प्रिय पँखड़ियाँ खोल,

प्रिय तिली! फूल-सी ही फूली

तुम किस सुख में हो रही डोल?

चाँदी-सा फैला है प्रकाश,

चंचल अंचल-सा मलयानिल,

है दमक रही दोपहरी में

गिरि-घाटी सौ रंगों में खिल!

तुम मधु की कुसुमित अप्सरि-सी

उड़-उड़ फूलों को बरसाती,

शत इन्द्र चाप रच-रच प्रतिपल

किस मधुर गीति-लय में जाती?

तुमने यह कुसुम-विहग लिवास

क्या अपने सुख से स्वयं बुना?

छाया-प्रकाश से या जग के

रेशमी परों का रंग चुना?

क्या बाहर से आया, रंगिणि!

उर का यह आतप, यह हुलास?

या फूलों से ली अनिल-कुसुम!

तुमने मन के मधु की मिठास?

चाँदी का चमकीला आतप,

हिम-परिमल चंचल मलयानिल,

है दमक रही गिरि की घाटी

शत रत्न-छाय रंगों में खिल!

–चित्रिणि! इस सुख का स्रोत कहाँ

जो करता निज सौन्दर्य-सृजन?

’वह स्वर्ग छिपा उर के भीतर’–

क्या कहती यही, सुमन-चेतन?

दूसरी कविता चींटी

चींटी को देखा?

वह सरल, विरल, काली रेखा

तम के तागे सी जो हिल-डुल,

चलती लघु पद पल-पल मिल-जुल,

यह है पिपीलिका पाँति! देखो ना, किस भाँति

काम करती वह सतत, कन-कन कनके चुनती अविरत।

गाय चराती, धूप खिलाती,

बच्चों की निगरानी करती

लड़ती, अरि से तनिक न डरती,

दल के दल सेना संवारती,

घर-आँगन, जनपथ बुहारती।

चींटी है प्राणी सामाजिक,

वह श्रमजीवी, वह सुनागरिक।

देखा चींटी को?

उसके जी को?

भूरे बालों की सी कतरन,

छुपा नहीं उसका छोटापन,

वह समस्त पृथ्वी पर निर्भर

विचरण करती, श्रम में तन्मय

वह जीवन की तिनगी अक्षय।

वह भी क्या देही है, तिल-सी?

प्राणों की रिलमिल झिलमिल-सी।

दिनभर में वह मीलों चलती,

अथक कार्य से कभी न टलती।

सुमित्रानंदन पंत की इन दो ही कविताओं में अपना बचपन ढूढ़ने वाले हम उन्‍हें अपनी विनम्र श्रद्धांजलि देते हैं।

-Legend News

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