आज है महेश नवमी, इसी दिन हुई थी माहेश्वरी समाज की उत्पत्ति

कोरोना ने पूजा पाठ के सभी स्थाप‍ित पद्धत‍ियों को बदल कर रख द‍िया है। आज माहेश्वरी समाज महेश नवमी मना रहा है। श‍िव जी के ये भक्त घर में रह कर ही उनकी पूजा अर्चना कर रहे हैं।

ज्येष्ठ महीने के शुक्लपक्ष की नवमी तिथि को भगवान शिव की विशेष पूजा की जाती है। इस दिन को महेश नवमी पर्व के रुप में मनाया जाता है। माना जाता है कि इस दिन ही माहेश्वरी समाज की उत्पत्ति हुई थी। इसलिए माहेश्वरी समाज द्वारा यह पर्व बड़ी ही धूमधाम से मनाया जाता है। महेश नवमी के दिन व्रत और भगवान शिव की पूजा करने का भी विधान है। ज्येष्ठ महीने में शिवलिंग पर जल चढ़ाने से हर तरह के पाप दूर हो जाते हैं।

इसलिए मनाते हैं महेश नवमी
महेश नवमी पर खासतौर से माहेश्वरी समाज द्वारा मनाया जाता है। मान्यता के अनुसार माहेश्वरी समाज के पूर्वज क्षत्रिय वंश के थे। किसी कारण से उन्हें ऋषियों ने श्राप दे दिया। तब इसी दिन भगवान शंकर ने उन्हें श्राप से मुक्त किया व अपना नाम भी दिया। यह भी प्रचलित है कि भगवान शंकर की आज्ञा से ही इस समाज के पूर्वजों ने क्षत्रिय कर्म छोड़कर वैश्य या व्यापारिक कार्य को अपनाया।

वैसे तो महेश नवमी का पर्व सभी समाज के लोग मनाते हैं, लेकिन माहेश्वरी समाज द्वारा इस पर्व को बहुत ही भव्य रूप में मनाया जाता है। इस उत्सव की तैयारी पहले से ही शुरू हो जाती है। इस दिन धार्मिक व सांस्कृतिक कार्यक्रम किए जाते हैं। कुछ स्थानों पर चल समारोह भी निकाले जाते हैं। यह पर्व भगवान शंकर और पार्वती के प्रति पूर्ण भक्ति और आस्था प्रकट करता है।

प्रतिवर्ष ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की नवमी को “महेश नवमी” का उत्सव मनाया जाता है। परंपरागत मान्यता के अनुसार माहेश्वरी समाज की वंशोत्पत्ति युधिष्ठिर संवत 9 के ज्येष्ठ शुक्ल नवमी को हुई थी, तबसे माहेश्वरी समाज प्रतिवर्ष की जयेष्ठ शुक्ल नवमी को “महेश नवमी” के नाम से माहेश्वरी वंशोत्पत्ति दिन के रूप में बहुत धूम धाम से मनाता है। यह पर्व मुख्य रूप से भगवान महेश जी (महादेव) और माता पार्वती जी की आराधना को समर्पित है।

मान्यता है कि, युधिष्टिर संवत 9 जेष्ट शुक्ल नवमी के दिन भगवान महेश और आदिशक्ति माता पार्वती ने ऋषियों के शाप के कारण पत्थरवत् बने हुए 72 क्षत्रिय उमराओं को शापमुक्त किया और पुनर्जीवन देते हुए कहा की, “आज से तुम्हारे वंशपर (धर्मपर) हमारी छाप रहेगी, तुम “माहेश्वरी’’ कहलाओगे”। भगवान महेश और माता पार्वती की कृपा से 72 क्षत्रिय उमरावों को पुनर्जीवन मिला और माहेश्वरी समाज की उत्पत्ति हुई इसलिए भगवान महेश और माता पार्वती को माहेश्वरी समाज के संस्थापक मानकर माहेश्वरी समाज में यह उत्सव ‘माहेश्वरी वंशोत्पत्ति दिन’ के रुपमें बहुत ही भव्य रूप में और बड़ी ही धूम-धाम से मनाया जाता है। इस उत्सव की तैयारी पहले से ही शुरु हो जाती है। इस दिन धार्मिक व सांस्कृतिक कार्यक्रम किए जाते हैं, शोभायात्रा निकाली जाती हैं, महेश वंदना गाई जाती है, भगवान महेशजी की महाआरती होती है। यह पर्व भगवान महेश और पार्वती के प्रति पूर्ण भक्ति और आस्था प्रगट करता है।

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