दृष्टि का विस्तार कर सोच को यथार्थ से जोड़ने का समय

आज मानव का सम्पूर्ण दृष्टिकोण और चिंतन खोखला और सामान्य दृष्टि से देखें तो अर्थहीन और नीरस प्रतीत हो रहा है। जिसकी जो समझ आ रहा है, जीवन के अर्थ को समझ और समझा रहा है किंतु यह समझने को तैयार नहीं है कि जो वो समझ रहा है वह अर्थ उसकी सतही दृष्टि हो सकती है, कोई आवश्यक नहीं है कि जीवन का यथार्थ हो।

यथार्थ ज्ञान का प्रभाव जीवन में दिखना भी चाहिए। यदि ज्ञान मात्र शाब्दिक है तो निरर्थक है। सतही दृष्टि और शाब्दिक ज्ञान से तो जीवन में गम्भीरता और स्थायित्व आएगा नहीं। किसी से पता पूछा! किसी ने बताया कि जो दूर सामने पीले रंग का घर है, वहाँ से दाहिने मुड़ जाना, वहाँ से 100 कदम पर सफ़ेद मकान है, वहाँ तुमको जाना है। अच्छा ही है कि जितना एक जानना चाहता था, दूसरे ने बता दिया। दोनों को गहराई में जाने की क्या आवश्यकता?
वास्तविकता में मकान की सतह का रंग पीला और सफ़ेद है। मकान सफ़ेद और पीले नहीं हैं, लेकिन चूँकि दृष्टि बहुत ही सतही हो गयी है अतः सतह जानकर ही प्रसन्न हो गए कि मैंने मंज़िल खोज ली।

बचपन में लाल रंग की गेंद से खेलते थे। प्रसन्न रहे क‍ि गेंद का रंग लाल है। गेंद के अंदर क्या है? उसका स्वरूप क्या है? कभी जानने की इच्छा ही नहीं हुई, क्योंकि दृष्टि सतह पर ही टिकी रही।

डॉक्टर के पास गए! जैसे लक्षण हुए उन्होंने दवा दे दी। अच्छा महसूस हुआ तो प्रसन्न हो गए कि चलो ठीक हो गए। यह जो लक्षण चिकित्सा है, यही तो सतही दृष्टि है। यदि दृष्टि में गहराई होती तो ठीक नहीं, रोग मुक्त हो गए होते। दृष्टि का ही प्रभाव है कि खोखला जीवन जी रहे हैं परन्तु इसका ज्ञान नहीं है, अथवा जानबूझकर अनजान बने हुए हैं और बिना किसी सार्थक उपलब्धि के अहंकार में आत्ममुग्ध भटक रहे हैं। सांसारिक जीवन हो अथवा आध्यात्मिक मार्ग! सब का निर्धारण सतही दृष्टि से ही तो हो रहा है।

सुन्दरता अथवा कुरूपता का निर्धारण भी सतही दृष्टि कर रही है। पाप अथवा पुण्य कर्म भी सतही दृष्टि बता रही है। सम्पन्नता अथवा विपन्नता का ज्ञान भी कार, मकान, आभूषण और सम्पत्ति आदि स्थूल को देख कर ही कर रहे हो। जबकि अपने समृद्ध ज्ञान और परम्पराओं में, राजा जनक और ऋषि अष्टावक्र संवाद, विदुर चरित्र आदि उपलब्ध अनेकानेक प्रसंग का मनन करें तो समझ जाएँगे क‍ि सतही दृष्टि से मात्र खोखले विचार और थोथा जीवन ही मिल सकता है। जीवन के वास्तविक उद्देश्यों एवं स्वरूप का सही ज्ञान नहीं हो सकता। जीवन में कोई प्रवाह नहीं है, विचार कुंठित हो रहे हैं।

चिन्तन मनन अब चल चित्र आदि देख कर ही हो रहा है। सारा ज्ञान सिनेमा और सीरियल से ही प्रकट हो रहा है। जीवन स्थूल के इर्दगिर्द घूम रहा है और जीवन में जीवन्तता लुप्त हो गयी है। रहस्य अथवा जड़ तक पहुँचने की इच्छा ही नहीं होती क्योंकि सतही दृष्टि ने जीवन को स्थूल के आसपास ही समेट दिया है। परिणाम स्वरूप मनुष्य भी एक मशीन बन कर रह गया है। दृष्टि ही नहीं अपितु सोच भी अब मशीनी हो गयी है। अब तो प्रेम और दुःख की अभिव्यक्ति भी बिना स्थूल का सहारा लिए नहीं हो पा रही है। उपहारों के आदान प्रदान में अब प्रेमाभिव्यक्ति कहाँ रह गयी है। अब तो इसमें स्वार्थ एवं अपेक्षा ही दिखती है।

किसी के रूप की प्रशंसा करते समय दृष्टि मात्र रंगरूप, आभूषण, वस्त्र और शृंगार आदि पर ही जाती है। सुंदरता भी सतह ही पर तो खोज रहे हो। जो प्रेम है वह भी स्थूल पर ही तो प्रकट हो रहा है। दृष्टि ही जब सतही है तो अंत: में बिखरी अनंत सुंदरता को नहीं देख सकते। जिस सौन्दर्य का गुणगान कर रहे हो, हो सकता है उसके अंदर दुर्गुण और कुरूपता डेरा जमाए हों। सतही दृष्टि ने सोच को भी मलिन कर दिया है। कम प्रेम , अधिक प्रेम , जान से ज्यादा प्रेम आदि। ये सब शब्द प्रेम का ढोंग रूप हैं। हो सकता है तुम्हारे सांसारिक प्रपंच, वासनाएँ और स्वार्थ की अभिव्यक्ति ही प्रेम के आवरण में हो रही हों। क्या प्रेम के निर्मल प्रवाह की नाप तोल सम्भव है ? फिर तुम्हारा प्रेम कैसे नाप तोल में प्रकट हो रहा है? जैसे सत्य में यदि कुछ जोड़ा अथवा घटाया तो सत्य का स्वरूप ही बदल जाएगा। हो सकता है सत्य, झूँठ में बदल जाए। यही प्रेम भाव पर लागू होता है क्योंकि प्रेम, सत्य भाव की ही तो अभिव्यक्ति है।

यदि चिन्तन करें तो देखेंगे जहां भाव और विवेक का उपयोग होना चाहिए। वहाँ भी सतही दृष्टि ही मार्ग आदि बता रही है। सारा अध्यात्म और भक्ति भाव भी स्थूल को देख कर ही प्रकट हो रहा है। मंदिर गए, अटक गए मंदिरों के सौंदर्य में, कलाकृत‍ियों में, विशालता और भव्यता में। अंदर गए तो श्री विग्रह के शृंगार-पोशाक-आभूषण आदि में। थोड़ा सुलझे तो लगे सोचने क‍ि पुजारी जी माला-प्रसाद दे दें तो कितना अच्छा हो। भाव यही है क‍ि यदि किसी कारण से मंदिर में सांसारिक विचार और वासनाएँ उत्पन्न नहीं हुए तो प्रभु की कृपा है किंतु सारा चिन्तन – ध्यान – मनन स्थूल के इर्दगिर्द ही तो था। सतही दृष्टि और सोच से ही तो ईश्वर को खोज रहे थे। जब इस संसार से हटोगे तभी तो अनुभव कर पाओगे, उस श्री विग्रह की अनन्त ऊर्जा को। जब कानों में सांसारिक नाद / शोर जाना बंद होगा तभी सच्चिदानंद रूपी ॐ का नाद हृदय में सुन सकोगे और अपने प्राणों में श्री विग्रह को प्रतिष्ठित कर पाओगे।

विचार करो कि तीर्थ का ज्ञान और भाव भी तीर्थ की भौगोलिक सीमा के अंदर प्रवेश करते ही हो रहा है, जहां ”सीमा समाप्त और पधारने के लिए धन्यवाद ” का बोर्ड देखा, तीर्थ का भाव समाप्त। यह ज्ञान है अथवा विडम्बना।

सतही दृष्टि ने साधु -संत-आध्यात्मिक जन, सभी आवरण और रंगो में ही तो खोजे हैं। यदि उस रंग में छुपे भाव को समझ लिया होता और दृष्टि गहराई तक जाती, तो खोज सार्थक हो जाती।

यहाँ भी सांसारिक माध्यमों या कहें स्थूल का ही सहारा तो लिया है और प्रसन्न हो गए क‍ि गुरु मिल गए। यदि देखोगे गम्भीर दृष्टि से तो रंग का सहारा लेकर गुरु-संत तो खोज लिये, गुरु के साधना और तप के दर्शन उनके भजन करते स्वरूप, आश्रम की भव्यता, प्रसाद आदि में कर लिए। यहाँ भी सतही बुद्धि, स्थूल में ही तो गुरु की सारी शक्ति और आध्यात्मिक उपलब्धियों को देख और दिखा रही है। जब उनके पैर ही पकड़े बैठे रहोगे तो उस मार्ग पर कैसे चलोगे जो गुरु ने बताया है। यदि स्थूल को ही पकड़े रहे तो गुरु की कठोर साधना और भजन की जो अनन्त ऊर्जा है , उसके दर्शन कैसे कर पाओगे?
गुरु ने परमात्मा की ओर संकेत कर रहे हैं और तुम उनकी उस उँगली को पकड़ कर तो परमात्मा तक नहीं पहुँच सकते हो। यदि परमात्मा को पाना है तो उस मार्ग पर चलना होगा जिसका वह संकेत कर रहे हैं।
ईश्वर की कृपा यदि सम्पन्नता और सांसारिक ऐश्वर्य में ही देख रहे हो तो यह तो नास्तिक के ऊपर भी दिख जाएगी।सच्ची सम्पन्नता और अनंत ऐश्वर्य की खोज तो माता सबरी के प्रेम, विदुर जी के त्याग, राजा जनक के विदेह भाव, राजा भोज के दान, राजा हरीशचंद्र के सत्य, मीरा के प्रेम, सूरदास जी की दिव्य दृष्टि, जड़ भरत के ज्ञान, संत रविदास, कबीर आदि संतों की मस्ती, जंगलों एवं कन्दराओं में तप लीन वीतरागी संतों के तप में करो।
ऐसा नहीं है कि जीवन के यथार्थ तुम्हारे सामने नहीं है। ऐसा भी नहीं तुम समझना नहीं चाहते। समस्या है तुम्हारी दृष्टि, जो सतह के अतिरिक्त कुछ देखना ही नहीं चाहती। गहराई में देखने के लिए जीवन में स्थिरता चाहिए, संतोष चाहिए! यह तो कब के जीवन से पलायन कर गए हैं।
अनवरत स्वार्थ और सांसारिक भोगों की ऐसी दौड़ चल रही है जिसमें भौतिक प्राप्तियों में ही सभी सुख खोज रहे हो। जो मिल गया है उसको सहेजने में लगे हो और जो नहीं मिल पाया उसके पाने के लिए बेचैन हो। जीवन में अस्थिरता और असंतोष डेरा जमाए बैठा है! तो जो मिल गया है, क्या उसका सुख ले पा रहे हो? जीवन जो कुछ भी चाहा वह सुख के लिए ही तो था और सुख मिला क्या?
चैतन्य को देखने लिए अंतरात्मा चाहिए, वह तो कब का इस शरीर को छोड़ चुकी है। पात्र में मुद्राएँ भी आ रही हैं और अंतरात्मा की चिक चिक से भी मुक्ति मिल गयी है।यह अंतरात्मा ही तो थीं , जो खुद को ही कोसती रहती थी ! त्रुटि बता बता कर मन में ग्लानि भर देती थी। जिनके पास अभी भी अंतरात्मा बची है, वो बेचारे शांत और साक्षी भाव से इस खेल को देख रहे हैं। जो अर्ध चेतन अवस्था में हैं वो कभी इधर, कभी उधर दौड़ रहे हैं। वह सांसारिक भोग और जीवन में शांति दोनों को साधने जैसे असम्भव कार्य में लगे हैं।

कबीर दास जी ने भी कहा है :
जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ।
मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ॥

सतह से ही यदि संतुष्ट हो जाओगे तो जो अंदर छुपा है, नहीं खोज पाओगे। अमृत और हलाहल दोनों ही समुद्र के गर्भ में छुपे थे, नाना प्रकार के रत्न और धातुएँ भी पृथ्वी और समुद्र के अंदर ही छुपे हैं। प्राप्त करने की जब अभिलाषा करते हो, तभी पृथ्वी अथवा समुद्र के अंदर प्रवेश करते हो। सतह पर तुम अपनी परछाई ही देख सकते हो, स्वयं को नहीं।

सत्य रूपी अमृत को खोजना है तो समुद्र मंथन तो करना ही होगा। भगवती माँ लक्ष्मी तो समुद्र मंथन से ही प्रकट होंगी। माँ सीता की कृपा को प्राप्त करना है तो पृथ्वी पर हल चलाना ही होगा। प्रकृति के अनंत सौंदर्य को जानना है तो इसके मूल को जानना ही होगा। वृक्षों की सुंदरता को अनुभव करना है तो उनकी जड़ को अनुभव करना होगा। वृक्षारोपण करना है तो पृथ्वी की गहराई में बीज डालना होगा। सतह पर कुछ भी स्थिर नहीं है। सतही जीवन में सुख -शांति -संतुष्टि कहाँ टिकेंगी। दृष्टि पैनी रखो जो गहराई तक जाकर सत्य खोज ले। सतह के लाल रंग में ही अटक कर संतुष्ट हो गए तो अन्दर छुपे इंद्रधनुष को नहीं देख पाओगे, न ही आध्यात्म और संसार को समझ पाओगे। अपनी दृष्टि को विस्तार दो , सोच को यथार्थ से जोड़ दो ! देखोगे कि मार्ग स्वतः बनते चले जाएँगे।

दृष्टि का विस्तार कर सोच को यथार्थ से जोड़ने का समय

 

– कपिल शर्मा ,
सचिव,
श्री कृष्ण जन्मस्थान सेवा संस्थान,
मथुरा

50% LikesVS
50% Dislikes

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *