…यह चीज समाज के कुछ वर्ग और सत्ता के लिए चिंता का विषय

विश्वसनीय ऐतिहासिक स्रोतों की मानें तो कॉफी की खोज इथियोपिया में हुई। कॉफी इथियोपिया से यमन और फिर वहां से अन्य मुस्लिम देशों तक पहुंची। ऑटोमन साम्राज्य में कॉफी हाउस खुलने लगे। कॉफी हाउस मुस्लिमों के बीच काफी लोकप्रिय हुआ। इसकी वजह यह थी कि मुस्लिमों के बीच शराब और बार प्रतिबंधित है। ऐसे में कॉफी हाउस के रूप में उनको एक ऐसा प्लेटफॉर्म मिला जहां वह इकट्ठा हो सकते और अपने विचारों को साझा कर सकते थे। कॉफी के साथ एक और चीज अच्छी थी। इसने सदियों पुरानी भेदभाव की प्रथा को भी खत्म किया। एक तो कॉफी सस्ती थी जिस वजह से कोई भी खरीदकर उसे पी सकता था। इसके अलावा कॉफी हाउसों में सबको प्रवेश मिलता था। किसी तरह का भेदभाव नहीं होता था। यही चीज समाज के कुछ वर्ग और सत्ता के लिए चिंता का विषय भी बना।
ऑटोमन साम्राज्य में कॉफी पर बैन
1633 में सुल्तान मुराद चतुर्थ ने कॉफी पीने पर रोक लगा दी। कॉफी पीने पर मौत की सजा का प्रावधान किया गया। इसकी वजह यह थी कि मुराद चतुर्थ के भाई और चाचा की हत्या कर दी गई थी। हत्या में शामिल लोग कॉफी हाउस में खूब आते-जाते थे। इससे क्रोधित होकर मुराद ने प्रतिबंध लगाए थे। बाद में यह बैन हटा लिया गया था। फिर 18वीं सदी में ऑटोमन सुल्तान ने कॉफी पर रोक लगा दी।
दरअसल, कॉफी हाउस एक ऐसा प्लेटफॉर्म बन गया था जहां लोग आजादी से किसी विषय पर चर्चा कर सकते थे और विचारों का आदान-प्रदान कर सकते थे। वे वहां इकट्ठा होकर सत्तावर्ग की आलोचना भी करते थे। सल्तनत के बागी लोग खुलकर विचार रखते थे। इससे शासकों के कान खड़े हुए और बागियों को इकट्ठा होने से रोकने के लिए कॉफी हाउसों पर रोक लगा दी। तब तक यूरोप में भी कॉफी हाउस फैल चुके थे और वहां भी कॉफी हाउस की लोकप्रियता से किंग यानी राजा घबराने लगे।
इंग्लैंड में कॉफी हाउस पर बैन
1652 में पासका रोजी नाम के शख्स ने लंदन में पहला कॉफी हाउस खोला। कॉफी हाउस लंदन की सोसायटी में क्रांतिकारी बदलाव की वजह बना। कॉफी हाउस ने भेदभाव मिटाकर समानता को जन्म दिया। कॉफी हाउस में लोग आकर कॉफी पीते, चर्चा करते और यहां तक कि खबरें भी लिखते थें। 18वीं सदी के लंदन में कॉफी हाउस न्यूज इंडस्ट्री के इंजन के तौर पर काम करने लगा लेकिन जल्द ही कॉफी हाउस वहां के किंग चार्ल्स द्वितीय की नजरों में खटकने लगे। चार्ल्स द्वितीय के पिता चार्ल्स प्रथम की इंग्लैंड के गृह युद्ध के दौरान हत्या कर दी गई थी। इस वजह से जनता के एक जगह जमा होकर राजनीति पर चर्चा करने से वह घबराते थे। उनका मानना था कि कॉफी हाउस से फर्जी खबरें फैलाई जाती हैं। राजा अपने जासूसों को कॉफी हाउसों में भेजकर वहां क्या चल रहा है, उस पर नजर रखते थे। अंत में दिसंबर 1675 में उन्होंने लंदन में सभी कॉफी हाउसों को बंद करने का आदेश दे दिया। लेकिन यह आदेश सिर्फ 11 दिन ही प्रभावी रहा।
‘पेनी यूनिवर्सिटी’ के नाम से मशहूर हो गए कॉफी हाउस
कॉफी बैन का नाकाम होना लोगों की बड़ी जीत थी। चार्ल्स द्वितीय जिस खुली चर्चा से डरते थे, वह और तेज हो गई। ऑक्सफर्ड में लोगों ने कॉफी हाउसों को ‘पेनी यूनिवर्सिटी’ कहना शुरू कर दिया क्योंकि लोगों को एक कप कॉफी में वहां काफी काम की बातें मालूम हो जाती थीं। वह बौद्धिक बहसों का हिस्सा बनते थे। नई-नई जानकारी हासिल होती थी। कॉफी हाउसों में आम लोगों के अलावा अपने समय के प्रसिद्ध विचारक, कवि, वैज्ञानिक और बड़े-बड़े व्यापारी जमा होते थे। एक कॉफी हाउस में स्टॉकब्रोकर्स जमा होते थे जिसके नतीजे में लंदन स्टॉक एक्स्चेंज का जन्म हुआ।
कॉफी और अमेरिका की क्रांति
बॉस्टन टी पार्टी के बाद ब्रिटेन के अमेरिकी उपनिवेशों में कॉफी को देशभक्ति वाला पेय माना जाने लगा। वहां शराबखानों में शराब के अलावा कॉफी भी परोसे जाने लगी। बॉस्टन के एक शराबखाना ग्रीन ड्रैगन का नाम बदलकर ‘क्रांति का मुख्यालय’ कर दिया गया। वहां बड़े-बड़े क्रांतिकारी कॉफी पीने के लिए जमा होते थे। न्यू यॉर्क के मर्चैंट कॉफी हाउस में भी देशभक्ति की भावना से ओत-प्रोत लोग जमा होते थे जो जॉर्ज द्वितीय के शासन से मुक्ति चाहते थे। इस तरह से कॉफी हाउस अत्याचारी शासक वर्ग के खिलाफ क्रांति भड़काने का एक प्लेटफॉर्म साबित हुआ।
-एजेंसियां

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