इस ‘कहानी’ का नए कृषि कानूनों, किसान आंदोलन या किसी राजनीतिक दल से कोई लेना-देना नहीं है…

एक बहुत प्रचलित कहानी है, जो संभवत: आज के संदर्भ में बहुत सटीक बैठती है। कहानी कुछ इस प्रकार है कि किसी जंगल में कई वर्षों से हंस-हंसिनी का एक जोड़ा रहता था। एक साल उस इलाके में अकाल पड़ा जिससे जंगली पशु-पक्षियों के सामने दाना-पानी की समस्‍या उत्‍पन्‍न हो गई।
भूख-प्‍यास से बेहाल हंस ने एक दिन हंसिनी से कहा कि क्‍यों न हम किसी दूसरे क्षेत्र में चलें। जब यहां के हालात ठीक हो जाएंगे, तब लौट आएंगे। हंसिनी को भी हंस की बात उचित लगी और वो दोनों किसी अच्‍छे स्‍थान की तलाश में उड़ चले।
जब रात होने को आई तो हंसनी ने हंस से पूछा, क्‍यों न हम रात कहीं बिताकर आराम कर लें और सुबह होने के साथ फिर उड़ चलें।
हंस ने हंसिनी की बात को सहर्ष स्‍वीकार करते हुए उचित स्‍थान की तलाश में चारों ओर नजर दौड़ाना शुरू कर दिया। आखिर जब एक गांव दिखाई दिया तो दोनों वहां एक पेड़ पर जा बैठे, लेकिन हंस को वहां का माहौल कुछ ठीक नहीं लगा, लिहाजा उसने हंसिनी से कहा कि ये गांव तो बड़ा उजाड़ सा दिखाई दे रहा है जैसे इसमें सिर्फ उल्‍लुओं का डेरा हो। यहां जीवन के कोई लक्षण नजर नहीं आते। हंसिनी को भी इस बात का अहसास हो चुका था परंतु उसने हंस से कहा कि रात यहीं बिता लेते हैं, सुबह होते ही चल देंगे।
हंस और हंसिनी के बीच के इस वार्तालाप को पास के सूखे पेड़ पर बैठा एक उल्‍लू सुन रहा था। उल्‍लू को हंस का यह कहना बहुत नागवार गुजरा कि गांव के उजाड़ होने की वजह ‘उल्‍लुओं का डेरा’ है।
उल्‍लू चूंकि रात में जागते हैं इसलिए पूरी रात उस उल्‍लू ने हंस-हंसिनी के जोड़े पर अपनी नजर गड़ाकर रखी और भोर की पहली किरण फूटने के साथ जैसे ही हंस-हंसिनी ने उड़ने का विचार बनाया वैसे ही उल्‍लू उनके पास जा पहुंचा।
उल्‍लू ने बिना किसी लाग-लपेट के हंस से कहा, क्‍या भाई…कहां से आए हो…और ये मेरी पत्‍नी को बहला-फुसलाकर साथ ले जाने की तैयारी में लगे हो।
उल्‍लू की बात सुनकर हक्‍का-बक्‍का हंस बोला, ये क्‍या मजाक है भाई। हंसिनी कब से उल्‍लू की पत्‍नी होने लगी। ये मेरी पत्‍नी है, हम वर्षों से एकसाथ जीवन बिता रहे हैं। हमें कहीं भी साथ जाने और साथ रहने का हक है।
पूरी योजना के साथ आए उल्‍लू ने हंस की बात का मजाक उड़ाते हुए कहा, मुझे तो लगता है कि तुम मेरी पत्‍नी पर कुछ ज्‍यादा आसक्‍त हो चुके हो परंतु फिर भी मैं तुम्‍हें इसे यहां से ले जाने नहीं दूंगा। गांव की पंचायत बुलाऊंगा और साबित कर दूंगा कि ये हंसिनी मेरी पत्‍नी है और मैं वर्षों से इसके साथ इसी गांव में रहता आया हूं।
हंस चूंकि पूरी तरह आश्वस्त था इसलिए उसने उल्‍लू की यह चुनौती स्‍वीकार कर ली कि गांव के पंच जो निर्णय करेंगे, वह उसे स्‍वीकार होगा।
हसं की स्‍वीकृति से उल्‍लू गांव में पंचों के पास गया और बोला, देखो भाई लोगो। मैं कई दशकों से गांव के बाहर वाले सूखे पेड़ पर बैठकर आप लोगों की सुरक्षा करता आया हूं। आपको हर संभावित खतरे से आगाह भी करता हूं परंतु आज तक आपसे कुछ नहीं मांगा। आज मुझे आप लोगों के सहयोग की जरूरत पड़ गई है। आपको बस इतना करना है कि जैसा मैं कहूं, उसमें हामी भर देनी है।
गांव के पंचों को उल्‍लू की बात में कोई बुराई नजर नहीं आई और वो उसके साथ चल दिए। रास्‍ते में उल्‍लू ने उन्‍हें अपनी पूरी योजना से अवगत करा दिया।
ठिकाने पर पहुंचकर उल्‍लू ने पंचों से पूछा, भाई लोगो…ये बताओ कि जो हंसिनी इस हंस के साथ बैठी है, उसे क्‍या पहले तुमने कभी गांव में देखा है।
उल्‍लू की बातों के जाल से सहमत पंच बोले, अरे…कैसी बातें करते हो। हम इसे भलीभांति पहचानते हैं। ये तुम्‍हारी पत्‍नी है और कई सालों से हमने तुम दोनों को सामने वाले सूखे पेड़ पर साथ रहते देखा है।
पंच अपना फैसला सुना चुके थे, इसलिए चलते बने। हंस अपनी बाजी हार चुका था इसलिए भरे मन से हंसिनी को संबोधित करते हुए बोला, मुझे लोगों को समझने में बहुत बड़ी चूक हो गई। जो भी हो, पर अब मैं हार चुका हूं इसलिए मुझे आगे का रास्‍ता अकेले तय करना होगा।
हंस के इस कथन को सुनकर उल्‍लू उसके नजदीक पहुंचा और कहने लगा, दोस्‍त…कोई हंसिनी कभी किसी उल्‍लू की पत्‍नी नहीं हो सकती। तुम उदास मत हो, हंसिनी तुम्‍हारी ही पत्‍नी है और तुम दोनों यहां से साथ जाने के लिए स्‍वतंत्र हो।
ये सारा प्रपंच तो मैंने इसलिए रचा क्‍योंकि मैं तुम्‍हारी आंखें खोलना चाहता था। रात को मैंने तुम्‍हारी वो बात सुन ली थी जब तुम अपनी पत्‍नी से कह रहे थे ”कि ये गांव तो बड़ा उजाड़ सा दिखाई दे रहा है जैसे इसमें सिर्फ उल्‍लुओं का डेरा हो”। मुझे तुम्‍हारी ये बात पसंद नहीं आई।
उसके बाद उल्‍लू ने हंस से कहा, देखो दोस्‍त…कोई गांव इसलिए उजाड़ नहीं होता कि वहां कोई उल्‍लुओं का डेरा हो। गांव उजाड़ तब होता है जब वहां के लोग ऐसे हों जैसे इस गांव के हैं। वो बिना सच जाने मेरे बहकाने पर ये कहने चले आए कि उन्‍होंने एक हंसिनी को उल्‍लू को साथ पत्‍नी की तरह रहते देखा है, जबकि उन्‍होंने तो हंस-हंसिनी भी शायद कभी देखे हों।
उल्‍लू भी किसी को तभी ”उल्‍लू” बना सकता है जब सामने वाला ”उल्‍लू” बनने को तैयार हो। बिना सोचे-समझे और बुद्धि का इस्‍तेमाल किए बिना वह अपना हित और अनहित तक समझने को तैयार न हो।
जैसे इस गांव के लोग हैं… ऐसे लोग जहां कहीं भी होंगे, वह इलाका हमेशा उजाड़ ही रहेगा क्‍योंकि ये लोग सोचने-समझने की अपनी शक्‍ति खो चुके हैं। इन्‍हें अपनी भलाई और बुराई का भेद दिखाई नहीं देता।
ये बात अलग है कि उल्‍लू ऐसे लोगों की बस्‍ती में अपना डेरा अनंत काल से डालते चले आए हैं। फिर चाहे वह बस्‍ती किसी गांव की हो, शहर की, जिले की या देश की ही क्‍यों न हो।
आखिर उल्‍लुओं को भी अपना वर्चस्‍व की चिंता रहती है इसलिए उन्‍हें ऐसे लोगों की दरकार हमेशा बनी रहती है। बाकी दोस्‍त तुम समझदार हो।
इन मूर्खों का मुखिया मुझे बना रहने दो, तुम अपने गंतव्‍य को निकलो। तुम्‍हारी यात्रा शुभ हो।
डिस्‍क्‍लेमर: इस कहानी का नए कृषि कानूनों के खिलाफ खड़े किए गए विरोध प्रदर्शनों या देश के किसी राजनीतिक दल से कोई लेना-देना नहीं है।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

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