जोश और जज्बे से लबालब हैं भारत की स्पेशल फ्रंटियर फोर्सेज

नई दिल्‍ली। पूर्वी लद्दाख में चीन को भारत के एक ऐसे बहादुर पलटन का सामना करना पड़ रहा है जिसके हरेक सैनिक के दिल में चीन को धूल चटाने की आग दशकों पहले से सुलग रही है। यह फौजी पलटन है तिब्बती शरणार्थियों का। 30 अगस्त को इसी पलटन के बहादुर सैनिक तेनजिन न्यिमा (Tenzin Nyima) लैंड माइन विस्फोट की चपेट में आकर शहीद हो गए थे।
चीनी आधिपत्य के खिलाफ की असफल क्रांति के बाद तेनजिन न्यिमा का परिवार 1966 में तिब्बत में अपना सबकुछ छोड़कर भारत आ गया था। 1987 में जब तेनजिन महज 18 वर्ष के थे तभी उन्होंने लेह स्थित इंडियन आर्मी के बेस कैंप जाकर तिब्ती सैनिकों के स्पेशल फ्रंटियर फोर्सेज (SFF) में भर्ती होने की इच्छा जताई थी।
चीन के खिलाफ लड़ने को आतुर है एक-एक तिब्बती
दरअसल, न्यिमा की तरह हर तिब्बती शरणार्थी भारत के प्रति अपना आभार जताने और चीन के कब्जे से अपनी जमीन को वापस लेने को लेकर इसी तरह का जोश और जज्बे से लबालब है। न्यिमा के बड़े भाई न्यावो कहते हैं, ‘एसएफएफ को हमारे असली दुश्मन चीन के खिलाफ इससे पहले कभी तैनात नहीं किया गया था। भारत सरकार जान-बूझकर उन्हें भारत-चीन सीमा पर तैनात नहीं करती थी।’
लेकिन जुलाई महीने में स्थिति पलट गई। एसएफएफ में तैनात तिब्बत के वीर जवानों को अपने असली दुश्मन के सामने डटने का मौका मिल गया। उन्हें चीन की तरफ अग्रिम मोर्चों पर भेज दिया गया। न्यावो अपने भाई की आखिरी बातचीत याद करते हैं, ‘उसने मुझसे कहा था कि न्यावो यह पहले जैसा नहीं है। यह कारगिल या बांग्लादेश नहीं है। हम आखिरकार अपने दुश्न से लड़ रहे हैं।’ एसएफएफ ने 1999 में और 1971 के युद्ध में हिस्सा लिया था।
‘असली दुश्मन से लड़ने का वक्त आ गया’
बीते 30 अगस्त को जब परिवार के पास उनकी कॉल आई तो उन्होंने कहा कि अपने असली दुश्मन के छक्के छुड़ाने का वक्त आ गया है। उन्होंने लद्दाख की चोटियों से अपनी 76 वर्षीय मां दावा पालजोम (Dawa Palzom) को सरप्राइज कॉल की थी। 51 वर्षीय न्यिमा के बड़े भाई तेनजिन न्यावो (Tenzin Nyawo) उस बातचीत को याद करते हुए कहते हैं, ‘भाई ने मां से कहा था कि एलएसी पर हलात बहुत खराब हैं। उन्होंने कहा था कि कुछ भी हो सकता है।’
तब न्यिमा बहुत तनाव में थे। हालांकि, यह कोई नई बात नहीं थी क्योंकि वो अपनी कंपनी के साथ उन पहाड़ी दर्रों के से 200 किमी की भी कम दूरी पर तैनात थे जहां भारत और चीन के सैनिक एक-दूसरे के सामने डटे हुए थे। न्यिमा वीडियो कॉल के दौरान अपने तीनों बच्चों और पत्नी से बात करना चाहते थे, लेकिन यह संभव नहीं हो सका। उन्होंने अपने परिवार से कहा था, ‘हमारे लिए प्रार्थन करो।’ पूरे परिवार ने उनकी रक्षा की प्रार्थना की लेकिन कुछ घंटे बाद ही पेंगोंग झील के दक्षिणी किनारे पर चुशूल में पेट्रोलिंग करते हुए वो लैंडमाइन विस्फोट की चपेट में आ गए। न्यिमा ने भारत ही नहीं, अपनी मिट्टी तिब्बत के लिए भी अपना सर्वोच्च बलिदान दिया जबकि उनके एक साथी तेनजिन लोडेन (Tenzin Loden) बाल-बाल बच गए। हालांकि, वो जख्मी जरूर हो गए।
न्यिमा के बलिदान ने तिब्बतियों में भरा जोश
तेनजिन न्यिमा का शव तिरंगे के साथ-साथ तिब्बती झंडे में लपेटकर लेह स्थित उनके घर लाया गया। लेह में बसा पूरा तिब्बती समुदाय न्यिमा के अंतिम दर्शन को उमड़ पड़ा। तिब्बती शरणार्थी के अंदर चीन के खिलाफ रोष का ज्वारभाटा उठ खड़ा हुआ। सभी ने तेनजिन न्यिमा अमर रहें, एसएफएफ जिंदाबाद, भारतीय सेना जिंदाबाद, साम्राज्यवादी चीन मुर्दाबाद के नारों से आसमान को गुंजायमान कर दिया। उनके अंतिम संस्कार के मौके पर बीजेपी महासचिव राम माधव पहुंचे तो तिब्बती शरणार्थियों की रगों में बहता खून मानो कई गुना गति से प्रवाहित होने लगा। सबके सब सिर्फ चीन को शिकस्त देने को आतुर दिखे।
बहरहाल, न्यिमा के बलिदान के बाद एसएफएफ ने इलाके के रणनीतिक तौर पर बेहद अहम मोर्चों पर कब्जा करने में बेहद अहम भूमिका निभाई।
‘भाई को खोया, लेकिन तिब्बतियों के लिए बहुत कुछ पाया’
न्यिमा के बड़े भाई न्यावो ने कहा कि तिब्बती जांबाजों में चीन के खिलाफ युद्ध लड़ने का उत्साह लाजिमी है। उन्होंने कहा, ‘हरेक तिब्बती चीन से लड़ना चाहता है क्योंकि यह लड़ाई सिर्फ भारत के लिए नहीं है बल्कि यह हमारी अपनी धरती के लिए भी है। यह हमारी पहचान की लड़ाई भी है जिसे हमसे छीन लिया गया है।’ यही वजह है कि 51 साल की उम्र में भी न्यिमा ने अग्रिम मोर्चों पर जाने की जिद्द की और वो गए भी। न्यावो ने कहा, ‘उसने कहा कि यह उसके जीवन की सबसे महत्वपूर्ण लड़ाई है और संभव है कि वो जिंदा घर नहीं लौट सकें।’ न्यिमा अगले वर्ष मार्च में रिटायर होने वाले थे। न्यावो कहते हैं कि 30 साल बाद उसके साथ वक्त गुजारने का मौका मिलने वाला था। वो कहते हैं, ‘हमने भाई को जरूर खो दिया, लेकिन तिब्बती समुदाय के लिए बहुत कुछ हासिल कर लिया।’
-एजेंसियां

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