ये है म्यूज़ियम ऑफ़ फ्यूचर, यानी भविष्य का अजायबघर

ये है म्यूज़ियम ऑफ़ फ्यूचर. यानी भविष्य का अजायबघर. इस इमारत का फ्रेमवर्क आयताकार 2400 स्टील की छड़ों से तैयार किया गया था. ये ढांचा पिछले साल नवंबर में तैयार हुआ था. तब से अब तक केवल इस ढांचे के ऊपर पैनल लगाने का काम चल रहा है.
यूं तो दुबई में आम तौर पर रातों-रात बहुमंज़िला इमारतें खड़ी हो जाती हैं लेकिन यह एक इमारत है जो लंबे वक़्त से बन रही है. ये इमारत अजीबो ग़रीब है. ये न लंबी है, न चौड़ी है, सीधी है, न टेढ़ी है. इसका आकार कुछ-कुछ अंडे जैसा है, तो कुछ अंगूठी जैसा.
ये संग्रहालय एक साल में खोला जाना है और इसे बनाने की जो रफ़्तार है, उससे आशंका पैदा होती है कि ये वक़्त पर तैयार हो भी पाएगा या नहीं लेकिन इमारतें बनाने वालों को पक्का यक़ीन है कि वो अक्तूबर 2020 तक म्यूज़ियम ऑफ़ फ़्यूचर को जनता के लिए खोल देंगे. उसी समय दुबई में वर्ल्ड एक्स्पो होने वाला है.
म्यूज़ियम ऑफ़ फ्यूचर के कार्यकारी निदेशक लैथ कार्लसन कहते हैं कि इस इमारत का आकार आंखों जैसा है. कार्लसन ये मानते हैं कि इमारत का आकार ऐसा कुछ ख़ास नहीं है, जो लोगों को बहुत आकर्षित करे.
इस बिल्डिंग को बनाने का ठेका 2015 में दुबई की ही एक कंपनी किला डिज़ाइन को मिला था. उनका कहना है कि इमारत का जो ठोस हिस्सा है, वो हमारे मौजूदा ज्ञान को दर्शाता है. इसका भीतर का जो ख़ालीपन है, वो उन चीज़ों का प्रतीक है, जो हम नहीं जानते, यानी हमारा मुस्तकबिल.
संयुक्त अरब अमीरात तेज़ी से तरक़्क़ी कर रहा है. यहां सैकड़ों इमारतें बन रही हैं. इन सभी में ये म्यूज़ियम ऑफ़ फ़्यूचर बिल्कुल अलग नज़र आता है.
क्या है म्यूज़ियम ऑफ़ फ़्यूचर की ख़ासियत?
ढांचे के ऊपर जो पैनल लगाए जा रहे हैं, उन में अरबी भाषा में कुछ लिखा हुआ है. हालांकि इस के निर्माताओं ने ये नहीं बताया कि अरबी में लिखा क्या है लेकिन सूत्रों के मुताबिक़ ये दुबई के शासक शेख़ मुहम्मद बिन राशिद अल मकतूम की लिखी हुई कविताएं हैं.
हाथ से लिखी हुई ये कविताएं, म्यूज़ियम की खिड़कियों का भी काम करेंगी. दिन में इनके ज़रिए रौशनी छन कर भीतर जाया करेगी. वहीं रात में अंदर की रौशनी बाहर निकल कर इसे अद्भुत मंज़र की शक्ल देगी.
म्यूज़ियम ऑफ़ फ्यूचर की ऊंचाई 78 मीटर है. इसमें रौशनी के लिए चौदह किलोमीटर लंबी एलईडी लाइट्स लगाई जा रही हैं.
कैसे बना इंजीनियरिंग का यह नमूना?
हाथ से लिखी ये कविताएं और इस इमारत के आकार ने बनाने वालों के लिए बहुत बड़ी चुनौती खड़ी की है. हर स्टील फ्रेम, हर पैनल को ख़ास तरह से ही काटा जा रहा है क्योंकि ये सामान्य आकार नहीं है कि फ्रेम लाकर लगाया और उसके ऊपर पैनल जड़ कर इमारत तैयार कर दी.
इस इमारत को बनाने में प्रमुख सलाहकार ब्रिटेन की ब्यूरोहैपोल्ड इंजीनियरिंग फर्म है.
कंपनी के आर्किटेक्ट का कहना है कि इस इमारत का डिज़ाइन बिल्डिंग इन्फॉर्मेशन मॉडलिंग यानी BIM से तैयार किया गया है. ये डिज़ाइन, आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस की मदद से तैयार किया जाता है ताकि हर मोड़, हर पेंच और हर घुमाव का सटीक अनुमान लगाया जा सके. बिम एक थ्री-डी मॉडल पर काम करता है.
ब्यूरोहैपोल्ड इंजीनियरिंग के टोबाइस बॉली कहते हैं कि, “रेखागणित की मदद से ये ख़ास डिज़ाइन तैयार करना कम-ओ-बेश नामुमकिन था. हमें सब कुछ डिजिटल तरीक़े से करना था. अगर हम हाथ से डिज़ाइन बनाते तो, सोचते कुछ और बन जाता कुछ और. इस तरह से बनाना भी मुश्किल था. तकनीक की मदद से ही ये इमारत हम इतनी आसानी से बना पा रहे हैं.”
पहले प्रोजेक्ट डायरेक्टर ने इस बिल्डिंग का 2D मॉडल तैयार किया. इसके लिए प्रोजेक्ट में शामिल सभी लोगों को पहले BIM को अच्छे से समझना पड़ा.
सबसे पहले कंप्यूटर की मदद से इस डिज़ाइन के मुश्किल पेंच-ओ-ख़म से निपटने की कोशिश हुई. बारीक़ से बारीक़ बदलावों को कंप्यूटर पर ही आज़माया गया. इस में काफ़ी वक़्त लग गया. हालांकि इन्हें नंगी आंखों से नहीं देखा जा सकता लेकिन इमारत का ढांचा तैयार करने में मिलीमीटर भर का फ़र्क़ भी चुनौती बन सकता था.
इसके बाद मशीन की ही मदद से स्टील का फ्रेम तैयार किया गया. इसके कंप्यूटर डिज़ाइन पर आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस की मदद से काम किया गया. स्टील की बनी आयताकार बीमों की मदद से इमारत को आकार देने की कोशिश की जा रही थी.
दिक़्क़त ये थी कि इमारत का जो डिज़ाइन था, उस में फिट बैठने वाला कोई भी स्टील का ढांचा उपलब्ध नहीं था इसलिए मशीन को हर कट वाली छड़ का आकार पहले से ही सुनिश्चित करना था ताकि ढांचा आसानी से बन जाए और इसे तैयार करने में स्टील बर्बाद भी न हो.
इसके लिए ब्यूरोहैपोल्ड के इंजीनियरों ने ख़ुद का ही एल्गोरिदम लिखा. इसकी मदद से इंजीनियरों ने हर हिस्से के लिए एक तयशुदा स्टील की छड़ का आकार सुनिश्चित किया. इसका फ़ायदा ये हुआ कि इंजीनियरों को अपनी ज़रूरत का स्टील ख़ुद ही नहीं ढालना पड़ा.
कंप्यूटर पर ही डिज़ाइन तैयार करने का फ़ायदा ये हुआ कि ढांचा खड़ा करते वक़्त स्टील का एक भी टुकड़ा नहीं काटना पड़ा. ये सब नई तकनीक की मदद से ही मुमकिन हुआ.
इससे पहले कंक्रीट से इस स्टील फ्रेम को सहारा देने वाले खंभे खड़े कर लिए गए थे. जिसके बाद स्टील का पूरा फ्रेम सजाने में क़रीब 14 महीने लग गए.
थ्री-डी मॉडलिंग की मदद से इमारत के भीतर पानी के बहाव और इलेक्ट्रिकल वायरिंग को भी एकदम बारीक़ी से डिज़ाइन किया गया.
आम तौर पर इमारतें बनाने में एमईपी यानी मेकैनिकल, इलेक्ट्रिकल और प्लंबिंग की परेशानियां आती हैं. लेकिन, म्यूज़ियम ऑफ़ फ्यूचर बनाने वालों ने ये सभी चुनौतियां कंप्यूटर पर ही निपटा दीं. फ़ायदा ये हुआ कि असल ढांचा खड़ा करते वक़्त एमईपी की चुनौतियां नहीं आईं.
बनने से पहले ही बिल्डिंग को LEED प्लेटिनम रेटिंग
महीनों की मशक़्क़त और कंप्यूटर इंजीनियरिंग के बाद अब म्यूज़ियम ऑफ़ फ्यूचर का 70 फ़ीसदी ढांचा तैयार हो चुका है. सात मंज़िला इमारत पर अब अरबी भाषा में लिखे हुए पैनल लगाए जा रहे हैं. कुल 1024 पैनल इस इमारत में लगाए जा रहे हैं. हर एक को ख़ास तौर से इस इमारत के लिए ही तैयार किया गया है. इन्हें बनाने वाली कंपनी को क़रीब एक साल तो डिज़ाइन के अध्ययन में ही लग गए.
म्यूज़ियम ऑफ़ फ्यूचर को बनाने में एक और बात का ख़ास ख़याल रखा गया है. इस में एयर कंडीशनिंग और रौशनी की ऐसी व्यवस्था की गई है, कि ज़्यादा से ज़्यादा नेचुरल लाइट और हवा हो.
इसी वजह से इस बिल्डिंग को LEED प्लेटिनम रेटिंग मिली है. यानी ये पर्यावरण को कम से कम नुक़सान पहुंचाकर बनाई गई इमारतों में इसे 100 में से 80 अंक प्राप्त हुए हैं. इस में पानी की रिसाइकिलिंग, सोलर एनर्जी वग़ैरह का बख़ूबी ख़याल रखा गया है.
यहां आने वाले लोग इलेक्ट्रिक गाड़ियों को चार्ज भी कर सकेंगे. पार्किंग के लिए कम ही व्यवस्था की गई है, ताकि लोगों को सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल करने के लिए प्रेरित किया जा सके.
इस बिल्डिंग के भीतर सिंगल यूज़ प्लास्टिक का इस्तेमाल प्रतिबंधित होगा. खाने के लिए आल्टरनेटिव प्रोटीन और कल्चर्ड मांस मिलेगा.
सालाना 10 लाख पर्यटकों के आने की उम्मीद
तैयार होने के बाद ये म्यूज़ियम ऑफ़ फ्यूचर लोगों को विकास को स्थायित्व प्रदान करने वाले विकल्पों पर ग़ौर करने के लिए प्रेरित करेगा. जलवायु परिवर्तन जैसे मसलों पर समझ बढ़ाने के लिए एक अलग सेक्शन होगा. ग्लोबल वॉर्मिंग और इकोसिस्टम को हो रहे नुक़सान के प्रति लोगों की समझ बढ़ाने की भी यहां कोशिश होगी.
इसी तरह उल्कापिंडों पर खनन और सौर ऊर्जा के बेहतर इस्तेमाल से मानवता को होने वाले फ़ायदों की जानकारी भी दी जाएगी. यहां गैजेट्स से ज़्यादा मानवीयता का ख़याल रखा जाएगा.
कार्लसन कहते हैं, “हमारा मक़सद होगा कि लोग अपनी बनाई हुई चीज़ों का लुत्फ़ लें, न कि दूसरों के निर्माण कार्य के दर्शक भर बन कर रह जाएंगे.”
इमारत की एक मंज़िल पर भविष्य के उपकरणों के लिए जगह होगी.
कार्लसन कहते हैं, “यहां लोगों को बुरे भविष्य की नहीं, बल्कि संभावनाओं से भरे मुस्तकबिल का अनुभव कराने की कोशिश होगी.”
उम्मीद की जा रही है कि हर साल दस लाख से ज़्यादा लोग म्यूज़ियम ऑफ़ फ्यूचर देखने आएंगे. इन में से आधे, संयुक्त अरब अमीरात से बाहर के लोग होंगे.
अभी, निर्माण कार्य पूरा होने में समय है. लेकिन, ये म्यूज़ियम ऑफ़ फ्यूचर अभी से लोगों को भविष्य की सैर कराने लगा है.
-BBC

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