ये है होली की शास्त्रानुसार रचना एवं होली मनाने की उचित पद्धति

होली की एक पुरुष जितनी ऊंचाई होना क्यों आवश्यक है ?

होली के कारण साधारणतः मध्य वायुमंडल एवं भूमि के पृष्ठभाग के निकट का वायुमंडल शुद्ध होने की मात्रा अधिक होती है ।

होली की ऊंचाई एक पुरुष जितनी बनाने से होली द्वारा प्रक्षेपित तेज की तरंगों के कारण ऊर्ध्वदिशा का वायूमंडल शुद्ध बनता है । तत्पश्चात् यह ऊर्जा जडता धारण करती है एवं मध्य वायुमंडल तथा भूमि के पृष्ठभाग के निकट के वायुमंडल में घनीभूत होने लगती है । इसी कारण से होली की ऊंचाई साधारणतः पांच-छः फुट होनी चाहिए । इससे शंकुस्वरूप रिक्ति में तेज की तरंगें घनीभूत होती हैं एवं मध्यमंडल में उससे आवश्यक ऊर्जा निर्मित होती है ।

होली के मध्य में खड़ा करने के लिए विशिष्ट पेड़ों का ही उपयोग क्यों किया जाता है?

होली की रचना करते समय मध्यस्थान पर गन्ना, अरंड तथा सुपारी के पेड़ का तना खड़ा करने का आधारभूत शास्त्र

गन्ना: गन्ना भी प्रवाही रजोगुणी तरंगों का प्रक्षेपण करने में अग्रसर होता है। इसकी स समीपता के कारण होली में विद्यमान शक्तिरूपी तेजतरंगें प्रक्षेपित होने में सहायता मिलती है। गन्ने का तना होली में घनीभूत हुए अग्नि रूपी तेजतत्त्व को प्रवाही बनाता है एवं वायुमंडल में इस तत्त्व का फुवारे समान प्रक्षेपण करता है। यह रजोगुण युक्त तरंगों का फुवारा परिसर में विद्यमान रज-तमात्मक तरंगों को नष्ट करता है। इस कारण वायुमंडल की शुद्धि होने में सहायता मिलती है।

अरंड: अरंड से निकलने वाले धुए के कारण अनिष्ट शक्तियों द्वारा वातावरण में प्रक्षेपित की गई दुर्गंधयुक्त वायु नष्ट होती है।
सुपारी: मूलतः रजोगुण धारण करना यह सुपारी की विशेषता है। इस रजोगुण की सहायता से होली में विद्यमान तेजतत्त्व की कार्य करने की क्षमता में वृद्धि होती है।

होली की रचना में गाय के गोबर से बने उपलों के उपयोग का महत्त्व

गाय में 33 करोड देवताओं का वास होता है । इसका अर्थ है, ब्रह्मांड में विद्यमान सभी देवताओं के तत्त्वतरंगों को आकृष्ट करने की अत्यधिक क्षमता गाय में होती है । इसीलिए उसे गौमाता कहते हैं । यही कारण है कि गौमाता से प्राप्त सभी वस्तुएं भी उतनी ही सात्त्विक एवं पवित्र होती हैं । गोबर से बनाए उपलों में से 5 प्रतिशत सात्त्विकता का प्रक्षेपण होता है, तो अन्य उपलों से प्रक्षेपित होने वाली सात्त्विकता का प्रमाण केवल 2 प्रतिशत ही रहता है । अन्य उपलों में अनिष्ट शक्तियों की शक्ति आकृष्ट होने की संभावना भी होती है । इससे व्यक्ति की ओर कष्टदायक शक्ति प्रक्षेपित हो सकती है । कई स्थानों पर लोग होलिका पूजन षोडशोपचारों के साथ करते हैं । यदि यह संभव न हो, तो न्यूनतम पंचोपचार पूजन तो अवश्य करना चाहिए ।

होलिका-पूजन एवं प्रदीपन हेतु आवश्यक सामग्री

पूजा की थाली, हल्दी-कुमकुम, चंदन, फुल, तुलसीदल, अक्षत, अगरबत्ती घर, अगरबत्ती, फुलबाती, निरांजन, कर्पूर, कर्पूरार्ती, दियासलाई अर्थात मॅच बाक्स्, कलश, आचमनी, पंचपात्र, ताम्रपात्र, घंटा, समई, तेल एवं बाती, मीठी रोटी का नैवेद्य परोसी थाली, गुड डालकर बनाइ बिच्छू के आकार की पुरी अग्नि को समर्पित करने के लिए ।
सूर्यास्त के समय पूजनकर्ता शूचिर्भूत होकर होलि का पूजन के लिए सिद्ध हों । पूजक पूजास्थान पर रखे पीढे पर बैठें ।उसके पश्चात आचमन करें । अब होलि का पूजन का संकल्प करें ।

‘काश्यप गोत्रे उत्पन्नः विनायक शर्मा अहं। मम सपरिवारस्य श्रीढुंढाराक्षसी प्रीतिद्वारा तत्कर्तृक सकल पीडा परिहारार्थं तथाच कुलाभिवृद्ध्यर्थंम् । श्रीहोलिका पूजनम् करिष्ये।’

अब चंदन एवं पुष्प चढाकार कलश, घंटी तथा दीपपूजन करें । तुलसी के पत्ते से संभार प्रोक्षण अर्थात पूजा साहित्य पर प्रोक्षण करें । अब कर्पूर की सहायता से होलिका प्रज्वलित करें । होलिका पर चंदन चढाएं । होलिका पर हल्दी चढाएं । कुमकुम चढाकर पूजन आरंभ करें । पुष्प चढाएं।उसके उपरांत अगरबत्ती दिखाएं। तदुपरांत दीप दिखाएं ।
होलिका को मीठी रोटी का नैवेद्य अर्पित कर प्रदीप्त होली में निवेदित करे । दूध एवं घी एकत्रित कर उसका प्रोक्षण करे। होलिका की तीन परिक्रमा लगाएं । परिक्रमा पूर्ण होने पर मुंह पर उलटे हाथ रखकर ऊंचे स्वर में चिल्लाएं । गुड एवं आटे से बने बिच्छू आदि कीटक मंत्रपूर्वक अग्नि में समर्पित करे । सब मिलकर अग्नि के भय से रक्षा होने हेतु प्रार्थना करें ।
कई स्थानों पर होली के शांत होने से पूर्व इकट्ठे हुए लोगों में नारियल, चकोतरा (जिसे कुछ क्षेत्रो में पपनस कहते हैं – नींबू की जाति का खट्टा-मीठा फल) जैसे फल बांटे जाते हैं । कई स्थानों पर सारी रात नृत्य-गायन में व्यतीत की जाती है ।

 

 

– कृतिका खत्री
सनातन संस्था, दिल्ली

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