इस दीपावली से यह रिवाज़ भी चलाया जाए, कुरीतियों को…

दीपावली कुछ इस तरह मनाया जाए
कुरीतियों को समूल ही  जलाया जाए

बहुत बार मिल चुके भगवान्,भक्त से
इंसानों को भी  इंसान से मिलाया जाए

नहीं जगमगाए केवल महल और मीनारें
झुग्गी-झोपड़ियों को भी रौशनी दिलाया जाए

कड़वाहटें कम करें और केवल खुशियां बाँटें
भूखे पेटों को भी थोड़ा खाना खिलाया  जाए

दीपावली हरेक की हो,न कोई बैर,न कोई गैर
इस दीपावली से यह रिवाज़ भी चलाया जाए

सल‍िल सरोज की कुुछ  अन्य कव‍िताऐं – 

आदतन तुम से  ही लड़ते  भी  रहे

खत पढ़ते भी रहे और डरते भी रहे
ताउम्र यूँ ही मोहब्बत करते भी रहे

एक आरज़ू थी साथ-साथ जीने की
इसी आरज़ू पर  रोज़  मरते भी रहे

खता क्या थी हम गैर- मजहबी थे
बिना गलती   जुर्मान भरते भी रहे

कोई और तो था ही नहीं ज़माने में
आदतन तुम से  ही लड़ते  भी  रहे

कुछ पल थे दरम्यान बात बनने के
नज़र लगी और  वो बिगड़ते भी रहे।

अपना अहंकार तोड़  कर भी देखिए

कुछ दिन भरम छोड़ कर भी देखिए
अपना अहंकार तोड़  कर भी देखिए

सब गलतियाँ दूसरों की नहीं होती हैं
कभी गिरेबां झकझोड़ कर भी देखिए

आपको आधा ही देखने की आदत है
खुद को दूसरों से जोड़ कर भी देखिए

आईना हमेशा सही चेहरा नहीं दिखाता
हो सके तो शीशा फोड़ कर भी देखिए

मिलते जाएँगे  साथी कई राहों  में यूँ ही
अपना रास्ता कभी  मोड़ कर भी देखिए।

इश्क़ का  पहाड़ा हमें पढ़ा कर देखते

कुछ कदम तुम भी  बढ़ा कर देखते
रिश्ते कहाँ पड़े हैं ,  उठा कर देखते

कितनी दस्तकें दी  दरवाजे पे तुम्हारे
किसी वजह मुझे भी बिठा कर देखते

चाँद क्यूँ न उतर आता तुम्हारे आँगन
कभी अपने  छत पर  चढ़ा कर देखते

हम इतने भी  कमजोर नहीं गणित में
इश्क़ का  पहाड़ा हमें पढ़ा कर देखते।

या इलाही,वो तबाही है कोई

या इलाही,वो तबाही है कोई
चेहरे पे बादल  छाई है कोई

क्या देखें  और क्या ना  देखें
जिस्म,अदा की खाई है कोई

उसे देखें फिर कुछ क्यूँ देखें
तूफ़ान समेटके आई है कोई

उस  का गुरूर भी वाजिब है
बला की  सूरत पाई   है कोई

वो जिसे  मिले, सब मिल जाए
वाकई  अल्लाह दुहाई है कोई।

-सलिल सरोज
कार्यकारी अधिकारी
लोक सभा सचिवालय
संसद भवन,नई दिल्ली

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