अतिवादी विचारों, विध्वंसक सोच से मुक्त हुए बिना रक्षा का कोई मार्ग नहींं

आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव च
बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च|
इन्द्रियाणि हयाना हुर्विषयांस्तेषु गोचरान्
आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः||

मनुष्य इस शरीर रूपी रथ पर आरूढ़ है, बुद्धि इसकी सारथी, मन लगाम और इंद्रियाँ इसके अश्व हैं। मन और इंद्रियों के प्रभाव से ही आत्मा सुख और दुःख का अनुभव कर रही है।

बुद्धि रूपी सारथी के महत्व को समझें, इसी में मानवता की विजय है

समस्त उन्नति और समृद्ध, संतुष्ट सभ्यता का अभ्युदय अथवा पतन, विचारों से ही हुआ है। रचनात्मक चिंतन और विचारों से समृद्ध एवं उन्नत सभ्यताओं और समाज का उदय होता है, इसके विपरीत सोच से पतन। समझना कठिन नहीं है कि संकीर्ण सोच और स्वार्थपूर्ण आचरण से अत्यन्त उन्नत सभ्यताएँ भी इतिहास के पन्नों में दर्ज होकर रह गयीं हैं।

यदि सनातन धर्म की बात करें तो सनातन धर्म के आधार सूत्र ऋषि मुनियों के कठोर तप, ध्यान एवं योग से ही प्रकट हुए हैं। इन्हीं महापुरुषों का ममकार से ऊपर उठकर किया गया तप-ध्यान-योग-चिंतन- मनन आज सनातन धर्म का समृद्ध आधार है
आध्यात्मिक अथवा भौतिक जगत की समस्त सम्पदा, चिन्तन अथवा विचारों से ही प्राप्त हुयी हैं। यदि चिंतन और विचार ही करना बंद कर दें और जिस ढर्रे पर ज़िन्दगी चल रही है, यदि उसी को मार्ग सही मान लिया जाए तो समाज अथवा जीवन में रचनात्मक परिवर्तन सम्भव नहीं है।
यह बुद्धि प्रधान युग है और हर जगह बुद्धि का ही तो प्रयोग हो रहा है। आज जिसको भी देखो, पढ़ो अथवा समझो , उन्नति का श्रेय बुद्धि को ही दिया जा रहा हैं। सहज सरल बात भी सीधी हृदय में प्रवेश नहीं कर पाती, मार्ग सदैव बुद्धि से होकर ही गुजरता है।
”अति सर्वत्र वर्जयेत्” सत्य ही है कि बुद्धि पर ज्यादा ही आश्रित हो गए हैं, सभी उन्नति अथवा पतन का कारण बुद्धि ही तो है, यदि इस अवस्था को ”बुद्धि से पीड़ित” कहें , तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।

”बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च”

बुद्धि को इस भौतिक शरीर रूपी रथ का सारथी और मन को लगाम की संज्ञा दी गयी है। यदि ध्यान से देखें तो क्या निश्चयपूर्वक कह सकते हैं कि बुद्धि से सारथी का कार्य हो पा रहा है? सत्य तो यह है कि मन रूपी लगाम पर बुद्धि का नियंत्रण ही नहीं रहा, अपितु बुद्धि तो मन का अनुसरण करती दीख रही है। सांसारिक कामनाओं-वासनाओं रूपी घोड़े बेलगाम मन के अनुरूप भाग रहे हैं, दिशाहीन -लक्ष्यहीन और ऐसे बिना लगाम के अनियंत्रित हो भाग रहे घोड़े अंततः रथ को ही क्षति पहुँचाते हैं। ऐसा रथ यदि ऊँचाइयों की खोज में भाग रहा है, तो एक क्षण में खाईं में जाकर गिरता है। कभी देखना पहाड़ पर अनियंत्रित घोड़ा , सवार को प्रायः खाई में ही पटकता है।
आज जिसको सम्पन्नता समझ रहे हैं अथवा विपन्नता, युद्ध अथवा शांति, सुख अथवा दुःख-पीड़ा, सभी के पीछे कारण बुद्धि ही है या कहें मनोरूप बुद्धि की देन हैं। मनोरूप बुद्धि से शाश्वत और कल्याणकारी प्राप्तियों की अपेक्षा ही व्यर्थ है। आज सारे अनुसंधान- सारे चिंतन, स्वयं को श्रेष्ठ अथवा सर्वश्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए ही हो रहे हैं। पीड़ित बुद्धि ही तो कार्य कर रही है कि आज जब सारा विश्व कोरोना के प्रकोप से कराह रहा है और ऐसे विपत्ति काल में भी सभी अपनी अपनी ढपली और अपना अपना राग अलाप रहे हैं, अपने को सर्वश्रेष्ठ सिद्ध करने के प्रयास चल रहे हैं।

भ्रमित बुद्धि का ही प्रभाव है कि कोरोना के इलाज को लेकर चल रहे अनुसंधानों में भी भविष्य में लाभ अर्जित करने की भावना ही निहित है न क‍ि मानवता की रक्षा। यह भी एक कारण हैं कि कोरोना के चिकित्सीय अनुसंधान में लगे सभी देश खोज में प्रथम आना चाहते हैं क्योंकि अनुसंधान में लाभ कमाने के भाव की ही प्रबलता है।

भौतिक संसाधनों की चमत्कारिक उपलब्धियों ने भौगोलिक दूरी का अर्थ बदल दिया है, पृथ्वी के एक छोर से दूसरे छोर की दूरी कुछ घंटों में ही तय हो रही है किन्तु इसी भौतिकवादी प्रगति ने परस्पर प्रेम और विश्वास को नष्ट कर , मानवीय गुण और हृदय को हृदय से बहुत दूर कर दिया है। सारा चिंतन और मनन स्वार्थपरक अहंकार के इर्दगिर्द सिमट गया है, यही कारण है कि मानवता और प्रकृति के अस्तित्व पर निरन्तर आच्छन्न संकट से जीवन घोर कष्ट और भय के साये में गुजर रहा है। मति भ्रष्ट हो गयी है और बुद्धि पर पत्थर रखे घूम रहे हैं, रचनात्मक चिंतन अथवा विचार आएँ कैसे? देख सकते हैं कि जिससे जीवन और पोषण मिल रहा है, उसी माँ रूप प्रकृति और धरा को ही नष्ट करने जैसे के पापकर्मों में लगे हैं।

जिस बुद्धि-विवेक से मन रूपी लगाम को कसे रहना था, आज वही मन बुद्धि को जकड़े हुए है और बुद्धि भी मन की प्रसनन्नता के अनुरूप योजनाएँ बना रही है। भावान्तर से कैसी विचित्र स्थिति हो गयी है कि लगाम से सारथी नियंत्रित होता दिख रहा है। विवेक से कार्य हो तो जीवन में कुछ रचनात्मकता दिखायी दे, यहाँ तो एक दूसरे से आगे निकलने की ऐसी होड़ मची है कि छद्म विकास के रास्ते से तो पत्थर हटा रहे हैं! रास्ते बना रहे हैं परंतु बुद्धि पर जो बड़े बड़े पत्थर पड़े हैं, उनको जब देखना भी नहीं चाहते तो हटाए कौन?
स्थूल जगत से कूड़ा करकट साफ़ करने में लगे हैं, किंतु जो बुद्धि पर जमा कूड़ा करकट है उसपर झाड़ू कब लगेगी? जब तक बुद्धि शुद्ध नहीं होगी, सब कुछ अनिश्चित और अशांत ही रहेगा और यह भी निश्चित है कि सैकड़ों वर्षों से बुद्धि पर आसन जमाए बैठे इन विकारों से छुटकारा सहज नहीं है।

अपनी परम्पराएँ, अपना ज्ञान और अपनी बौद्धिक सम्पदा तो छूटती ही जा रही हैं। बुद्धि, सुविधा और विलासिता की ओर भाग रहे मन का ही अनुसरण कर रही है। सत्य है कि समय के साथ समाज और जीवन की व्यवस्थाओं में परिवर्तन करना आवश्यक है किंतु आधुनिक भौतिक जीवन को ही सर्वोपर‍ि मान कर अपनी परम्पराओं और ज्ञान को ही नष्ट करते रहे तो यह विकास तो नहीं है। रोज़ नयी धारणाएँ और नए नए समाज के निर्माण से कोई शाश्वत परिवर्तन सम्भव नही है, ऐसे अर्थहीन प्रयास तो सैकड़ों वर्षों से हो रहे हैं, आवश्यकता है विचारों और धारणाओं में रचनात्मक परिवर्तन और उनके क्रियान्वयन की।

सार्थक विकास तो अपनी परम्पराओं को आधार बना कर ही किया जा सकता है, न कि उनको नष्ट कर। विगत कुछ वर्षों से जिस प्रकार भारत अपनी प्राचीन बौद्धिक सम्पदा के संरक्षण और संवर्धन में लगा है, कुछ संतोष हो सकता है किंतु विदेशी आक्रांताओं और उनकी मानसिकता ने जो सनातन सम्पदा को क्षति पहुँचायी है, उसकी भरपाई सहज सम्भव नहीं है। स्वार्थ और अहंकार ने प्रकृति और जीवन को अशांत कर दिया है। मानवता ज्वालामुखी के मुहाने पर बैठी यह मान रही है कि इसको तो फटना ही है, इंतज़ार मात्र ”कब” का हो रहा है। ऐसी बेचैनी-ऐसी अशांति जीवन में, फिर भी विचारों पर कोई नियंत्रण नहीं, समझ ही नहीं आ रहा यह असहाय भाव है अथवा आत्महंता सोच। सब एक दूसरे को आगाह कर रहे हैं, पर सब उसी स्वार्थपरक विचारधारा के पोषण में पूरी क्षमता से लगे हैं।

सन्ध्या का समय था, एक महान चिन्तक अपनी पत्नी और बेटे के साथ पार्क में घूमने आया था। पति पत्नी बातों में मशगूल थे, पार्क में टहल रहे थे, पार्क बंद होने का समय हो गया। उन्होंने देखा कि वह अपने में ही खोए टहलते रहे और उनका बेटा न जाने कब उनसे अलग हो गया था। सोचने लगे क‍ि द्वार बंद होने वाले हैं और इतने बड़े बगीचे में उसको कहाँ खोजें। स्त्री घबरा कर रोने लगी तो पति ने पूछा कि तुमने बेटे को कहीं जाने को मना किया था क्या? यदि मना किया है तो पूरी सम्भावना है उसके वहीं होने की जहां तुमने जाने को मना किया था। उसकी पत्नी ने कहा कि मैंने उसको फ़व्वारे से दूर रहने को कहा था। पति बोला यदि हमारे बेटे में थोड़ी सी भी बुद्धि है तो वह फ़व्वारे के पास ही होगा। दोनों भागे भागे गए और देखा उनका बेटा फ़व्वारे में पैर लटकाए पानी से खेल रहा है। पत्नी आश्चर्यचकित होते हुए बोली कि आपने कैसे पता कर लिया कि बेटा वहीं होगा? पति बोला सीधी सी बात है, जहां जाने से रोका जाए अथवा मना किया जाए! मन वहीं जाने को मचलता है! अंदर ही अंदर एक रस का प्रवाह शुरू हो जाता है और एक रहस्य की खोज भी। उस व्यक्ति ने कहा इसमें कोई आश्चर्य ही नहीं है कि मैंने अपने बेटे को खोज लिया, आश्चर्य तो इसमें है कि हम में से अधिकांश इस सूत्र को आज तक खोज अथवा इतनी छोटी सी बात को समझ नहीं सके हैं।

बहुत कठिनाई होती है मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार के भेद को समझने में। जैसे व्यक्ति एक ही है, किसी का वह पिता है, किसी का बेटा और किसी का पति है। किसी के लिए वह मित्र है और किसी के लिए शत्रु। एक ही घर में उसके भिन्न भिन्न रूप हैं।

किसी विचारक ने कहा है कि मन के भी रूप अनेक हैं। मन यदि अकड़ जाए और स्वयं को श्रेष्ठ मान कर व्यवहार शुरू कर दे तो मन का स्वरूप अहंकार में प्रकट होगा।

जब शुद्ध और निष्पक्ष चिंतन करें और जब वह एकाग्र हो परोपकार, धर्म, सत्य, ज्ञान विज्ञान की ओर उन्मुख हो, तब वह बुद्धि है और ऐसी सदबुद्धि से सदैव रचनात्मक और सकारात्मक सोच प्रकट होगी।

मिथ्या स्वप्न और कपोल कल्पनाओं में विचरण कर रहा है, बड़े बड़े पदों की कल्पना कर रहा है, अनिश्चित, निरुद्देश्य, बिना सार्थक लक्ष्य के भटक रहा है भ्रमित और अनियंत्रित सा, तो यही चित्त है।

क्या मन को आत्मा से सर्वदा अलग करके देखा जा सकता है? निसंदेह दोनों ही चेतना के ही रूप हैं। तूफ़ान में समुद्र अशांत हो जाता है किंतु तूफ़ान और समुद्र पृथक नहीं हैं। जब समुद्र अशान्त हो जाता है तो कहते हैं तूफ़ान है, ठीक इसी प्रकार जब आत्मा अशांत होती है तो हम कहते हैं मन है। जब मन शांत और ध्यानस्थ होता है तो हम कहते हैं कि आत्मा है। भावान्तर से जब हमारी चेतना अशांत है, वासनाओं के तूफ़ान से ग्रसित है, तब हम इसे मन कहते हैं। जब तक चेतना अशांत है, आत्मा से साक्षात्कार सम्भव ही नहीं है अथवा कहें तो आत्मा को अनुभव भी नहीं कर सकते हैं। जब चेतना ध्यानस्थ हो जाती है अर्थात् जो लहरें आत्मा को अशांत कर रही थीं, वह शांत हो जाती हैं, तब ज्ञान होता है आत्मा राम का! तभी सम्भव है आत्मा की पहचान-आत्मज्ञान।
विक्षुब्ध मन के विभिन्न रूप हो सकते हैं और इनका प्रभाव चित्त – अहंकार और बुद्धि पर परि‍लक्षित होता है। जैसे काम में लिप्त मन ‘कामी’, लोभ में ‘लोभी’, क्रोध में ‘क्रोधी’, आदि और इसके विपरीत शान्त मन के ध्यानस्थ होने पर ‘योगी’, उदार होने पर ‘दानी’ आदि रूप हो सकते हैं।

प्रकृति के निरंतर बढ़ते प्रकोप, अनिश्चय और भय के वातावरण में सहमी मानवता को पुनः स्थिर और भय मुक्त करने के लिए विचार करना ही होगा। यदि स्वच्छ भाव से आज चिंतन मनन नहीं किया तो अनेकों शोध से एक बात तो स्पष्ट है कि आगे का मार्ग विनाश की ओर ही जा रहा है और स्वार्थपरक चिंतन और अनुसंधान तो इस मार्ग को निरंतर छोटा ही कर रहे हैं। जो भी उन्नति की है भले ही वह कल्याणकारी हो अथवा विनाशकारी, जो भी श्रेष्ठ प्राप्तियाँ हैं, जो भी उपलब्धियाँ हैं, वह सभी अंततः विचारों और चिंतन से ही प्राप्त हुई हैं। आज कहाँ मानवतावादी चिंतन और अनुसंधान नहीं हो रहे, यदि कुछ हो भी रहे हैं तो अनेकानेक कारणों दिख कहीं नहीं रहे हैं।

महामार‍ियों एवं अन्य विपत्तियों से मानवता लम्बे समय से जूझ रही है। कोरोना ने तो सम्पूर्ण विश्व को स्तब्ध कर दिया है। एक सीख अवश्य लेनी चाहिए कि आधुनिक संसाधनों एवं भौतिक विकास ने सम्पूर्ण मानवता को एक ऐसे स्थान पर लाकर खड़ा कर दिया है कि विचार और भावनाओं में लाख अन्तर हों परंतु विनाश का दंश तो सामूहिक रूप में ही झेलना पड़ेगा। अतिचारी विचारों और विध्वंसक सोच से मुक्त हुए बिना रक्षा का कोई मार्ग नहीं है।

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति निक्सन ने अपने संस्मरण में उद्घाटित किया था कि राष्ट्रपति पद छोड़ना सहज नहीं था। मेरे मन में विचार आया कि क्यों न तीसरा विश्वयुद्ध छेड़ कर अपने साथ दुनिया को भी नष्ट कर दूँ। निक्सन के पास सामर्थ्य थी क‍ि वह दुनिया को तबाह कर सकता था और यदि उसने विवेक से काम नहीं लिया होता तो दुनिया में भयंकर तबाही मच जाती। चूँकि निक्सन ने विवेक और बुद्धि से काम लिया और मन रूपी लगाम को कस के पकड़ लिया, तो तबाही टल गयी। बुद्धिमान निकला निक्सन , बिना युद्ध लड़े ही जीत गया।
आज तो विक्षुब्ध मानसिकता के पास भी महाविनाश के हथियार रखे हैं। कोई और विकल्प भी नहीं है , या तो अब सचेत होना पड़ेगा अथवा और भी बड़े कष्टों के लिए तैयार। आज विश्व जिन प्रलंकारी परिस्थितियों से गुजर रहा हैं, इससे भी बड़े दुर्दिन और क्या होंगे ? यह विपत्ति भी वरदान बन सकती है यदि सभी एक ही दृष्टि से सत्य का साक्षात्कार कर, पुनः बुद्धि को सारथी के रूप में प्रतिष्ठित कर सकें और इसी में सम्पूर्ण मानवता का कल्याण भी निहित है।

अयं निजः परो वेति गणना लघु चेतसाम्।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥

यदि सनातन धर्म के भाव ”वसुधैव कुटुम्बकम्” को सत्यनिष्ठा से धारण कर सकें तो भविष्य निश्चित ही मंगलमय हो सकता है।

“को लाभ आत्मावगमो हि यो वै जितं जगत्केन मनो हि येन॥”

सत्यरूपी आत्मा से साक्षात्कार ही श्रेष्ठ उपलब्धि है और यदि मन को जीत लिया तो समझो जग को जीत लिया। सामान्य भाव से भी कहते ही हैं कि “ मन के हारे हार है और मन के जीते जीत “।

आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव च
बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च।

बुद्धि रूपी सारथी को मन के बंधन से मुक्त कर के ही, सार्थक मार्ग पर चल सकते हैं और इसी पर मानवता की विजय निर्भर है। महाभारत में अर्जुन की विजय में उसके सारथी द्वारिकाधीश भगवान श्री कृष्ण की ही कृपा निहित है और कर्ण की पराजय में भी उनके सारथी मद्रदेश नरेश शल्य की ही मुख्य भूमिका थी। अतः बुद्धि रूपी सारथी के महत्व को समझते हुए चिन्तन मनन करना चाहिए और इसी में मानवता की विजय निहित है।

कप‍िल शर्मा , सच‍िव , श्रीकृष्ण जन्मस्थान, मथुरा

 

– कप‍िल शर्मा ,

सच‍िव-श्रीकृष्णजन्मस्थान , मथुरा

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