मानवता के लिए वरदान और देश के लिए किसी उपहार से कम नहीं है संस्कृति यूनिवर्सिटी का ‘पंचकर्म’ वेलनेस सेंटर

‘योगेश्वर’ कहलाने वाले 16 कला अवतार भगवान श्रीकृष्‍ण की 16वीं और अंतिम कला के रूप में ‘अनुग्रह’ अर्थात उपकार का उल्लेख किया गया है। जिसका सीधा-सीधा अर्थ है निःस्वार्थ भाव से लोगों का उपकार करना।
व्‍यावसायिक शिक्षा के इस दौर में मन के भावों का बहुत महत्व है, और यदि बात की जाए चिकित्‍सा जगत के भाव की तो यह दुर्लभ श्रेणी में जा पहुंचा है। बावजूद इसके अपवाद हमेशा पाए जाते हैं, और शायद आगे भी पाए जाते रहेंगे।
ऐसे ही एक अपवाद के रूप में कृष्‍ण की पावन जन्‍मस्‍थली (मथुरा) पर संस्‍कृति यूनिवर्सिटी द्वारा उकेरा गया है संस्कृति कल्याण केंद्र यानी वेलनेस सेंटर। तमाम दावों-प्रतिदावों के बीच आज जबकि एलोपैथिक चिकित्सा पद्धति और एलोपैथिक चिकित्‍सक आम जन के मन से अपना भरोसा खो रहे हैं तब भारतीय चिकित्सा पद्धति ‘आयुर्वेद’ पर आधारित संस्‍कृति यूनिवर्सिटी के इस वेलनेस सेंटर की महत्ता और बढ़ जाती है।

 

संभवत: इसीलिए भारत सरकार के आयुष मंत्रालय ने भी इस चिकित्‍सा पद्धति पर फोकस किया है जिससे एक ओर जहां सदियों पुरानी हमारी भारतीय चिकित्‍सा प्रणाली का पुनर्स्‍थापन संभव होगा वहीं दूसरी ओर पाश्‍चात्‍य सभ्‍यता के प्रति अंधानुकरण से निजात मिलेगी।
स्‍वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अलग-अलग मंचों से इस परंपरागत भारतीय चिकित्‍सा पद्धति को आगे ले जाने का आह्वान कर चुके हैं। देखा जाए तो संस्कृति यूनिवर्सिटी ने एक तरह से भारत सरकार, आयुष मंत्रालय तथा प्रधानमंत्री मोदी के सपने को साकार करने के साथ-साथ चिकित्सा के क्षेत्र में मील का वो पत्थर स्‍थापित किया है जिसका दूसरा कोई उदाहरण आसपास कहीं दिखाई नहीं देता।
पंचकर्म (केरलीय) पर आधारित मन, शरीर और आत्मा के लिए समग्र एवं परिवर्तनकारी स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करने वाले इस वेलनेस सेंटर का निर्माण ऐसे आधुनिक दृष्टिकोण से किया गया है जिसकी कल्पना भी इसे देखे बिना संभव नहीं हो सकती।
राष्‍ट्रीय राजधानी दिल्‍ली से मात्र सवा सौ किलोमीटर दूर और एनसीआर से सटे हुए उत्तर प्रदेश के मथुरा जनपद की छाता तहसील अंतर्गत राष्‍ट्रीय राजमार्ग पर स्‍थित यह वेलनेस सेंटर आयुर्वेद के दायरे में विभिन्न स्वास्थ्य समस्याओं एवं शारीरिक जटिलताओं से निपटने के लिए निवारक तथा उपचारात्मक सेवाएं प्रदान करता है।
चूंकि संस्कृति यूनिवर्सिटी द्वारा स्‍थापित यह वेलनेस सेंटर आयुर्वेद की पंचकर्म (केरलीय) पद्धति पर आधारित है इसलिए यह जान लेना भी जरूरी है कि पंचकर्म पद्धति आखिर है क्या और इसमें किन-किन विधियों से उपचार किया जाता है।
उपचार की पांच पद्धतियां
पंचकर्म आपके शरीर से विषाक्त पदार्थों को निकालने की एक ऐसी सदियों पुरानी आयुर्वेदिक चिकित्‍सा पद्धति है जिसे कभी संपूर्ण विश्व मान्यता देता था, और अब एलोपैथिक दवाओं के साइड इफेक्ट जानने के बाद फिर इस ओर देखने लगा है।
पंचकर्म आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति में जो विशिष्टता मिलती है वो किसी अन्‍य चिकित्सा पद्धति में नहीं है। अनेक जटिल एवं असाध्य रोग जो केवल औषधियों से ठीक नहीं हो पाते, उनका भी पंचकर्म के माध्‍यम से सहजता के साथ उपचार किया जा सकता है।
इस चिकित्सा पद्धति में प्रमुख रूप से स्नेहन, स्वेदन, वमन, विरेचन, वस्ति, नस्य व रक्त मोक्षण आदि शुद्धि क्रिया के जरिए शरीर व मन में स्थित दोषों को बाहर निकाला जाता है जिससे दोबारा रोग की उत्पत्ति ही न हो।
इस शुद्धि क्रिया में प्रमुख रूप से पंचकर्म (केरलीय), कायाकल्प योग, आहार परामर्श, फिजियोथेरेपी, आयुर स्पा, मुखकांति प्रसाधन सामग्री, केरलीय और मर्मा तथा एकीकृत विकल्प मंच शामिल हैं।
गौरतलब है कि आज की भाग-दौड़ भरी जिंदगी में इंसान कई मानसिक रोगों के साथ-साथ तनाव का शिकार होता जा रहा है। इन समस्याओं का इलाज भी ऋषि-मुनियों द्वारा प्रदत्त पंचकर्म चिकित्सा पद्धति में संभव है।
पंचकर्म चिकित्सा से लाभ की बात करें तो यह शरीर को पुष्ट व बलवान बनाती है। रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाती है। शरीर की क्रियाओं का संतुलन लौटाती है। रक्त की शुद्घि करके त्वचा को कांतिमय बनाती है। इंद्रियों और मन को शांत कर दीर्घायु प्रदान करती है जिससे बुढ़ापा आसानी के साथ कटता है। इसके अलावा यह चिकित्सा पद्धति ब्‍लड प्रेशर संबंधी समस्‍याओं को दुरुस्त करती है। मानसिक तनाव से मुक्‍त करती है और शरीर की अतिरिक्त चर्बी को हटाकर वजन कम करती है। इस पद्धति से मधुमेह, तनाव, गठिया, लकवा आदि जैसे असाध्‍य रोगों में राहत मिलती है। साथ ही यह स्मरण शक्ति बढ़ाने में सहायक है।
दरअसल, आयुर्वेद कहता है कि मनुष्य का शरीर जिन 5 तत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश और वायु) से बना है, उन्हीं तत्वों से ब्रह्मांड भी बना है। जब शरीर में इन 5 तत्वों के अनुपात में गड़बड़ी होती है तो दोष यानी समस्याएं पैदा होती हैं।
आयुर्वेद इन तत्वों को फिर से सामान्य स्थिति में लाता है और इस तरह से रोगों का निदान होता है।
गठिया, लकवा, पेट से जुड़े रोग, साइनस, माइग्रेन, सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस, साइटिका, बीपी, डायबीटीज, लिवर संबंधी विकार, जोड़ों का दर्द, आंखों और आंत की बीमारियों आदि के लिए पंचकर्म एक बेहतरीन चिकित्‍सा पद्धति है।
आयुर्वेद में भी होती है सर्जरी
आयुर्वेद भारत का बहुत ही पुराना इलाज का तरीका है। जड़ी-बूटियों के अलावा मिनरल्स, लोहा (आयरन), मर्करी (पारा), सोना, चांदी जैसी धातुओं के जरिए इसमें इलाज किया जाता है। हालांकि, कुछ लोग ही इस बात को जानते हैं कि आयुर्वेद में सर्जरी (शल्य चिकित्सा) का भी अहम स्थान है।
सच तो यह है कि सर्जरी शुरुआत से ही आयुर्वेद का एक खास हिस्सा रहा है। महर्षि चरक ने जहां चरक-संहिता को काय-चिकित्सा (मेडिसिन) के एक अहम ग्रंथ के रूप में बताया है, वहीं महर्षि सुश्रुत ने शल्य-चिकित्सा (सर्जरी) के लिए सुश्रुत संहिता लिखी। इसमें सर्जरी से संबंधित सभी तरह की जानकारी उपलब्ध है।
आयुर्वेदिक सर्जरी की खासियत
खून में होने वाली गड़बड़ी को आयुर्वेद में बीमारियों का सबसे अहम कारण माना गया है। इन्हें दूर करने के दो उपाय बताए गए हैं- पहला है सिर्फ दवाई लेना और दूसरा दवाई के साथ खून की सफाई (रक्त-मोक्षण)। दूषित रक्त को हटाना भी सर्जरी की एक प्रक्रिया है। इसके लिए आयुर्वेद में खास विधि अपनाई जाती है।
चूंकि संस्‍कृति यूनिवर्सिटी द्वारा स्‍थापित पंचकर्म वेलनेस सेंटर हमारी पारंपरिक चिकित्‍सा पद्धति को उसके परिमार्जित स्‍वरूप में सामने लाया है और उसी के अनुरूप सुविधाओं से सुसज्‍जित है इसलिए ऐसा कहा जा सकता है कि यह एक ओर विभिन्‍न रोगों से पीड़ित मानवता के लिए किसी वरदान से कम नहीं है वहीं दूसरी ओर देश के लिए एक उपहार की तरह है।
हालांकि इसका अहसास करने को जरूरी है कि पंचकर्म के लिए देश के सुदूर हिस्‍सों की ओर देखने की बजाय रोगी कम से कम एक बार संस्कृति यूनिवर्सिटी के वेलनेस सेंटर की विजिट करे और देखें कि व्‍यावसायिक सोच के साथ भी परमार्थ का रास्‍ता निकाला जा सकता है। वो भी उन आधुनिक सुख-सुविधाओं सहित, जिसकी आम तौर पर आयुर्वेदिक चिकित्‍सा पद्धति में लोग कम ही उम्‍मीद करते हैं।
-Legend News

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