महामारी की सीख… आहार शुद्धौ सत्त्वशुद्धिः

आहार शुद्धौ सत्त्वशुद्धिः सत्त्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः। अर्थात् आहार की शुद्धि से सत्त्व की शुद्धि होती है। सत्त्व की शुद्धि से बुद्धि निर्मल और निश्चयी बन जाती है। पवित्र और निश्चयी बुद्धि से मुक्ति भी सुलभता से प्राप्त होती है, अर्थात् सात्विक शुद्ध पवित्र भोजन से मानवता सहजता से ही रोग – शोक मुक्त रहेगी।

वैश्विक महामारी कोरोना से आज सम्पूर्ण विश्व पीड़ित एवं भयभीत है। अभी तक की रिसर्च में दूषित खानपान एवं दूषित मानसिकता ही इसकी जनक है। हमारे प्राचीन धर्म ग्रंथों एवं सनातन परम्पराओं में आरोग्य के जो मार्ग बताए गए हैं, उनमें शुद्ध एवं वातावरण के अनुकूल भोजन को भी प्रमुखता दी गयी है।

हमें अपने भोजन और खाद्य सामग्री का चयन पूर्ण सावधानी से करना चाहिये, यह निश्चित ही हमारे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव डालती हैं। धर्म का स्वास्थ्य और आरोग्य से गहरा सम्बन्ध है। स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन का वास होता है। आरोग्य का अर्थ, रोग-शोक-संताप मुक्त जीवन। उत्तम स्वास्थ्य से ही मनुष्य जीवन का लक्ष्य चतुष्टय पुरुषार्थ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को प्राप्त करना सम्भव है।

सम्पूर्ण विश्व आज स्वस्थ जीवन का रहस्य भारत की समृद्ध सनातन परम्पराओं में खोज रहा है जिनमें ऋतु-स्थान-आयुर्वेद-वातावरण-शरीर की प्रकृति के अनुकूल एवं प्रतिकूल भोजन का वर्णन तो विस्तार से है ही, साथ ही जीवनशैली और अन्य विषयों को भी विस्तार से स्पष्ट किया है।

५ हज़ार वर्ष से पहले चरक संहिता के रचय‍िता महर्षि चरक ने ”नाप्रक्षालितपाणिपादवदनों ( च . सू . ८.२० )” सूत्र में तथा आयुर्वेद के प्रसिद्ध ग्रंथ अष्टांगसंग्रह तथा अष्टांगहृदय के रचयिता आचार्य वाग्भट (७ वी. ८ वी. शताब्दी ) ने पुनः “ धौतपादकरानन: “ के रूप में पुनः स्पष्ट किया कि बिना हाथ -पाँव- मुख शुद्ध किए भोजन नहीं करना चाहिये।

शरीर की शुद्धि भोजन पूर्व जितनी आवश्यक है , उससे भी जरूरी है भोजन सामग्री लेते समय शुद्धता-पवित्रता का विशेष ध्यान रखना। सनातन धर्म में पूजा – यज्ञ – अनुष्ठान आदि सभी धार्मिक कर्म के साथ साथ भोग, व्रत आदि में फल – फूल का उपयोग बृहद रूप में होता है एवं यह विधान में भी है।

शुद्ध मंत्र एवं पवित्र पूजा सामग्री हमारे पूजा अनुष्ठान पर सीधा प्रभाव डालती हैं, ऐसा शास्त्रों -परम्पराओं में निर्देशित/ द्रष्टव्य है। साथ ही प्रभु की प्रसन्नता और पूजा अनुष्ठान की सफलता एवं प्राप्तियों में इनका प्रभाव संत – शास्त्रों ने बताया है।

सनातन परम्पराओं में हम जीवन में उत्तम उपलब्धियाँ तभी प्राप्त कर सकते हैं जब हम आध्यात्मिक एवं सांसारिक जीवन में सावधानी रखें। लापरवाही से यह लोक और परलोक दोनों ही प्रभावित हो सकते हैं।

महर्षि चरक ने एक सूत्र में स्पष्ट किया है कि-

“न कुत्समन्न कुत्सितंम् न प्रतिकूलोपहितमन्नमाददीत: ( च . सू . ८.२०)।”
दूषित भोजन अथवा भोजन प्रसाद सामग्री अविश्वसनीय एवं प्रतिकूल आचरण के व्यक्ति से न तो लेनी चाहिए न ही खानी चाहिये। जब ऐसी सामग्री का प्रयोग भोजन में ही निषेध है तो धार्मिक कर्म एवं प्रसाद में तो निश्चित ही त्याज्य है। प्रतिकूल स्थान अथवा अपवित्र स्थान से ली गई सामग्री का प्रसाद इष्ट/प्रभु को स्वीकार हो ही नहीं सकता अतः अनुकूल भोजन एवं भोजन प्रसाद सामग्री के लिए जागरूकता होनी ही चाहिये।

वैश्विक महामारी कोरोना के क़हर को देखते हुए, अब आवश्यक हो गया है कि हम अपने आहार – विचार – व्यवहार में सनातन परम्पराओं के अनुरूप यथा सम्भव संतुलन बनाए। धर्म की मूल प्रकृति से जुड़े। प्रकृति की अनुकूलता के अनुरूप जीवनशैली ही मानवता के लिए कल्याणकारी है।

Kapil-sharma

 

– कपिल शर्मा ,
सचिव ,
श्री कृष्ण जन्मस्थान सेवा संस्थान,
मथुरा

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