मशहूर मलयाली कवि जी. शंकर कुरुप का जन्मद‍िन आज

महाकवि के नाम से मशहूर चर्चित मलयाली कवि गोविन्द शंकर कुरुप (जी. शंकर कुरुप) भारतीय साहित्य के शीर्ष पुरस्कार साहित्य अकादमी से सम्मानित होने वाले पहले रचनाकार थे। जी. शंकर कुरुप आज के ही द‍िन अर्थात् 5 जून 1901 में हुआ था। मलयालम भाषा के प्रसिद्ध कवि का जन्म केरल के एक गाँव नायतोट्ट में हुआ था। ३ साल की उम्र से उनकी शिक्षा आरंभ हुई। ८ वर्ष तक की आयु में वे ‘अमर कोश’ ‘सिद्धरुपम’ ‘श्रीरामोदन्तम’ आदि ग्रन्थ कंठस्थ कर चुके थे और रघुवंश महाकाव्य के कई श्लोक पढ चुके थे। ११ वर्ष की आयु में महाकवि कुंजिकुट्टन के गाँव आगमन पर वे कविता की ओर उन्मुख हुये। तिरुविल्वमला में अध्यापन कार्य करते हुये अँग्रेजी भाषा तथा साहित्य का अध्यन किया।

अँग्रेजी साहित्य इनको गीति के आलोक की ओर ले गया। उनकी प्रसिद्ध रचना ओटक्कुष़ल अर्थात बाँसुरी भारत सरकार द्वारा दिए जाने वाले साहित्य के सर्वोच्च पुरस्कार ज्ञानपीठ द्वारा सम्मानित हुई। इनके द्वारा रचित एक कविता–संग्रह विश्वदर्शनम् के लिये उन्हें सन् 1963 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

दरअसल बचपन में पढी संस्कृति रचनाओं से ही उन्हें साहित्य का चस्का लगा। बाद में उनका झुकाव अंगे्रजी साहित्य की ओर हुआ और उन्होंने वैज्ञानिक दृष्टिकोण के महत्व को समझते हुए आधुनिक युगबोध को भी अपनाया।

मलयाली भाषा के इस विख्यात कवि का जन्म तीन जून 1901 को केरल के उजाड गांव के छोटे से परिवार में हुआ। पारंपरिक शिक्षा पद्धति के अनुरूप तीन वर्ष की आयु से ही उनका अक्षर ज्ञान शुरू हो गया और आठ वर्ष की आयु तक आते आते उन्होंने अमरकोष, श्रीरामोदंतम जैसे ग्रंथ ही नहीं महाकवि कालिदास के रघुवंश महाकाव्य के कई श्लोक कंठस्थ कर लिए थे। पारंपरिक शिक्षा में काव्यों के कंठस्थ होने के साथ ही 11 वर्ष की आयु से जी के भीतर काव्य की धारा फूट पडी। छात्र जीवन में महज 17 वर्ष की आयु में उनका पहला काव्य संग्रह प्रकाशित हुआ। उनके कुल मिलाकर 25 काव्य संग्रह मलयालम में प्रकाशित हुए।

शिक्षा के बाद 1921 में कुरुप तिरूविलामावाला में माध्यमिक स्कूल में अध्यापक बने। बाद में वह त्रिचूर के समीप सरकारी माध्यमिक अध्यापक प्रशिक्षक केन्द्र में अध्यापक बन गए। इसके बाद वह एरनाकुलम के महाराजा कालेज में मलयालम पंडित बन गए और इसी संस्थान से वह 1956 में प्रोफेसर के पद से सेवानिवृत्त हुए।

कविताओं और निबंध के अलावा कुरुप ने उमर खैयाम की रूबाइयों का मलयालम में अनुवाद किया। इसके अलावा उन्होंने कालिदास के मेघदूत और रविन्द्रनाथ टैगोर की प्रसिद्ध कृति गीतांजलि का अनुवाद कर अपनी मातृभाषा को समृद्ध किया। समीक्षकों के अनुसार कुरुप के साहित्य में महात्मा गांधी और गुरुदेव टैगोर के राष्ट्रभक्ति और मानवतावाद के विचार स्पष्ट तौर पर दिखाई देते हैं। इसके अलावा उन्होंने प्रकृति के सुंदर चित्रों को अपनी कविताओं के माध्यम से जीवंत किया।

कुरुप को ओटक्कुषल अर्थात बांसुरी के लिए पहला ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला। उन्हें सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार से भी सम्मानित किया। भारतीय साहित्य में उनके योगदान को देखते हुए सरकार ने उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया।

उन्होंने पी जे चेरियन की निर्मला फिल्म के लिए गीत भी लिखे। यह गीत संगीत वाली पहली मलयालम फिल्म थी।

मलयालम के इस शीर्ष कवि का निधन 76 वर्ष की उम्र में दो फरवरी 1978 को हुआ। भारत सरकार ने उनकी याद में 2003 में पांच रुपये मूल्य का स्मारक डाक टिकट जारी किया था।

पढ़‍िए जी. शंकर कुरुप की ह‍िन्दी में अनूद‍ित रचना – ओटक्कुष़ळ (बाँसुरी) रचनाकाल 1929

लीला-भाव से जीवित गीतों को गाने वाले
दिशा और काल की सीमाओं से निर्बंध हे महामहिमामय !
मैं जनमा था अज्ञात-अपरिचित
कहीं मिट्टी में पड़े-पड़े नष्ट हो जाने के लिये,
किन्तु तेरी वैभवशालिनी दया ने
मुझे बना दिया बाँसुरी
चराचर को आनन्दित करनेवाली ।
तू ने अपनी सांस की फूँक से
उत्पन्न कर दी है प्राणों की सिहरन
इस निःसार खोखली नली में ।

मन को मगन कर देने वाके
अखिल विश्व के अनोखे गायक !
तू ही तो है जो मेरे अन्दर गीत बनकर बसा है;
अन्यथा क्या बिसात थी इस तुच्छ जड़ वस्तु की
किंचित भी कर सकती राग-आलाप
इस प्रकार हर्षोल्लास से भरकर ।

मन्द हास का मनोरम नवल-धवल फेन,
प्रेम प्रवाह की कलकल मन्द्र ध्वनि,
मानव अहंकार की उद्दाम लहरों का उछाल,
अश्रुसिक्त नेत्रों के नीले कमल,
दैन्य-दारिद्र्य के वर्षाकालीन मेघॊं की काली छाया,
सांसारिक पापों के भँवर जाल
–इन सब को साथ लिये-लिये बहती रहे
मेरे अन्दर की संगीत कल्लोलिनी यह सरिता
हे प्रभु !

हो सकता है कि कल यह बंशी
मूक होकर काल की लम्बी कूड़ेदानी में गिर जाये
या यह दीमकों का आहार बन जाये, या यह
मात्र एक चुटकी राख के रूप में परिवर्तित हो जाये ।
तब कुछ ही ऐसे होंगे जो शोक-निःश्वास लेकर
गुणों की चर्चा करेंगे;
लेकिन लोग तो प्रायः बुराइयों के ही गीत गायेंगे ।
जो भी हो, मेरा जीवन तो तेरे हाथों समर्पित होकर
सदा के लिये आनन्द-लहरियों में तरंगित हो गया,
धन्य हो गया !

  • Legend News

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *