लॉकडाउन में भी खुला है अंत:करण में प्रवेश का मार्ग

कालरूप कोरोना मानवता को काल के गाल में धकेलने को प्रचण्ड वेग से धरा पर विचरण कर रहा है। इसके प्रकोप से बचने के लिए जीवन जैसे स्थिर ही हो गया है कि कहीं कोरोना से सामना हो गया तो मृत्यु तुल्य कष्ट निश्चित ही है। ऐसे विपत्ति काल में इच्छा-अनिच्छा कुछ भी हो सभी बुद्धिमान व्यक्ति बाहर जाने से बच ही रहे हैं। बाहर जाने की ही तो मनाही है परन्तु अपने भीतर प्रवेश का मार्ग तो पहले से अधिक सुलभ है-निष्कंटक है। घर से बाहर निकले तो कष्ट हैं परन्तु अंत:करण में प्रवेश करने से रोग, शोक, दुःख, भय आदि का सामना ही होगा। धर्म और महापुरुषों ने विपत्ति काल को आत्मावलोकन-आत्मचिन्तन का ही काल बताया है। बिना चिन्तित और विचलित हुए यदि अपने भीतर विचरण करें, तो यह विपत्ति काल भी अँततोगत्वा मानवता के लिए कल्याणकारी सिद्ध हो सकता है।
जीवन में जो भी हमारे अनुकूल हैं, उनका आनन्द लें। जो विषय प्रतिकूल अथवा कष्टप्रद हैं, उनको अनुकूल बनाने का मार्ग खोजें। माया-अविद्या-भ्रम को जीवन से दूर कर, मानव जीवन के सार्थक उद्देश्यों को खोजें। ऐसा प्रयास हमको आत्मज्ञान की तरफ ही प्रेरित करता है।
आत्मज्ञान और ज्ञान दोनों पृथक हैं। वास्तव में अपने ज्ञान को आत्मसात् कर, उससे अनुरूप आचरण करना ही आत्मज्ञान है। बिना स्वयं अभ्यास अथवा धारण किए ज्ञान का कोई उपयोग नहीं है, अपितु यह आध्यात्मिक और सांसारिक दृष्टि से कष्टदायक स्थिति ही है। अनेक उदाहरण हैं कि अनुयायियों को नित्य वैराग्य और त्याग का मार्ग बताने वाले ज्ञानीजन आज बंधन और ग्लानि में जी रहे हैं। वास्तव में सच्चा ज्ञान महापुरुषों के वचनों एवं आचरण दोनों से ही ग्रहण करना चाहिए। आत्मज्ञान से स्वयं का स्वयं से साक्षात्कार तो होता ही है, जीवन का उद्देश्य भी सहज उद्घाटित हो जाता है।
ईमानदारी से स्वीकार करना ही चाहिए कि हमारे पास दूसरों को देने के लिए ज्ञान -शिक्षाओं की कोई कमी नहीं है लेकिन यदि उसी ज्ञान का दर्शन हम स्वयं अपने जीवन में करें, तो सम्भवतः स्वयं के जीवन में अज्ञान रूपी अंधकार का ही दर्शन होगा।
विपत्ति सत्य से साक्षात्कार कराती है, जीवन में अनुकूल और प्रतिकूल का भी बोध विपत्ति काल में सहज हो सकता है।अतः ऐसे कठिन काल में आत्मज्ञान को प्राप्त करने का प्रयास समय की सार्थकता ही होगी। विचारणीय है कि यह होगा कैसे ?

इस विषय में एक प्रसंग उल्लेखनीय है कि शिष्य ने ब्रह्मज्ञानी गुरु से विनम्र आग्रह किया कि गुरुदेव मुझे आत्मज्ञान का मार्ग कृपापूर्वक उद्घाटित करें, जिससे मैं अपने जीवन का उद्देश्य और आत्म रूप से साक्षात्कार कर सकूँ।
महात्मा ने उत्तर देने के स्थान पर मौन धारण कर लिया। शिष्य भी उत्तर की प्रतीक्षा में नेत्र बंद कर, हाथ जोड़ कर गुरु के श्री चरणों में ही बैठ गया। कई प्रहर बीत गए, संत मौन ही धारण किए रहे।
काफ़ी प्रतीक्षा के उपरान्त व्याकुल शिष्य ने पुनः विनम्रतापूर्वक प्रार्थना की, गुरुदेव यदि मैं आत्मज्ञान के रहस्य को जानने का पात्र हूँ, तो कृपा कर मेरी जिज्ञासा शान्त कीजिए।
संत मुस्कुराये और बोले, इतनी देर से मैं तुझे आत्मज्ञान का रहस्य ही तो प्रदान कर रहा था। तुम समझे अथवा नहीं?
शिष्य ने कहा, गुरुदेव आप तो निरन्तर मौन में थे! आपने तो अभी तक कुछ भी उद्घाटित नहीं किया है।
तब महात्मा ने पुनः पूछा कि क्या तुम अपने हृदय की धड़कन सुन सकते हो ?
युवक बोला– “ हाँ महाराज ! लेकिन तब आप और मैं मौन थे।
महात्मा हँसे और बोले– “ बस ! यही तो है आत्मज्ञान प्राप्ति का रहस्य। जिस तरह अपने हृदय की धड़कन को सुनने के लिए मौन होने की जरूरत है। उसी तरह अपनी आत्मा की आवाज को सुनने के लिए भी सारी इन्द्रियों को साधने की आवश्यकता है ।
जिस दिन तुमने अपनी इन्द्रियों का निग्रह कर लिया, समझो तुमने आत्मज्ञान का रहस्य जान लिया। इन्द्रियनिग्रह किए बिना आत्मज्ञान सम्भव ही नहीं है। आत्मज्ञान के मार्ग में इंद्रियों के अधीन भोग, भोजन, राग-द्वेष, काम-क्रोध-लोभ-मोह आदि ही मुख्य बाधाएं हैं। जिस प्रकार राख अग्नि की प्रचण्डता में बाधक है, उसी प्रकार इन्द्रियों के भोगों के परिणाम स्वरूप अंत:करण के मल-विक्षेपों को बिना हटाए आत्मज्ञान सम्भव नहीं है। अवसर है कि हम इंद्रियों को मौन कर इस काल का सदुपयोग मानव जन्म के सर्वोच्च लक्ष्य आत्मज्ञान, को प्राप्त करने का प्रयास करें- स्वयं से साक्षात्कार करें।

इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ।
तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ॥

प्रत्येक इन्द्रिय तथा उसके विषय से सम्बन्धित राग-द्वेष को नियंत्रण करने के नियम होते हैं। मनुष्य को ऐसे राग-द्वेष के वशीभूत नहीं होना चाहिए क्योंकि ये आत्म-साक्षात्कार के मार्ग में अवरोधक हैं। अर्थात् मनुष्यको रागद्वेष के वश में नहीं होना चाहिये क्योंकि वे ( रागद्वेष ) ही इस जीव के परिपन्थी हैं अर्थात् चोर की भाँति कल्याणमार्ग में विघ्न करने वाले हैं।

 

Kapil-sharma-janmabhumi

– कपिल शर्मा ,
सचिव ,
श्री कृष्ण जन्मस्थान सेवा संस्थान,
मथुरा

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