दिल्ली के हिन्दी भवन सभागार में फाग-फुहार, मथुरा के कलाकारों ने बांधा समां

नई दिल्‍ली/ मथुरा । राजधानी दिल्ली के ‘साहित्य तीर्थ’ के रूप में ख्याति प्राप्त हिन्दी भवन के सभागार में होली के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम ‘फाग फुहार’ ने दिल्ली के साहित्यकार, कवि, कलाकार एवं विशिष्‍ट व्यक्तियों के तन – मन को भिगो दिया।

कार्यक्रम के प्रथम चरण में हिन्दी भवन में अध्यक्ष कर्नाटक के पूर्व राज्यपाल पद्म भूषण त्रिलोकी नाथ चतुर्वेदी ने ‘फाग फुहार’ के मुख्य अतिथि पद्म मोहन स्वरूप भाटिया को शाल ओढ़ाते हुए कहा कि मोहन स्वरूप भाटिया ने पिछले पचास वर्षों से ब्रज साहित्य – संस्कृति के संरक्षण का ऐतिहासिक कार्य किया है।

हिन्दी भवन के मंत्री और सुप्रसिद्ध हास्य – व्यंग्य कवि गोविन्द व्यास ने मुख्य अतिथि का माल्यार्पण करते हुए कहा कि ब्रज – साहित्य – संस्कृति के संरक्षण के अतिरिक्त ब्रज को होली को अन्तर्राष्‍ट्रीय स्तर पर प्रसिद्धि प्रदान करने में उनका सर्वाधिक योगदान रहा है। दिल्ली की अनेक संस्थाओं के प्रतिनिधियों ने भी मोहन स्वरूप भाटिया का स्वागत – अभिनन्दन किया।

मुख्य अतिथि मोहन स्वरूप भाटिया ने आभार व्यक्त करते हुए कहा कि हिन्दी भवन का कण – कण ब्रजभाषा के यशस्वी साहित्यकार – हास्य रसावतार गोपाल प्रसाद व्यास की जन्म भूमि परासौली की सुरभि से सुरभित है जहाँ महाकवि सूरदास ने 73 वर्ष तक साधना कर सूर सागर की रचना की थी।

उन्होंने आगे कहा कि ब्रज की माटी से देश – विदेश तक ब्रज की होली के गीत – संगीत – नृत्य को पहुँचाने का श्रेय प्राप्त यशस्वी कलाकार वन्दनाश्री के होली कार्यक्रमों की यहाँ प्रस्तुति से मेरा विश्‍वास है कि यह मंच मथुरा – वृन्दावन – बरसाना – नन्दगाँव बन जायेगा।

होली – कार्यक्रम का शुभारंभ राधा – कृष्‍ण की मनोहारी झाँकी से हुआ तो सभागार राधा – कृष्‍ण के जय – जयकार से गूँज उठा। लोक – कलाकार – संगीत निर्देषक और कोरियोग्राफर वन्दनाश्री ने तीव्र गति से घूम – घूम – घुमारे नृत्य के मध्य बिना हांफे का गायन किया तो तालियाँ गूँजती रहीं।

इसी क्रम में बरसाने – नन्दगाँव की लठामार होली, बरसाने की गोपियों द्वारा नन्दगाँव के हुरिहारों को सुनाई गईं प्रेम भरी गालियाँ गोवर्धन – धारण लीला, चरकुला – नृत्य के पश्‍चात् ब्रज की गोपिकाओं ने राधा-कृष्‍ण के स्वरूपों को इन्द्रधनुषी फूलों से ढक दिया और जब फूलों को बिखेरा तब सभागार से बड़ी संख्या में महिलाओं ने मंच पर आकर फूलों की होली खेली तो द्वापर युग की होली का दृश्‍य साकार हो उठा। मंच पर उपस्थित महिलाओं ने वन्दनाश्री को कन्धों पर उठाया तो तालियाँ गूँजती रहीं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Translate »