नज़र पहचान लेते हैं इशारा देखने वाले, तमाशा खुद न बन जाना तमाशा देखने वाले

संविधान से प्राप्‍त शांतिपूर्ण आंदोलन के अधिकार को ‘अतिक्रमण’ में तब्‍दील कर कानून-व्‍यवस्‍था का तमाशा बनाने वाले कथित किसान नेता राकेश टिकैत ने लखीमपुर खीरी हिंसा को लेकर जो बयान दिया है, उससे अब साफ जाहिर है कि वह ‘तमाशबीन’ हैं। मजमा लगाकर तमाशा देखना, उनकी आदत भी है और फितरत भी।
राकेश टिकैत के अनुसार लखीमपुर खीरी में दो भाजपा कार्यकर्ताओं की ‘लिंचिंग’, किसानों पर गाड़ी चढ़ाने की स्‍वाभाविक प्रतिक्रिया थी इसलिए न तो वो उसे हत्‍या मानते हैं और न अपराध। टिकैत का कहना है कि वह एक्‍शन का रिएक्‍शन था, लिहाजा उसे अपराध मानना भी नहीं चाहिए।
ये पहली बार नहीं है जब राकेश टिकैत ने ऐसी बेहूदी बात कही हो, इससे पहले भी वह मौके-बेमौके इसी प्रकार की बयानबाजी करते रहे हैं। शायद इसलिए कि ‘जय जवान, जय किसान’ जैसे नारे इसी देश ने गढ़े थे। किसान को ‘अन्नदाता’ का तमगा इसी देश ने दे रखा है।
लगता है वह इस तमगे को छीन लेने का इंतजार कर रहे हैं, और इसीलिए वो अथवा उनके अनुयायी कभी लाल किले पर ट्रैक्‍टर चढ़ाकर अपनी निरंकुश प्रवृत्ति का परिचय देते हैं तो कभी सेना के काफिले को भी निकलने का रास्‍ता न देकर तानाशाही का प्रदर्शन करते हैं।
लखीमपुर खीरी में जो कुछ हुआ और जिन परिस्‍थितियों में हुआ, उसकी पूरा देश निंदा कर रहा है परंतु मृतकों में शामिल भाजपा कार्यकर्ताओं की मौत को जायज ठहराकर राकेश टिकैत ने बता दिया कि वह संवेदनाहीन होने के साथ-साथ बेहद छोटी सोच रखने वाले आपराधिक व्‍यक्‍ति हैं।
कृषि कानूनों में कितना सही है और कितना गलत, इस बहस से परे जाकर देखें तो हजारों लोगों की भीड़ को लेकर चलने वाला ऐसा कोई भी व्‍यक्‍ति देश व समाज के लिए किस कदर घातक हो सकता है जो ‘लिंचिंग’ को जायज ठहराने की कोशिश करता हो। या यूं कहें कि भीड़ द्वारा किसी को पीट-पीटकर मार डालने का हिमायती हो।
साल भर पूरा होने को आया, 3 नए कृषि कानूनों के विरोध में राकेश टिकैत और उनके जैसे चंद दूसरे कथित किसान नेताओं ने एक ओर जहां सड़कें रोककर आमजन के अधिकारों को कुचल रखा है वहीं देश की कानून-व्‍यवस्‍था का तमाशा बना दिया है। वह स्‍वयं को सर्वोच्‍च न्‍यायालय से भी ‘सुप्रीम’ समझ रहे हैं। सर्वोच्‍च न्‍यायालय बार-बार कह रहा है कि विरोध प्रदर्शन का ये तरीका उचित नहीं है। मामला कोर्ट के सामने है इसलिए सड़कें रोके रखना नाजायज है, परंतु टिकैत और उसकी जुटाई गई भीड़ के कानों पर जूं नहीं रेंग रही क्‍योंकि उन्‍हें विपक्ष से भरपूर खाद-पानी मिल रहा है। ऊपर से पांच राज्‍यों के चुनाव सिर पर हैं इसलिए सरकार चाहकर भी सख्‍ती नहीं बरत सकती।
बहरहाल, इस सबके बावजूद इतना जरूर कहा जा सकता है कि आने वाला समय राकेश टिकैत के लिए बहुत शुभ नहीं होगा। उसने जितना मजमा लगाना था, लगा लिया। जितनी भीड़ जुटा सकता था, जुटा ली। किसानों को जितना बरगलाना था, बरगला लिया। सरकारों को, सुप्रीम कोर्ट को और आम जनता को भी अपनी सामर्थ्‍य के अनुसार चुनौती दे ली, लेकिन किसी को यह नहीं समझा सके कि नए कृषि कानूनों में ऐसा क्‍या है कि वो तीनों कानूनों को ही रद्द करवाने की एकमात्र जिद पाले हुए हैं।
अगले 6 महीनों में दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा। विपक्ष को तो पता लग ही जाएगा कि किसान कितना उसके पक्ष में जाता है, राकेश टिकैत को भी अपनी हैसियत का अंदाज लग जाएगा।
ये बात दीगर है कि मजमा लगाकर तमाशा देखने वालों को तमाशे का पटाक्षेप होने तक इस बात का अंदाज नहीं हो पाता कि कब वह खुद एक तमाशा बन चुके हैं और पब्‍लिक उन्‍हें उनकी औकात बता चुकी है।
पांच राज्‍यों में प्रस्‍तावित चुनावों तक टिकैत का ये तमाशा जारी रह सकता है, और रहेगा भी किंतु उसके बाद की स्‍थितियां निश्‍चित ही बहुत रोचक होंगी क्‍योंकि लिंचिंग की हिमायत शायद ही किसी को स्‍वीकार्य हो।
– सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

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