ये भारतीय संविधान की समीक्षा का समय है

भारतीय संविधान की मूल भावना को “जनता द्वारा, जनता के लिए, जनता की सरकार” के रूप में व्यक्त किया गया

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संसदीय व्यवस्था में प्रधानमंत्री

इंदिरा गांधी एक मजबूत प्रधानमंत्री रही हैं। उनके प्रतिद्वंद्वी समाजवादी दल के नेता राज नारायण थे। इंदिरा गांधी से चुनाव

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गरीबी नहीं हटा सकती कोई ‘खैरात’

धारणा के स्तर पर हमारा देश एक लोककल्याणकारी राज्य एक “वेलफेयर स्टेट” है। धारणा के स्तर पर हम पूंजीवादी नहीं

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कानून, संविधान और देश

भारतीय लोकतंत्र की समस्यायें और समाधान व‍िषय पर लेखक, मोटीवेशनल व हैपीनेस गुरु के नाम से मशहूर पी के खुराना

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चिंता, चिता समान है परंतु काउंसलिंग भी जरूरी

बचपन से ही हम एक सूत्र सुनते आ रहे हैं, और वह है –“चिंता, चिता के समान है।“अनावश्यक चिंता करेंगे

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समग्र सामाजिक विकास के लिए आवश्यक है सहृदय पूंजीवाद

दो सौ साल की लंबी गुलामी के बाद सन् 1947 में हमारा देश स्वतंत्र हुआ, सन् 1950 में हमने अपना

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सफलता के कारक हैं दिल, दिमाग और भावनात्मक परिपक्वता

महान वैज्ञानिक सर आइज़ैक न्यूटन ने बहुत पहले ही विश्व को बता दिया था कि हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती

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सफलता पाने के लिए जरूरी है भय, आशा और आत्मविश्वास का तालमेल

कहते हैं कि डर और आशा का मिश्रण बड़ा खतरनाक और कारगर होता है। यह बड़ा विरोधाभासी कथ्य है और

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सांप-सीढ़ी के खेल में जीवन की सार्थकता

भारतवर्ष आध्यात्मिक लोगों का देश है। यहां संतों-मुनियों की लंबी परंपरा रही है। आज भी संतों, महंतों, डेरों, गुरुओं और

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दुख की दीक्षा में न‍िह‍ित हैं जीवन की सच्चाइयां

फादर वालेस का एक उपदेश मेरे जीवन का प्रेरणा-स्रोत रहा है। उनके उस उपदेश को मैं उनके ही शब्दों में

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