प्रतिष्ठित समाज में भी बेटे की चाहत मरी नहीं

जोर-शोर से प्रचार प्रसार तो यही हो रहा है कि बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ…या बेटी ही अनमोल धन है…या एक बेटी हजार बेटों के बराबर वगैरह-वगैरह।…तो क्या बेटों की कोई औकात नहीं। बेटी-बेटी के भाषण देने वाले, बेटी को दैवीय स्वरूप सर्वश्रेष्ठ बताने वाले(आदि-इत्यादि) बेटे की चाहत नहीं करते। बेटी के लिए दुहाई देने वाला नारी समाज शर्मो-हया के परदे में क्या बेटे की चाहत नहीं रखता। हालांकि आज बेटी के लिए चाहत बढ़ी है, लेकिन बेटे की चाहत भी कम नहीं हुई है और तो और पहला बेटा हो जाए तो दीवाली हो जाती है। अपवाद स्वरूप गणनीय लोग ऐसे होंगे जो पहली बार बेटी होने पर बेहिसाब खुशियां मनाते हैं। आखिर बेटियों के साथ ये छलावा क्यों। कई कड़े कानून बन गए हैं, बावजूद इसके बेटे के प्रति समाज और समाज के नारी जगत में बेटे की चाहत कम नहीं हुई है। नई-नई दुल्हन से सारा घर-परिवार चाहता है कि पहली बार में उसे बेटा हो। यहां तक कि ननद, जेठानी, सास आदि-इत्यादि ससुराल पक्ष की औरते भी तो मायके की भी इसी पक्ष में होती हैं।
कुल का दीपक
बेटा होना इसलिए जरूरी है कि वो कुल का दीपक होता है। भले ही वह बड़ा होकर आवारा निकल जाए। मां-बाप का सहारा न बने। लेकिन बेटा जरूरी है। कुल का दीपक होता है। जो प्रकाश देने की बजाए आग ही लगा दे। लेकिन जरूरी है एक कुल दीपक का होना। इसी चक्कर में यानी कुल दीपक के फेर में कई बार तो कन्या भ्रूण हत्या हो जाती है। कुल दीपक की पैदाइश के लिए मन्नत मांगना, उपवास, मंदिर-मस्जिद-गुरुद्वारा चर्च आदि से लेकर बड़े बड़े तीर्थस्थानों की यात्रा से लेकर बड़े-बड़े पंडित, तांत्रिक, आदि की सेवा ..यानी जो भी उपाय होता है किए जाते हैं जिसमें काफी धन खर्च होता है। यही धन वर्तमान में बेटियों की शिक्षा, स्वास्थ्य में लगाया जाए तो काफी कुछ सुधर सकता है। मगर नहीं। इत्तफाकन बेटा हो भी जाए तो सबसे ज्यादा लाड़ दुलार उसे मिलता है, इस दौरान बेटी या बेटियां उपेक्षा का शिकार हो जाती है।
गांव ही नहीं शहर भी
बेटे की चाहत रखने वाला केवल अकेला गांव ही नहीं है शहरों में भी यही चाहत है। आज भी लड़कियों के पैदा होने पर अक्सर महिलाओं को घर में ताने सुनने पड़ते हैं। ये बात सिर्फ गाँव की नहीं है। ये बात तो शहरों में रहने वाले पढ़े-लिखे लोगों की भी है। बड़े प्यार से लोग पत्नी के प्रेग्नेंट होने पर ये कह देते हैं कि लड़की हो या लड़का उन्हें फर्क नहीं पड़ता, लेकिन जैसे ही पत्नी क्यूट सी बेटी को जन्म देती है, पति समेत कई चेहरोें पर सिकन आ जाती है।
सरकार चाहे कितनी भी कोशिश क्यों न कर ले, लेकिन लोगों की मानसिकता नहीं बदल सकती। बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ का नारा भले ही लोग लगाते हों।
चोरी छिपे कन्या भ्रूण हत्या
वर्तमान में बेटियां किसी से कम नहीं हैं। वह हर क्षेत्र में परचम लहरा कर देश के विकास में अपना सहयोग कर रही हैं। सरकार ने समाज में हर बुुराइयों को रोकने के लिए कानून तो बनाए हैं लेकिन जमीनी स्तर पर इसका पूरी तरह से पालन नहीं होता है। कन्या भ्रूण हत्या को रोकने के लिए भी सरकार ने सख्त कानून तो बनाया है, लेकिन चोरी छिपे अभी कई लोग भ्रूण परीक्षण के अपराध को अंजाम दे रहे हैं। कन्या भ्रूण हत्या पर पूरी तरह से रोक लगाया जाना अनिवार्य है। इसके सरकार को जन जागरुकता अभियान चलाने की आवश्यकता है। किसी जोड़े को खुशखबरी मिलती है कि उनके आंगन में किलकारी गूंजने वाली है तो कई ये कोशिश करते हैं कि किसी टेस्ट के जरिए ये पता चल जाए कि बेटा होगा या बेटी! ऐसा इसलिए क्योंकि ज्यादातर लोग बेटे की ख्वाहिश रखते हैं। इतिहास पर नजर दौड़ाएं तो पाएंगे कि लगभग सभी समाज पुरूष प्रधान रहे हैं। इसलिए दुनियां में बेटे की चाहत ज्यादा मजबूत रही है। कई समाज में तो बेटे के जन्म के बाद परिवार में औरत का मुकाम भी बदलता नजर आता है।
प्रतिष्ठित समाज में भी बेटे की चाहत
समाज की प्रतिष्ठित महिलाओं के घर-परिवारों की ओहदेदार प्रतिष्ठित औरते भले ही अपने समाजसेवी कार्यक्रमों में बेटी की भाषणों में दुहाई देती रहें, लेकिन उनकी भी चाहत होती है कि उनके परिवार में उनका बेटा या पोता हो। बेटे की चाहत की पहले ये खुली इच्छा थी, जो कन्या या बेटी को बढ़ावा देने के प्रचार-प्रसार और बेटियों के हित में बने कानूनों के कारण भले ही दबीछिपी सी हो गई हो, लेकिन बेटे की चाहत मरी नहीं।

– अनिल शर्मा

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