सद्गुरु ने कहा, बच्चों को पॉलीमर के कपड़े पहनाना अपराध है

कोयंबटूर। ‘मैं मशीनों के खिलाफ नहीं हूं, मैं औद्योगीकरण के खिलाफ नहीं हूं, लेकिन जो चीजें इंसानी हाथों से की जाती हैं, उनमें एक खास सौंदर्यबोध, सुंदरता और अनोखापन होता है और सबसे बढ़कर वह एक मानव अभिव्यक्ति होती है,’ ईशा फाउण्डेशन के संस्थापक, सद्गुरु ने कहा। वे केंद्रीय मंत्री, कपड़ा, और मंत्री, महिला और बाल विकास, स्मृति ईरानी से बातचीत कर रहे थे, जिसमें भारतीय कपड़ा उद्योग में नया जीवन फूंकने और देशी बुनकरों के भाग्य को पलटने पर चर्चा हुई।

इस बातचीत को, जो ‘In Conventions with the Mystic’ श्रंखला की एक कड़ी थी, 7 अगस्त को राष्ट्रीय हैंडलूम दिवस के अवसर पर लाइव वेबकास्ट किया गया। भारत की प्राचीन बुनकरी कला को पुनर्जीवित करने और प्रचलित बनाने के लिए सद्गुरु ने पिछले साल ‘बुनकरी कला को बचाओ’ अभियान शुरू किया था।

On Youtube – In Conventions with the Mystic

 

हैंडलूम उत्पादों, युवाओं और आधुनिक बाजार के बीच संपर्क की कमी की ओर संकेत करते हुए श्रीमती ईरानी ने कहा, ‘मेरे विचार से चुनौती इसी में है।’ उन्होंने कहा कि कपडा मंत्रालय हस्तनिर्मित कपड़ों को बढ़ावा देने के लिए अब बीबा और अरविंद मिल्स जैसे बड़े व्यापारिक ब्रांड के साथ बात कर रहा है। ‘हम व्यापारिक क्षेत्र में लोगों से अपनी दुकानों के लिए सीधे बुनकरों से कपड़े खरीदने को कह रहे हैं, इससे सहभागिता आएगी जो लंबे समय से अनुपस्थित थी,’ उन्होंने कहा।

इस सत्र को लवीना बल्दोता ने संचालित किया, जो कला और हस्तकौशल की संरक्षक हैं और हाथ से बुने उत्कृष्ट कपड़ों के निर्माण के लिए बुनकरों के साथ अथक परिश्रम कर रही हैं।

सद्गुरु ने स्कूलों की यूनिफार्म को राज्य के हस्तनिर्मित कपड़ों से बनाए जाने पर जोर दिया। ‘एक बच्चे को पॉलिमर धागों में लपेटना अपराध है। आप वैसा मरी मछली के साथ करते हैं, जीवित बच्चों के साथ नहीं। खासकर एक बच्चे का शरीर इसके प्रति अतिसंवेदनशील होता है – उनके सिस्टम में पॉलिमर रेशों के जाने से उनके शारीरिक और मानसिक, दोनों स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है।’ उन्होंने कृषि उत्पादों के बेरोकटोर व्यापार के लिए सरकार के द्वारा हाल ही में उठाए गए कदम का स्वागत किया। यह और अधिक किसानों को फाइबर देने वाले पेड़ों की फसलें लगाने के लिए प्रोत्साहित करेगा। ईशा दक्षिण भारत में वृक्ष-आधारित खेती को अपने कावेरी कॉलिंग अभियान के जरिए बढ़ावा दे रहा है। यह एक आर्थिक रूप से लाभप्रद और पर्यावरण की दृष्टि से खेती का कायम रहने योग्य विकल्प है।

‘प्राचीन भारत को दुनिया को कपड़े प्रदान करने का गौरव प्राप्त था। हमें हाथ से बुनाई करने वालों को विशाल स्तर पर वापस लाना है क्योंकि खेती के बाद, आजीविका प्रदान करने वाला सबसे बड़ा उद्योग हैंडलूम ही है। मेरे विचार से हम कई मायनों में भारत को एक काफी अधिक सौंदर्यपूर्ण और समझदारी भरे तरीके से प्रस्तुत करने जा रहे हैं,’ सद्गुरु ने कहा।
राष्ट्रीय हैंडलूम दिवस के मौके पर कपड़ा मंत्रालय ने देश भर में 10 हस्तकला और हैंडलूम ग्राम स्थापित करने की अपनी योजना को उजागर किया। सरकार को आशा है कि यह पर्यटकों को आकर्षित करेंगे और विभिन्न उत्पाद प्रचलित होंगे। यह कदम भारतीय बुनकरी कला की समृद्ध विरासत को जानने में लोगों की सहायता करेगा।
-PR

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