रिपोर्ट : LegendNews
क्या होते हैं उत्तराखंड के घोस्ट विलेज, और इन्हें लेकर शुरू की जा रही है कौन सी बड़ी योजना?
उत्तराखंड के वीरान हो चुके गांवों को घोस्ट विलेज कहा जाता है और उन गांवों के अधिकांश घरों पर ताले लटके हैं। अब इन गावों और तालों का न सिर्फ आंकड़ा जुटाया जाएगा, बल्कि तालों को खोलकर पहाड़ों में फिर से जिंदगी बसाने की एक बड़ी और महत्वाकांक्षी योजना जमीन पर उतारी जा रही है।
जनगणना 2027 के पहले चरण के तहत उत्तराखंड में 25 अप्रैल से 24 मई 2026 तक 'मकान सूचीकरण और मकान गणना' का महाभियान चलने जा रहा है।
यह अभियान पलायन के कारण खाली पड़े मकानों की सटीक और पारदर्शी तस्वीर पेश करेगा और फिर इन्हें 'लग्जरी वेडिंग डेस्टिनेशन' तथा 'होम-स्टे' के रूप में विकसित कर आर्थिकी को नई रफ्तार देगी।
कैसे होगी इन मकानों की गणना?
उत्तराखंड के पहाड़ी जिलों में पलायन हमेशा से एक नासूर रहा है। ग्राम्य विकास एवं पलायन निवारण आयोग की पिछली रिपोर्ट्स के अनुसार राज्य में 1,792 राजस्व गांव पूरी तरह से 'घोस्ट विलेज' (जनशून्य) की श्रेणी में आ चुके हैं। इनमें सबसे अधिक 331 गांव अकेले पौड़ी गढ़वाल जिले में हैं। कुमाऊं मंडल में अल्मोड़ा और पिथौरागढ़ की स्थिति भी बेहद चिंताजनक है।
इस बार जनगणना निदेशालय ने पलायन का जमीनी सच जानने के लिए एक विशेष मास्टर प्लान तैयार किया है। जब प्रगणक (गणना करने वाले कर्मचारी) गांवों में पहुंचेंगे तो जो मकान वीरान मिलेंगे या जिन पर ताला लगा होगा, उन पर विशेष नजर रखी जाएगी। यदि पूरे एक महीने (25 अप्रैल से 24 मई) तक वहां कोई जानकारी देने वाला व्यक्ति नहीं मिलता है तो उस मकान को 'हाउस ऑफ यूज' कैटेगरी के तहत 'वैकेंट' (Vacant) और उसकी सब-कैटेगरी 'लॉक्ड' (Locked) में दर्ज कर दिया जाएगा। इससे यह पूरी तरह स्पष्ट हो जाएगा कि कितने मकान रोजगार या अन्य कारणों से अस्थायी रूप से बंद हैं और कितने मकान स्थायी रूप से वीरान हो चुके हैं।
पहाड़ों से पलायन के मुख्य कारण और सामरिक चिंताएं
पलायन का यह आंकड़ा केवल एक सामाजिक समस्या नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा से भी जुड़ा मुद्दा है। उत्तराखंड की सीमाएं चीन और नेपाल से लगती हैं। सीमांत जिलों (जैसे पिथौरागढ़, चमोली और उत्तरकाशी) से गांवों का खाली होना सामरिक सुरक्षा के लिहाज से एक बड़ा खतरा माना जाता है। खाली होते सीमावर्ती गांव घुसपैठ की आशंका को बढ़ाते हैं।
लोग आखिर अपने पुरखों के घर क्यों छोड़ रहे हैं?
पहाड़ों में कृषि के अलावा आय के साधन सीमित हैं। अच्छी शिक्षा और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए लोग मैदानी इलाकों (देहरादून, हल्द्वानी) का रुख कर रहे हैं।
इसके अलावा सूअर, बंदर और गुलदार के आतंक ने खेती को भारी नुकसान पहुंचाया है जिससे निराश होकर लोगों ने खेती और गांव दोनों छोड़ दिए।
पहली बार 100 प्रतिशत पेपरलेस होगी गणना
डिजिटल युग के साथ कदमताल मिलाते हुए जनगणना निदेशालय ने इस बार एक बड़ा और ऐतिहासिक बदलाव किया है। इस बार की मकान गणना पूरी तरह से 100 प्रतिशत पेपरलेस होगी। रजिस्टर और कागजों का झंझट खत्म कर दिया गया है।
ऑनलाइन स्वगणना: जो जागरूक नागरिक अपने मकान की जानकारी खुद देना चाहते हैं, उन्हें 10 अप्रैल से 24 अप्रैल 2026 तक 'se.census.gov.in' पोर्टल पर ऑनलाइन स्वगणना का विकल्प दिया गया है।
डोर-टू-डोर डिजिटल सर्वे: 25 अप्रैल से 24 मई तक 30 हजार से अधिक प्रशिक्षित कर्मचारी (प्रगणक और सुपरवाइजर) घर-घर जाकर मोबाइल एप्लीकेशन के माध्यम से डाटा एकत्र करेंगे।
ब्लॉक मैपिंग की सटीक व्यवस्था: प्रदेशभर में मकान सूचीकरण के लिए लगभग 30 हजार गणना ब्लॉक बनाए गए हैं। एक ब्लॉक में अधिकतम 800 लोगों की आबादी या 150 से 200 मकानों को शामिल किया गया है। प्रगणक अपने क्षेत्र का डिजिटल नक्शा बनाएंगे जिसमें रिहायशी मकान, दुकान, मंदिर और अन्य सभी संरचनाओं को स्पष्ट रूप से चिह्नित किया जाएगा।
33 सवालों से परखा जाएगा प्रदेशवासियों का जीवन स्तर
मकानों की गणना के दौरान महज ईंट और दीवारों की गिनती नहीं होगी, बल्कि प्रदेश के लोगों के जीवन स्तर का भी बहुत बारीक आकलन किया जाएगा। इसके लिए मोबाइल अनुसूची में 33 मानक सवाल तय किए गए हैं। इन सवालों को चार मुख्य श्रेणियों में बांटा जा सकता है:
मकान की भौतिक और ढांचागत स्थिति: प्रगणक यह दर्ज करेंगे कि मकान की छत, दीवार और फर्श किस सामग्री (कच्ची मिट्टी, पत्थर, सीमेंट या टीन) से बने हैं। मकान की हालत कैसी है, रहने लायक है, जीर्ण-शीर्ण है या खतरनाक स्थिति में है।
बुनियादी और आवश्यक सुविधाएं: पीने के पानी का मुख्य स्रोत क्या है और वह घर से कितनी दूर है। शौचालय की स्थिति कैसी है (घर के भीतर है या बाहर, सीवर से जुड़ा है या सेप्टिक टैंक है)। घर में बिजली की सुविधा है या नहीं। खाना पकाने के लिए मुख्य रूप से किस ईंधन (एलपीजी गैस, लकड़ी, उपले या बिजली) का इस्तेमाल होता है।
आधुनिक संपदा और संसाधन: घर में संचार और मनोरंजन के साधन (रेडियो, टेलीविजन, कंप्यूटर, लैपटॉप, इंटरनेट) हैं या नहीं। आवाजाही के लिए परिवार के पास साइकिल, दोपहिया वाहन या कार मौजूद है या नहीं।
पारिवारिक स्थिति और जनसांख्यिकी: परिवार के मुखिया का नाम, लिंग और उनकी सामाजिक श्रेणी (SC/ST/अन्य) क्या है। घर में मुख्य रूप से कौन सा अनाज खाया जाता है।
खाली मकानों का क्या होगा?
जनगणना में जो मकान 'लॉक्ड' या खाली चिह्नित होंगे, उन्हें लेकर राज्य सरकार और उत्तराखंड इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट बोर्ड (UIDB) ने एक दूरगामी मास्टर प्लान तैयार किया है। खाली पड़े इन वीरान गांवों को 'लग्जरी वेडिंग डेस्टिनेशन' और पर्यटन के नए हब के रूप में विकसित किया जाएगा। इसका मुख्य उद्देश्य पलायन कर चुके लोगों को वापस अपने गांवों की ओर आकर्षित करना (रिवर्स पलायन) है।
पहले चरण में 10 'घोस्ट विलेज' का होगा कायाकल्प
सरकार की योजना के तहत शुरुआती चरण में पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर 10 ऐसे गांवों को चुना जा रहा है जो पूरी तरह से खाली हो चुके हैं, लेकिन पर्यटन या धार्मिक नजरिए से महत्वपूर्ण स्थलों (जैसे रुद्रप्रयाग, केदारनाथ मार्ग, कॉर्बेट नेशनल पार्क, रामनगर) के करीब हैं।
इन गांवों में सरकार सबसे पहले सड़क, पेयजल और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाएं बहाल करेगी। इसके बाद खाली पड़े मकानों की मरम्मत कर उन्हें ठेठ पहाड़ी संस्कृति के अनुरूप संवारा जाएगा। पुराने मकानों में पत्थरों की छत (पाथर) और काठ-खोली (लकड़ी की पारंपरिक नक्काशी) को पुनर्जीवित किया जाएगा। इन तैयार ढांचों का इस्तेमाल बड़े स्तर पर डेस्टिनेशन वेडिंग, प्री-वेडिंग शूट और कॉर्पोरेट इवेंट्स के लिए किया जाएगा।
स्थानीय रोजगार और आर्थिकी को मिलेगी संजीवनी
पहाड़ों में खाली मकानों का इस तरह से वाणिज्यिक और पर्यटन उपयोग करने के पीछे सरकार का सबसे बड़ा लक्ष्य स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए और स्थायी अवसर पैदा करना है। जब इन वीरान पड़े गांवों में शाही शादियों और बड़े आयोजनों का सिलसिला शुरू होगा तो पूरी स्थानीय अर्थव्यवस्था को गति मिलेगी।
आयोजनों के लिए कैटरिंग, ट्रांसपोर्ट, टेंट हाउस, और सजावट के सामान की जरूरत होगी। फूलों की मांग बढ़ेगी जिससे स्थानीय किसानों को फ्लोरीकल्चर (फूलों की खेती) से जोड़ा जा सकेगा। मेहमानों को परोसने के लिए पहाड़ी व्यंजनों (जैसे मंडुवे की रोटी, झंगोरे की खीर) की मांग बढ़ेगी जिससे स्थानीय कृषि उत्पादों को सीधा बाजार मिलेगा। इससे शहरों की तरफ जा चुके युवा वापस अपने गांव लौटकर रोजगार कर सकेंगे।
होम-स्टे योजना: लौटेंगे अपने तो मिलेगा भारी अनुदान
खाली मकानों का उपयोग केवल वेडिंग डेस्टिनेशन तक सीमित नहीं रहेगा। जो स्थानीय लोग अपने बंद पड़े घरों की मरम्मत कर उन्हें पर्यटन के लिहाज से फिर से आबाद करना चाहते हैं, उन्हें सरकार 'दीनदयाल उपाध्याय होम-स्टे योजना' के तहत भारी प्रोत्साहन दे रही है।
इस योजना के तहत सरकार ने कैपिटल सब्सिडी (पूंजीगत अनुदान) को 33 प्रतिशत से बढ़ाकर 50 प्रतिशत तक कर दिया है।
जो लोग अपनी जमीन के बजाय लीज की जमीन पर होम-स्टे बनाना चाहते हैं, उन्हें भी योजना में शामिल कर लिया गया है।
इससे गांव के लोग सीधे तौर पर पर्यटकों की मेजबानी कर सकेंगे और अपनी आर्थिकी मजबूत कर सकेंगे।
-Legend News

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