संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में शुक्रवार को उस समय नाटकीय मोड़ आया जब होर्मुज जलडमरूमध्य को 'इंटरनेशनल डिफेंसिव फोर्स' के जरिए खोलने के प्रस्ताव पर होने वाली वोटिंग को ऐन वक्त पर टाल दिया गया। 
बहरीन द्वारा पेश किए गए इस प्रस्ताव को अमेरिका और ब्रिटेन का पुरजोर समर्थन प्राप्त था, लेकिन रूस और चीन ने इसे 'एकतरफा' और 'अवैध सैन्य हस्तक्षेप' करार दिया।
रूस के प्रतिनिधि ने स्पष्ट किया कि बिना ईरान की सहमति के खाड़ी में विदेशी सेना की तैनाती तनाव को कम करने के बजाय और भड़काएगी। 
चीन ने भी इस पर वीटो करने के संकेत दिए, जिसके बाद परिषद के अध्यक्ष को मतदान अगले सप्ताह तक स्थगित करने का निर्णय लेना पड़ा।
अमेरिका का 'बल प्रयोग' प्लान और रूस का जवाबी तर्क 
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन इस प्रस्ताव के जरिए होर्मुज में ईरान की घेराबंदी तोड़ना चाहता था ताकि वैश्विक तेल आपूर्ति को बहाल किया जा सके। अमेरिका का तर्क है कि ईरान ने अंतर्राष्ट्रीय जलमार्गों को बंधक बना लिया है और इसे छुड़ाने के लिए सैन्य कार्रवाई अनिवार्य है।
इसके विपरीत रूस का कहना है कि यह प्रस्ताव केवल ईरान की संप्रभुता पर हमला करने का बहाना है। रूस ने मांग की है कि इस क्षेत्र में किसी भी बल प्रयोग से पहले कूटनीतिक बातचीत के सभी दरवाजे खटखटाए जाने चाहिए। इस कूटनीतिक रस्साकशी के कारण सुरक्षा परिषद में गहरा विभाजन दिखाई दे रहा है, जिससे प्रस्ताव का भविष्य अधर में लटक गया है।
अगले हफ्ते तक टला फैसला, तेल बाजार में बढ़ी बेचैनी 
मतदान टलने की खबर के साथ ही वैश्विक तेल बाजार और शिपिंग कंपनियों के बीच बेचैनी बढ़ गई है। होर्मुज का रास्ता बंद होने के कारण पहले से ही कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं।
व्यापारियों को उम्मीद थी कि यूएन के दखल से रास्ता जल्द खुल जाएगा, लेकिन अब उन्हें अगले सप्ताह तक इंतजार करना होगा। कूटनीतिक गलियारों में चर्चा है कि अगले कुछ दिनों में अमेरिका, ब्रिटेन और बहरीन प्रस्ताव की भाषा में कुछ बदलाव कर सकते हैं ताकि रूस और चीन की चिंताओं को दूर किया जा सके।
हालांकि, ईरान के अड़ियल रुख को देखते हुए किसी भी आम सहमति पर पहुँचना मुश्किल नजर आ रहा है।
कूटनीतिक वार्ता को मिला एक और मौका या बढ़ेगा युद्ध का खतरा? 
विशेषज्ञों का मानना है कि मतदान स्थगित होना कूटनीति के लिए आखिरी मौका हो सकता है। संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने सभी पक्षों से संयम बरतने की अपील की है लेकिन दूसरी ओर डोनाल्ड ट्रंप की 'तेल की नदियां बहा देने' वाली धमकी ने माहौल को और गरमा दिया है। 
यदि अगले सप्ताह भी सुरक्षा परिषद में कोई ठोस फैसला नहीं होता है, तो आशंका जताई जा रही है कि अमेरिका और उसके सहयोगी 'कोअलिशन ऑफ द विलिंग' के तहत बिना यूएन की मंजूरी के भी सैन्य कार्रवाई शुरू कर सकते हैं। यह स्थिति पूरे पश्चिमी एशिया को एक विनाशकारी महायुद्ध में झोंक सकती है। 
-Legend News

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