पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम ने चेतावनी दी है। उनका मानना है कि भारत की आर्थिक चुनौती विदेशी मुद्रा संकट नहीं है। इसके बजाय 'किफायत और आजीविका का संकट' है। अगर ईरान युद्ध लंबा खिंचता है तो यह और भी बदतर हो सकता है। उनके मुताबिक, हालात बेहतर होने से पहले और ज्‍यादा बिगड़ने की आशंका है। पीएम मोदी की लोगों से बचत करने की अपील का उन्‍होंने समर्थन किया है।
दिग्‍गज अर्थशास्त्री ने कहा कि मौजूदा ऊर्जा संकट पहले से ही घरों और आजीविका पर दबाव डाल रहा है। दुनिया भर में ईंधन की बढ़ती कीमतों के कारण ऐसा हुआ है। इंडिया टुडे के साथ खास बातचीत में उन्होंने कहा, 'यह विदेशी मुद्रा का संकट नहीं है। हमारे पास 700 अरब डॉलर का रिजर्व है। ऐसा नहीं है कि हम चीजें खरीद नहीं सकते। यह किफायत और आजीविका का संकट है क्योंकि कीमतें बढ़नी ही हैं। आजीविका पर इसका असर पड़ेगा।' 
युद्ध की अवधि पर बहुत कुछ निर्भर
पूर्व सीईए ने कहा कि इस संकट की अवधि काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगी कि युद्ध कितने समय तक चलता है। साथ ही होर्मुज स्‍ट्रेट बाधित रहता है या नहीं। उन्होंने कहा, 'भले ही यह जल्दी खुल जाए। फिर भी इसमें लोगों की सोच से ज्‍यादा समय लगेगा। सप्‍लाई इतनी आसानी से बाजार में नहीं आ सकती।'
सुब्रमण्यम ने कहा कि नीति निर्माताओं को विदेशी पूंजी आकर्षित करने पर कम और इस बात पर ज्‍यादा ध्यान देना चाहिए कि ऊर्जा की बढ़ती कीमतों का बोझ समाज के सभी वर्गों में कैसे साझा किया जाए। 
उन्‍होंने कहा, 'चुनौती यह है कि इस संकट का बोझ समाज के सभी वर्गों में निष्पक्ष और समान रूप से कैसे साझा किया जाए। यही नीति और शासन की चुनौती है। न कि यह कि हमें विदेश से पैसा कैसे वापस लाना चाहिए या पूंजी आकर्षित करने के लिए ब्याज दरें कैसे बढ़ानी चाहिए।'
एक साथ भारत के सामने कई चुनौतियां
पश्चिम एशिया संघर्ष के बाद कच्चे तेल की कीमतों में उछाल आया है।
इससे भारत को रुपये पर बढ़ते दबाव का सामना करना पड़ा है।
विदेशी पोर्टफोलियो के बाहर जाने और आयात बिलों में बढ़ोत्तरी ने मुश्किल बढ़ाई है।
मौजूदा स्थिति ने उजागर कीं भारत की कमजोरियां
अर्थशास्त्री ने कहा कि मौजूदा स्थिति ने भारत के ग्रोथ मॉडल की कमजोरियों को भी उजागर किया है। उन्होंने कहा, 'एक मध्यम-अवधि की चुनौती भी है जो भारत के बुनियादी विकास और ग्रोथ मॉडल में चल रही घटनाओं में झलकती है। सवाल यह है कि क्या यह रोजगार पैदा कर रहा है? क्या यह विकास ला रहा है? क्या यह टिकाऊ है?'  
पीएम की खर्च कटौती की अपील का किया समर्थन
मोदी सरकार के खर्च में कटौती के अभियान पर पूर्व सीईए ने शुरुआती अपीलों का समर्थन किया। इनमें गैर-जरूरी यात्रा और उपभोग में कटौती करने जैसे स्वैच्छिक खर्च में कटौती की अपीलें शामिल थीं। उन्होंने कहा, 'अल्पकालिक रूप से निजी खर्च में कटौती की अपील अच्छा शुरुआती कदम है।' लेकिन उन्‍होंने साथ में जोड़ा कि यह उस वास्तविक बोझ को साझा करने का विकल्प नहीं है जो पड़ना ही है।
पूर्व सीईए ने कहा कि रुपये से जुड़े अत्यधिक फोकस और झूठी प्रतिष्ठा ने सरकार का ध्यान उस काम से भटका दिया है जो वास्तव में किया जाना चाहिए। 
उनके मुताबिक 'कुछ कीमतें तो बढ़ानी ही पड़ेंगी। समाज के गरीब तबकों पर इसका बोझ सीमित रखना होगा। कुछ हद तक एक्सचेंज रेट को नीचे लाना होगा। कीमतें बढ़ानी होंगी। यह एडजस्टमेंट का ही एक हिस्सा है।'
अर्थशास्त्री ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उस अपील का समर्थन किया जिसमें उन्‍होंने लोगों से विदेश यात्रा घटाने की अपील की थी। उन्‍होंने कहा, 'अगर एक्सचेंज रेट नीचे आता है तो विदेश यात्रा और महंगी हो जाएगी। मीडियम क्‍लास के लिए अपने बच्चों को पढ़ाई के लिए विदेश भेजना और भी महंगा हो जाएगा। यह जरूरी भी है और वांछनीय भी।' 
पूर्व सीईए ने दी यह चेतावनी
साथ ही, उन्होंने चेतावनी दी कि ईंधन, गैस और खाद की बढ़ती कीमतें गरीब परिवारों और किसानों को नुकसान पहुंचाएंगी, जब तक कि सरकार इस असर को कम करने के लिए कोई कदम न उठाए।
सुब्रमण्‍यम ने कहा, 'समस्या की बात यह है कि ऊर्जा की कीमतें बढ़ रही हैं। इनका इस्तेमाल गरीब लोग और किसान करते हैं। जैसे खाद, पेट्रोल, गैस। अगर हम कीमतों में बढ़ोत्तरी को रोक नहीं सकते तो हमें इसका कोई न कोई हल निकालना होगा।'
निजी निवेश अभी भी कमजोर क्यों है?
सुब्रमण्यम ने यह सवाल भी उठाया कि भारत की ऊंची ग्रोथ के अनुमानों के बावजूद निजी निवेश और विदेशी पूंजी का प्रवाह अभी भी कमजोर क्यों बना हुआ है। 
उन्‍होंने कहा, 'रुपया काफी गिरा है और युद्ध से ठीक पहले वाले साल में तो यह सबसे ज्‍यादा गिरा था। अगर भारत निवेश के लिए इतनी अच्छी जगह है और जैसा कि दावा किया जा रहा है, हम 7.5-8% की दर से बढ़ रहे हैं तो फिर लोग निवेश क्यों नहीं कर रहे हैं?'
अर्थशास्त्री ने इसे 'अजीब' बताया कि भारत एक मजबूत ग्रोथ का अनुमान लगा रहा है, जबकि प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एडीआई) और निजी निवेश अभी भी सुस्त पड़े हैं। उन्होंने निजी निवेश को फिर से बढ़ाने और निर्यात में प्रतिस्पर्धा को बेहतर बनाने के लिए मिशन मोड पर काम करने की अपील की। 
जब उनसे पूछा गया कि वह निजी निवेश को कैसे फिर से बढ़ाएंगे तो पूर्व सीईए ने कहा कि इसमें यह जानना ज्‍यादा जरूरी है कि क्या नहीं करना चाहिए।
उन्‍होंने कहा, 'आपको सरकारी तंत्र का इस्तेमाल करके अलग-अलग लोगों को परेशान नहीं करना चाहिए। इनमें निवेशक भी शामिल हैं। आपको किसी खास समूह को दूसरों के मुकाबले ज्‍यादा तरजीह नहीं देनी चाहिए। आपको फैसले लेते समय सभी को साथ लेकर चलना चाहिए।'
सुब्रमण्‍यम के अनुसार, 'निजी निवेश को आकर्षित करने के लिए जितना यह जानना जरूरी है कि क्या करना है, उतना ही यह जानना भी जरूरी है कि क्या नहीं करना है। हमें उन राज्यों से सीख लेनी चाहिए जो निजी निवेश आकर्षित करने में कामयाब रहे हैं। दक्षिण भारत के राज्यों ने चीन से काफी निवेश आकर्षित किया है। चलिए देखते हैं कि वे ऐसा क्या सही कर रहे हैं।' 
और बिगड़ सकते हैं हालात
जब उनसे पूछा गया कि क्या हालात बेहतर होने से पहले और ज्‍यादा बिगड़ेंगे तो सुब्रमण्यम ने कहा कि सरकार को कम से कम इस बात के लिए तैयार रहना चाहिए कि हालात बेहतर होने से पहले और ज्‍यादा बिगड़ सकते हैं- कुछ हद तक युद्ध की वजह से। लेकिन, इसलिए भी क्योंकि कृषि को लेकर भी चिंता बनी हुई है।
उन्‍होंने कहा, 'तापमान बहुत ज्‍यादा है। अल नीनो का असर कम से कम सर्दियों के मौसम में तो जरूर पड़ सकता है। इसलिए, हमें निश्चित रूप से इस बात के लिए तैयार रहना चाहिए कि हालात बेहतर होने से पहले और ज्‍यादा बिगड़ सकते हैं।' 
-Legend News

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