देश में आए दिन मेडिकल लापरवाही की खबरें सामने आती हैं। ऐसे में चिकित्सीय लापरवाही के मामलों में डॉक्टरों और अस्पतालों की जवाबदेही को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा फैसला लिया है। अदालत ने डॉक्टरों को Consumer Protection Act के दायरे से बाहर करने की मांग वाली क्यूरोटिव याचिका को खारिज कर दिया। इस बड़े फैसले लेने के पीछे पांच जजों की पीठ है...जिसमें जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस बीवी नागरत्ना, जस्टिस एमएम सुंदरेश, जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस केवी विश्वनाथन शामिल हैं। आइए जानते हैं....इस फैसले की पूरी बात और लीगल पहलू...
सुप्रीम कोर्ट के सामने Curative Petition, क्यों हुई खारिज
दरअसल...यह याचिका ...मेडिको लीगल सोसायटी की ओर से डॉ. राजीव डी. जोशी ने दायर की थी। इस याचिका के जरिए सर्वोच्च न्यायालय के उपभोक्ता संरक्षण कानून के तहत डॉक्टरों और अस्पतालों की जवाबदेही पर दिए गए 1995 के अपने ऐतिहासिक फैसले को चुनौती दी गई थी जिसमें शीर्ष अदालत ने चिकित्सा सेवाओं को उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम (सीपीए) के दायरे में लाया था।
सुप्रीम कोर्ट में पुराने फैसले, याचिका के तथ्यों और..उपलब्ध दस्तावेजों विचार करने के बाद पांच जजों की पीठ ने कहा कि ऐसा कोई मामला नहीं बनता जो याचिका में हस्तक्षेप की तय कसौटियों को पूरा करता हो।
यहां खास बात यह है कि अदालत ने 1995 के Indian Medical Association v. V.P. Shantha & Others फैसले के मेरिट पर नया फैसला देकर नहीं बदला, बल्कि यह कहा कि 1995 के फैसले के मद्देनजर..याचिका को स्वीकार करने के लिए जरूरी आधार ही नहीं है। 
सुप्रीम कोर्ट और उपभोक्ता हितों का ख्याल
इस पूरे मामले में वर्तमान में तो यही कहना ठीक रहेगा कि Indian Medical Association v. V.P. Shantha & Others, (1995) का फैसले के खिलाफ याचिका खारिज होने से 1995 वाला फैसला ही मान्य है। डॉक्टरों और अस्पतालों की उपभोक्ता कानूनों के प्रति जवाबदेही समाप्त नहीं हुई है। लेकिन एक बात और भी है कि फरवरी 2026 में डॉक्टरों को उपभोक्ता कानूनों के दायरे से बाहर करने की एक अलग याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी किया था और वह प्रश्न अभी भी अलग से शीर्ष अदालत की कार्यवाही में विचाराधीन है। उम्मीद कर सकते हैं कि उसमें भी सुप्रीम कोर्ट उपभोक्ता हितों का भरपूर ख्याल रखेगा। 
मरीजों और डॉक्टरों के लिए इस फैसले का क्या मतलब?
फिलहाल की स्थिति यही है कि आम मरीजों के लिए इसका सबसे बड़ा असर यह होगा कि चिकित्सा सेवाओं में कथित कमी के मामलों में कंज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट के तहत उपलब्ध उपाय बना हुआ है। वे उपभोक्ता कानूनों का सहारा ले सकते हैं। दूसरी ओर, डॉक्टरों के लिए इसका मतलब यह भी नहीं है कि इलाज का हर बेकार परिणाम उपभोक्ता या उपभोक्ता कानूनों के प्रति जवाबदेही पैदा करेगा।
दरअसल कानूनी विवाद में यह देखना जरूरी होगा कि क्या वास्तव में सेवा में कमी, लापरवाही या अन्य कार्रवाई योग्य लापरवाही या चूक हुई है। और क्या उसके समर्थन में पर्याप्त तथ्य एवं साक्ष्य हैं। एक बात यह भी है कि 1995 के फैसले का उद्देश्य चिकित्सा परिणामों की शत प्रतिशत गारंटी बनाना भी नहीं था।
-Legend News

मिलती जुलती खबरें

Recent Comments

Leave A Comment

Don’t worry ! Your Phone will not be published. Required fields are marked (*).