वृंदावन में सनसिटी अनंतम के नाम से डेवलप की जा रही टाउनशिप को नगर निगम मथुरा-वृंदावन द्वारा लेंड एक्सचेंज की आड़ लेकर बेशकीमती जमीन देने की कोशिश का मामला अब निगम के ही गले की फांस बनता दिखाई दे रहा है। 
अरबों रुपए के रियल एस्टेट प्रोजेक्ट के लिए भूमाफिया को जमीन देने का प्रयास भले ही फिलहाल बोर्ड की बैठकों में प्रस्ताव पेश करने से आगे न बढ़ा हो, किंतु नगर निगम के एक नए पत्र से इस बात का खुलासा जरूर हो गया है कि सारी कवायद उस करोड़ों रुपए की रिश्वत को पचाने की खातिर की जा रही है जो शासन में जनप्रतिनिधि और प्रशासन में अधिकारियों की शक्ल लेकर बैठे लोग ले चुके हैं। 
देखें नगर निगम द्वारा बीती 31 जनवरी को जिलाधिकारी मथुरा के नाम लिखा गया पत्र 
जनसुनवाई दिनांक 17 जनवरी 2026 के निस्‍तारण का हवाला देकर लिखे गए इस पत्र के अनुसार दीपक शर्मा पुत्र लक्ष्मीनारायण शर्मा उर्फ ब्रज बिहारीशर्मा निवासी वृंदावन बांगर, तहसील व जिला मथुरा ने मुख्यमंत्री पोर्टल पर एक शिकायत की है। 
शिकायत के मुताबिक नगर निगम मथुरा-वृंदावन द्वारा सनसिटी अनंतम को टाउनशिप डेवलप करने के लिए काफी कम कीमत में अपनी जमीन विनिमय की जा रही है। 
दीपक शर्मा की इसी शिकायत का निस्तारण करते हुए नगर निगम ने जिलाधिकारी मथुरा को जो पत्र लिखा है, वह बताता है कि नगर निगम द्वारा इस संदर्भ में एक जांच कराई गई। जांच में पाया गया कि विनिमय में भूमि की बिक्री नहीं की जाती, अलबत्ता भूमि के मूल्य का आंकलन करके विनिमय किया जाता है। 
नियमानुसार भूमि के विनिमय में सिर्फ 5 प्रतिशत अंतर मान्य है और नगर निगम द्वारा सनसिटी अनंतम को जितनी भूमि देने का प्रस्ताव लाया गया था, उससे अधिक क्षेत्रफल की भूमि नगर निगम को प्राप्त हो रही है। हालांकि प्रश्नगत भूमि का विनिमय अभी स्वीकृत नहीं हुआ है। 
अपर नगर आयुक्त के हस्ताक्षर से जिलाधिकारी को भेजा गया यह पत्र ही न सिर्फ कई गंभीर सवाल खड़े करता है बल्कि यह भी जाहिर कराता है कि किसी न किसी स्तर पर सनसिटी अनंतम के प्रमोटर्स की कोई दुरभि संधि हुई है, जिसका उल्लेख सूत्रों के हवाले से लीजेण्‍ड न्यूज़ अपनी इससे पहली रिपोर्ट में कर चुका है। 
जानिए कैसे? 
शिकायत का निस्तारण करते हुए नगर निगम ने लिखा है- विनिमय के लिए भूमि के मूल्य में सिर्फ 5 प्रतिशत का अंतर मान्य है। 
अब यहीं एक पहला गंभीर सवाल तो यह खड़ा होता है कि ये 5 प्रतिशत का अंतर सनसिटी अनंतम के पक्ष में लाभकारी है या नगर निगम के पक्ष में? 
दूसरा सवाल यह कि करोड़ों रुपए मूल्य की सरकारी जमीन के विनिमय में क्या 5 प्रतिशत का अंतर कोई अहमियत नहीं रखता, और यदि रखता तो नगर निगम ने अब तक साफ क्यों नहीं किया कि उसे सनसिटी के लिए लेंड एक्सचेंज करने में लाभ हो रहा है अथवा हानि?  
तीसरा स्वाभाविक सवाल यह है कि एक सरकारी जमीन के निजी कंपनी के पक्ष में विनिमय की पहल किसने तथा किस स्तर से की? 
चौथा सवाल कि अगर सनसिटी अनंतम की भूमि नगर निगम की भूमि से ज्यादा मूल्यवान है तो वो उसे एक्सचेंज करना क्यों चाहते हैं, और यदि नगर निगम की भूमि अधिक कीमती है तो नगर निगम किस स्‍वार्थ में सनसिटी अनंतम को अपनी जमीन देने का प्रस्ताव लेकर आया? 
पांचवां प्रश्न यह है कि क्या शासन की स्‍वीकृति के बिना जिला प्रशासन की कोई इकाई इस तरह किसी प्राइवेट प्रोजेक्ट के लिए लेंड एक्सचेंज का प्रस्ताव ला सकती है? 
और अंतिम प्रश्‍न कि जब इस भूमि के विनिमय का प्रस्ताव पास ही नहीं हुआ तो सनसिटी अनंतम कैसे इस भूमि पर काबिज हो गया, क्यों व किसके प्रोत्साहन से इस भूमि पर उसने अवैध निर्माण कार्य शुरू करा दिया। जिसकी पुष्‍टि खुद नगर निगम ने अपनी जांच के उपरांत की है तथा जिसे ध्‍वस्त कराने के लिए नगर निगम ने 22 जनवरी 2026 को ही मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण के नाम भी एक पत्र लिखा है। 
इन सब प्रश्नों के अतिरिक्त एक बड़ा अहम प्रश्न यह भी है कि क्या नगर निगम को अपनी ही जमीन को कब्जा मुक्त कराने तथा उस पर किए जा रहे अवैध निर्माण को रोकने तथा ध्वस्‍त कराने के लिए मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण की जरूरत है, क्या नगर निगम के पास अपने ऐसे अधिकार नहीं हैं कि वह अपनी जमीन को भूमाफिया के चंगुल से छुड़ाकर उस पर काबिज हो सके?
 
आपसी सहमति से खेला जा रहा सारा खेल 
दरअसल, हकीकत यह है कि लेंड एक्सचेंज का यह खेल अब तक बाकायदा एक षड्यंत्र के तहत आपसी सहमति से खेला जा रहा था, किंतु जब पहले तो एनजीटी में इसके खिलाफ याचिका दायर हुई और फिर मीडिया में आने के बाद शासन स्‍तर पर शिकायतें होने लगीं तो नगर निगम अपनी गर्दन बचाने की कवायद में जुट गया। 
जरा सोचिए कि जो जमीन सनसिटी अनंतम को देने के लिए नगर निगम बार-बार बोर्ड बैठक में प्रस्ताव लेकर आ रहा था, उस जमीन पर अवैध कब्जा तथा अवैध निर्माण की जानकारी नगर निगम को अब तक क्यों नहीं हुई। और जब हुई है तब भी उसे कब्जा मुक्त कराने तथा अवैध निर्माण ध्‍वस्त कराने के लिए वह चिट्ठी-चिट्ठी क्यों खेल रहा है। वो इसलिए कि बहुत जल्द सारा प्रकरण सुप्रीम कोर्ट की चौखट पर दस्‍तक देने जा रहा है। 
हां! एक बात और कि इस काले कारनामे में मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण भी हर स्तर पर सहभागी है, लिहाजा जब बात निकलेगी तो बहुत दूर तलक जाएगी ही। विकास प्राधिकरण के अधिकारी भी आखिर कब तक खैर मनाने में कामयाब होंगे। आगे-आगे देखिए... होता है क्या? 
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

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