महाभारत नायक योगीराज भगवान श्रीकृष्‍ण की लीला स्थली में डेवलव हो रही 'सनसिटी अनंतम' को यदि MVDA (मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण) के भ्रष्टाचार की अनंत कथा का एक अध्याय कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। 
दूसरे शब्दों में कहें तो इस विश्व प्रसिद्ध धार्मिक नगरी की डेवलपमेंट अथॉरिटी के हर प्रोजेक्ट का आदि और अंत भ्रष्टाचार की एक ऐसी अनंतकथा होता है जिसमें पर्त-दर पर्त 'योगीराज' के आदेश-निर्देशों सहित नियम-कानून की धज्जियां उड़ाई जाती हैं। फिर वह चाहे MVDA का अपना प्रोजेक्ट हो या उसके द्वारा अधिकृत किसी का निजी प्रोजेक्ट। 
डालमिया बाग के गुरू कृपा तपोवन में डेवलपर को अनुचित लाभ पहुंचाने के उद्देश्‍य से की गई अनेक कारस्तानियों के बाद अब मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण ने सनसिटी अनंतम से जुड़े रियल एस्टेट कारोबारियों के हित में वो काम कर दिखाया है जिसकी जांच की जाए तो भ्रष्टाचार की एक ऐसी मिसाल सामने होगी जिसकी सामान्यत: कल्पना करना भी मुश्किल होगा। साधारण शब्‍दों में कहें तो वृंदावन के इस लग्जरी हाउसिंग प्रोजेक्ट के लिए MVDA के खास जिम्‍मेदार अधिकारी ने एक रियल एस्टेट के ''दलाल'' की भूमिका अदा की है। 
दस्तावेज पेश कर रहे हैं MVDA के काले कारनामों की दास्तान 
दरअसल, 31 अगस्त 2024 को उत्तर प्रदेश प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड ने सनसिटी अनंतम का एक औपचारिक निरीक्षण किया। बोर्ड के अधिकारियों ने इस निरीक्षण में पाया कि प्रोजेक्ट के लिए मौके पर न तो कोई पर्यावरण प्रबंधन की योजना थी, न कोई कार्यशील सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट। यहां तक कि कोई ऐसी मशीनरी भी मौके पर उपलब्ध नहीं थी जिससे यह पता लगता हो कि 400 एकड़ से अधिक भूखंड पर प्रस्तावित प्रोजेक्ट के लिए इस तरह की मंशा भी रही हो। 
इन हालातों को देखकर UPPCB ने इस आशय की स्पष्ट अनुशंसा की कि सनसिटी अनंतम नामक हाउसिंग प्रोजेक्ट का अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) अस्वीकृत किया जाए किंतु आश्चर्यजनक रूप से MVDA ने UPPCB की अनुशंसा के उलट चंद दिनों बाद ही 24 सितंबर 2024 को यूपी टाउनशिप पॉलिसी-2023 के तहत इसके लिए लाइसेंस जारी कर दिया जिसका नंबर 1836 है। 
अधिकारियों के ''दलाल'' बन जाने की पुष्टि करता पत्र 
सनसिटी अनंतम को डेवलप कराने के अथक प्रयासों में अधिकारियों की दलाल वाली भूमिका का खुलासा उस पत्र द्वारा होता है जो MVDA के तत्कालीन उपाध्‍यक्ष श्‍याम बहादुर सिंह के हस्ताक्षर से 28 जून 2025 को जिलाधिकारी मथुरा को लिखा गया है और जिसमें डीएम के समक्ष 5.8236 हेक्टेयर भूमि के अधिग्रहण का प्रस्ताव रखा गया है। 
यह पत्र मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण में बेखौफ भष्टाचार का बड़ा सबूत है क्योंकि इसमें नियामक और लाभार्थी के बीच की रेखा को ताक पर रखकर बिल्डर को ही आवेदक बता दिया गया है। 
आरटीआई पर खामोशी भी बहुत कुछ कहती है 
यहां गौर करने वाली बात यह है कि राज्य की एक महत्वपूर्ण इकाई निजी स्‍वार्थ में किस कदर अंधी है कि वह सनसिटी अनंतम के हित में खेले जा रहे इस खेल की कोई जानकारी तक देने को तैयार नहीं है और आरटीआई का इस्तेमाल करने वालों को लगातार गुमराह करती रही है। कुछ आरटीआई का जवाब नहीं दिया जाता तो कुछ को शब्दों के जाल में उलझा दिया जाता है जिससे आवेदनकर्ता थक-हार कर घर बैठ जाए। 
दरअसल, मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण आरटीआई के मामले में एक लंबे समय से इसी रणनीति को अख्तियार किए हुए है और इससे अपने मकसद में सफल होता रहा है। 
चौंकाता है लेन-देन का यह गणित 
रियल एस्‍टेट कारोबार से जुड़े माफिया और डेवलपमेंट अथॉरिटी की कुटिल चालों वाली प्रक्रिया से सामने आने वाला लेन-देन का गणित किसी को भी चौंका सकता है। 
अगर बात करें सनसिटी अनंतम की तो यहां का वर्तमान अनुमानित सर्किल रेट 20 करोड़ रुपए प्रति हेक्टेयर है जबकि डेवलपर की ओर से वर्तमान विक्रय मूल्य रखा गया है 1 लाख रुपए वर्ग मीटर। इस हिसाब से यह मूल्य बनता है लगभग 100 करोड़ रुपए (एक अरब) प्रति हेक्टेयर यानी अधिग्रहण के अधिकतम मूल्य से भी पूरा पांच गुना ज्यादा। संभवत: यही कारण है कि आज हर वो व्‍यक्‍ति रियल एस्टेट के करोबार में उतरने को आतुर रहता है जिसके पास थोड़ा भी पैसा है। 
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता और सनसिटी अनंतम के याचिकाकर्ता की ओर से एनजीटी में पैरवी कर रहे नरेन्‍द्र कुमार गोस्वामी कहते हैं कि भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापना अधिनियम 2013 के तहत निजी कंपनियों के लिए अधिग्रहण हेतु 80% प्रभावित परिवारों की सहमति अनिवार्य है लेकिन इस मामले में सार्वजनिक सुनवाई के अभिलेख सहमति नहीं बल्कि बड़ी आपत्तियाँ और 'असहमति' दर्शाते हैं। 
पहले डालमिया बाग और अब सनसिटी अनंतम के लिए मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण की रियल एस्‍टेट माफिया के साथ साबित होती सांठगांठ यह बताती है कि विकास प्राधिकरण के अधिकारियों को योगी आदित्यनाथ की भ्रष्टाचार को लेकर प्रचारित जीरो टॉलरेंस नीति के सच का पता लग चुका है। 
वह जान गए हैं कि भ्रष्टाचार के खिलाफ ढोल पीटने और उसके खिलाफ पूरी ताकत से खड़े हो जाने में बड़ा फर्क है। यदि ऐसा न होता तो मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण के अनेक कारनामे खुल जाने के बावजूद किसी एक जिम्‍मेदार अधिकारी को तो कठघरे में खड़ा किया जाता। किसी से तो पूछा जाता कि धर्म की नगरी में खुलेआम खेले जा रहे अधर्म के इस खेल का असल खिलाड़ी कौन है और कौन है जो रियल एस्टेट माफिया को संरक्षण देता है। 
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

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