पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में हालात बेकाबू हैं। हजारों प्रदर्शनकारी अपने हक के लिए मैदान में डटे हुए हैं जबकि असीम मुनीर की अगुवाई वाली सेना अपने पुरानी तानाशाही, क्रूर और आजमाए हुए बेरहम तरीकों से इस प्रदर्शन को कुचलने की कोशिश कर रही है। प्रदर्शनकारियों पर खुलेआम गोलियां बरसाई गई हैं और नाकेबंदी कर खाने की सप्लाई रोक दी गई है।
स्थानीय रिपोर्टों के मुताबिक भारत के कश्मीर से पाकिस्तान आए शरणार्थियों के लिए आरक्षित 12 विधानसभा की सीटों को खत्म करने के खिलाफ ये प्रदर्शन शुरू हुआ था जो सरकारी दमन के बाद बेकाबू हो चुका है। प्रदर्शनकारी आटे दाल पर सब्सिडी की मांग कर रहे हैं और सवाल पूछ रहे हैं कि पीओके से निकलने वाली बिजली आखिर उनके लिए ही क्यों महंगी है। पिछले दो महीने से ज्यादा समय से चल रहे प्रदर्शन में 100 से ज्यादा लोग मारे गये हैं और इसके साथ ही असीम मुनीर एक 'शांतिप्रिय' पाकिस्तान बनाने का जो ढोंग रहे थे उसकी भी पोल खुल चुकी है। 
कश्मीर में क्यों शुरू हो चुकी है पाकिस्तान से आजादी की मांग?
पीओके में अब प्रदर्शनकारी आजादी की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि पाकिस्तान जिस 'आजाद कश्मीर' की बात कर रहा है वो दिखावा है और ये 'पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर' यानी पीओके है। दूसरी तरफ पाकिस्तानी अधिकारियों ने 5 जून को एंटी-टेररिज्म कानूनों के तहत प्रदर्शन करने वाली राजनीतिक पार्टी JAAC पर प्रतिबंध लगा दिया। 
JAAC के नेताओं पर देशद्रोह, हिंसा और राज्य की सुरक्षा के लिए नुकसानदेह गतिविधियों में शामिल होने का आरोप लगाया गया। समूह के कुछ नेताओं की गिरफ्तारी के लिए इनाम की घोषणा भी की गई लेकिन इस प्रतिबंध का लोगों को एकजुट होने से रोकने पर कोई खास असर नहीं पड़ा। उल्टा विरोध और बढ़ता ही चला गया।
जम्मू कश्मीर के पूर्व डीजीपी एसपी वैद ने पीओके में चल रहे प्रदर्शन को लेकर बताया कि 'पाकिस्तानी सेना जो नैरेटिव बनाते आई है वो अब सोशल मीडिया के जमाने में नाकाम हो गया है। पाकिस्तान ने बांग्लादेश में ऊर्दू थोपी थी जिससे देश का बंटवारा हो गया और अब पीओके, बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में भी वो क्रूरता से असंतोष को कुचलना चाहती है लेकिन सोशल मीडिया के जमाने में सच्चाई को छिपाना आसान नहीं है।' 
पूर्व डीजीपी एसपी वैद ने कहा 'पाकिस्तानी सेना जिस आजाद कश्मीर की बात करती है वो कोई आजाद कश्मीर नहीं है। वहां पाकिस्तानी सेना का शासन चलता है और इसीलए 100 से ज्यादा लोगों को मार दिया गया है। वहां के लोग अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों से मदद की गुहार लगा रहे हैं लेकिन पश्चिमी देश खामोश है। ऐसा इसलिए क्योंकि पाकिस्तानी सेना को वो एक टूल की तरह इस्तेमाल करते हैं। भारत को लेकर अमेरिका से लेक्चर दिया जाता है लेकिन पाकिस्तानी सेना कत्लेआम कर रही है लेकिन वो लोग चुप्पी साधे बैठे हैं।' 
पीओके में पाकिस्तान के खिलाफ इतना गुस्सा क्यों है?
पीओके में विधानसभा की 45 सीटे हैं जिनमें से 12 सीटें भारत से गये शरणार्थियों के लिए आरक्षित हैं। यहां की कुल आबादी लगभग 50 लाख है और करीब 34 लाख रजिस्टर्ड वोटर हैं। पाकिस्तान ने आरक्षण इसलिए लागू किया था ताकि वो भारत के खिलाफ कश्मीर को लेकर माहौल बना सके लेकिन उसने इन सीटों का इस्तेमाल अपने राजनीतिक प्रभुत्व के लिए करनी शुरू कर दी। लोगों में इसीलिए गुस्सा है। 
इन 12 सीटों पर वे लोग चुनाव लड़ते हैं जो PoK में रहते ही नहीं हैं इसलिए स्थानीय निवासियों का तर्क है कि यह सिस्टम इलाके में रहने वाले लोगों को विधानसभा की एक बड़ी संख्या में सीटों पर चुनाव लड़ने से रोकता है और बाहरी राजनीतिक ताकतों को स्थानीय शासन पर प्रभाव डालने का मौका देता है। JAAC ने मांग की है कि 12 सीटों का आरक्षण खत्म हो और वही लोग चुनाव लड़ें जो यहां रहते हैं। पाकिस्तान ने मांगे खारिज कर दी। 
पाकिस्तानी पंजाब के शोषण से तंग आ चुके स्थानीय लोग
पाकिस्तान ने भारत के नाम पर वर्षों तक पीओके के लोगों को राजनीति में उलझाए रखा लेकिन अब लोग अपनी रोजमर्रा की जिंदगी की बातें करने लगे हैं। यह बात सबसे पहले 2023 में तब साफ हुई जब बिजली के बढ़ते बिलों को लेकर JAAC के नेतृत्व में विरोध-प्रदर्शन शुरू हुए। 2024 में आंदोलन का केंद्र सब्सिडी वाले आटे और बिजली की कम दरों की मांगें थीं जबकि PoK के मीरपुर इलाके में बने मंगला बांध से पनबिजली (हाइड्रोइलेक्ट्रिसिटी) पैदा की जानी थी। 
इस बांध की वजह से बड़े पैमाने पर लोगों को विस्थापित होना पड़ा और इसके बावजूद वहां के निवासियों को बहुत ज्यादा कीमतों पर भी बिजली ठीक से नहीं मिल पा रही थी। यहां की बिजली पाकिस्तानी पंजाब में सप्लाई की जाती है जिसने लोगों का खून खौला दिया है।
एसपी वैद ने कहा कि अब पीओके के लोग भारत जो कश्मीर में विकास कर रहा है उससे तुलना कर रहे हैं। भारतीय कश्मीर में चार इंटरनेशनल एयरपोर्ट हैं, एम्स है, आईआईटी है जो पाकिस्तानी सपने में भी नहीं सोच सकते हैं। यहां हमेशा बिजली रहती है इन्फ्रास्ट्रक्चर का विकास हुआ है लेकिन पीओके में रहने वालों को दो वक्त की रोटी भी नसीब नहीं हो पाती है लेकिन सोशल मीडिया पर सारी बातें आ रही हैं इसीलिए उन्होंने पीओजेके कहना शुरू कर दिया है और पाकिस्तानी सेना 'आजाद कश्मीर' के जाल से बाहर आ चुके हैं। 
पीओके में पाकिस्तान का वर्षों का नैरेटिव हो गया फेल
इस्लामाबाद लंबे समय से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर खुद को कश्मीरी राजनीतिक अधिकारों का रक्षक बताता रहा है। मुजफ्फराबाद और दूसरे कस्बों से आ रही तस्वीरें जिनमें प्रदर्शनकारियों को गोली मारी जा रही हैं उसने उसकी पोल खोलकर रख दी है। पाकिस्तान की असलियत सामने आ गई है। साथ ही पाकिस्तान के नियंत्रण वाले इलाके में शासन-व्यवस्था को लेकर असहज सवाल भी खड़े हो गए हैं। 
यह आंदोलन आगे चलकर एक स्थायी राजनीतिक ताकत बनेगा या नहीं यह तो पक्का नहीं है लेकिन पाकिस्तान में सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच बढ़ती खाई अब सबके सामने आ गई है। मुनीर इससे सबक ले सकते हैं। राजनीतिक सहमति की जगह न तो कोई सैन्य संदेश ले सकता है और न ही जबरदस्ती का बल। बलूचिस्तान से लेकर खैबर पख्तूनख्वा और अब PoK तक कई क्षेत्रीय विद्रोह इस बात का सबूत हैं कि पाकिस्तान का भविष्य अंधकारमय है। 
-Legend News

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