रिपोर्ट : LegendNews
लालू यादव के खिलाफ CBI की प्राथमिकी और आरोपपत्र रद्द करने से SC का इंकार
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय जनता दल (RJD) प्रमुख लालू प्रसाद यादव और उनके परिवार के सदस्यों से जुड़े जमीन के बदले नौकरी के मामले में सीबीआई की प्राथमिकी को सोमवार को रद्द करने से इनकार कर दिया.
यह मामला जस्टिस एमएम सुंदरेश और एन कोटिश्वर सिंह की बेंच के सामने आया. बेंच ने इस स्टेज पर दखल देने में अपनी अनिच्छा जताई, और यादव को ट्रायल के दौरान पहले से मंज़ूरी का मुद्दा उठाने की आज़ादी दी.
बेंच ने कहा कि उसके सामने उठाए गए मुद्दे हैं, पहला, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के सेक्शन 17A का दायरा और प्रयोज्यता, और दूसरा,उसी प्रावधान का भावी अनुप्रयोग और संचालन.
बेंच ने अपने आदेश में कहा, “तथ्यों और हालात को ध्यान में रखते हुए, याचिकाकर्ता को पेश होने से छूट दी जाती है.... याचिकाकर्ता को ट्रायल के समय कानूनी मुद्दा उठाने की भी आज़ादी दी जाती है.”
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि ऐसे कानूनी सवालों के पेंडिंग रहने से ट्रायल की प्रगति नहीं रुक सकती. यादव की तरफ से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने बेंच के सामने दलील दी कि पहले से मंज़ूरी न होने से जांच ही खराब हो गई.
सिब्बल ने कहा कि फाइनल चार्जशीट फाइल की गई थी और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के सेक्शन 19 के तहत संज्ञान फरवरी, 2025 में लिया गया था, जिसके बाद सेक्शन 17A से जुड़ा मुद्दा तुरंत उठाया गया था.
यह तर्क दिया गया कि रेलवे में नियुक्तियों को प्रभावित करने के आरोप मूल रूप से यादव के रेल मंत्री के रूप में आधिकारिक कार्यों से जुड़े थे, और यह धारा 17ए के तहत सुरक्षा को आकर्षित करता है.
सिब्बल ने सवाल किया कि फाइनल चार्जशीट फाइल होने से पहले आपत्ति कैसे उठाई जा सकती थी. यादव की याचिका का विरोध करते हुए एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने तर्क दिया कि इस स्टेज पर याचिका रद्द नहीं की जा सकती और जोर दिया कि याचिका देर से दायर की गई थी, और जांच पहले ही खत्म हो चुकी है.
सिब्बल ने बताया कि हाई कोर्ट ने सेक्शन 17ए को भविष्य में लागू माना था और इसलिए यह उन कथित अपराधों पर लागू नहीं होता, जिनके बारे में कहा जाता है कि वे 2004 और 2009 के बीच हुए थे.
राजू ने तर्क दिया कि यादव के मामले में धारा 17ए लागू नहीं होती, क्योंकि वह कथित लेनदेन के संबंध में न तो निर्णय लेने वाला प्राधिकारी था और न ही सिफारिश करने वाला प्राधिकारी था.
राजू ने कहा, “आज जांच खत्म हो गई है. संज्ञान लिया गया है...कोर्ट के संज्ञान लेने के बाद यह ग्राउंड उठाया गया है.” सिब्बल ने कहा कि केंद्रीय रेल मंत्री के तौर पर उन्होंने आपराधिक साजिश की और यह उनका केस है.
बेंच ने कहा कि सीबीआई कह रही है कि सेक्शन 17ए लागू नहीं होगा और दूसरा प्रावधान लागू होगा. सिब्बल ने पूछा कि दूसरा कौन सा प्रावधान है, उन्होंने कहा कि कोई दूसरा प्रावधान नहीं है. “दूसरा प्रावधान 19 है, जो ट्रायल के समय का है.
यह जांच पड़ताल का समय है. यह पूरी समस्या है, 19 ट्रायल के समय है. यह जांच के स्टेज पर है. सिब्बल ने कहा, "जब तक आपको मंजूरी नहीं मिल जाती, आप किसी मामले की जांच नहीं कर सकते. एक बार आपको मंजूरी मिल जाती है, तो ट्रायल का सवाल आता है. हमें इससे कोई मतलब नहीं है. यही फर्क है", उन्होंने जोर देकर कहा कि इस मामले का फैसला होना चाहिए.
दलीलें सुनने के बाद, बेंच ने कहा कि ट्रायल के दौरान यह सवाल उठ सकता है कि असर औपचारिक रूप से डाला गया था या अनौपचारिक रूप से, और कहा कि ऐसे मामलों पर उसी स्टेज पर बेहतर फैसला होगा.
सिब्बल ने कहा, "इसी मुद्दे पर दूसरे मामले भी पेंडिंग हैं और हमें कोई राहत नहीं मिल रही है. यह सही नहीं है."
इससे पहले दिल्ली हाई कोर्ट ने यादव की केस रद्द करने की अर्जी पर विचार करने से मना कर दिया था, और कहा था कि 2018 में लागू किया गया सेक्शन 17ए, 2004 और 2009 के बीच किए गए कथित अपराधों पर पिछली तारीख से लागू नहीं होता है.
हाई कोर्ट ने यह भी फैसला सुनाया था कि सेक्शन 17ए के तहत प्रोटेक्शन लागू नहीं होगा, क्योंकि कहे गए काम यादव की ड्यूटी निभाते समय ली गई किसी आधिकारिक सिफारिश या फैसले से जुड़े नहीं थे.
गौरतलब है कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के सेक्शन 17ए के तहत, किसी सरकारी कर्मचारी के आधिकारिक काम करते समय लिए गए फैसलों की जांच शुरू करने से पहले पहले से मंज़ूरी लेना ज़रूरी है.
सीबीआई का यह मामला 2004 से 2009 के बीच यादव के केंद्रीय रेल मंत्री रहने के दौरान रेलवे में कथित अनियमित नियुक्तियों से जुड़ा है.
एजेंसी के अनुसार, यादव के परिवार के सदस्यों या सहयोगियों को ट्रांसफर की गई जमीन के बदले ग्रुप-डी की नौकरियां दी गईं. एजेंसी ने मई 2022 में यादव और उनके परिवार के सदस्यों समेत कई अन्य लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया था.
- Legend News

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