सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की ने 7 अगस्त को मक्का में रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। यह एक हद तक नाटो जैसे गुट बनता है। समझौते में कहा गया है कि किसी एक देश पर सशस्त्र हमला तीनों पर अटैक माना जाएगा। हालांकि समझौते में यह साफ नहीं है कि इसे कब लागू किया जाएगा और सदस्य देशों को किस मौके पर क्या प्रतिक्रिया देनी होगी। माना जा रहा है कि पाकिस्तान से रिश्ते को देखते हुए भारत पर इस समझौते का सीधा असर हो सकता है। इजरायली एक्सपर्ट शे गैल का कहना है कि भविष्य के पाकिस्तान-भारत के किसी संघर्ष में सऊदी की भूमिका बहुत अहम होगी। उनका कहना है कि अगला भारत-पाक संघर्ष एक तरह से सऊदी के जरिए ही होगा।
लाइन ऑफ स्टेट के संस्थापक शे गैल ने यूरेशियन टाइम्स में अपने विश्लेषण में मक्का पैक्ट के भारत पर असर को लेकर बात की है। उनका कहना है कि रियाद ने मक्का समझौते जरिए अपने साथ सिर्फ एक और सुरक्षा साझेदार नहीं जोड़ा। बल्कि उसने पाकिस्तान पर हमले को सऊदी अरब की जिम्मेदारी बनाते हुए भारत-पाकिस्तान के किसी भी संभावित टकराव को खाड़ी क्षेत्र की सुरक्षा व्यवस्था के केंद्र में ला खड़ा किया है। 
भारत-पाक संघर्ष में सऊदी अरब
सऊदी अरब के सामने इस्लामाबाद के प्रति अपनी प्रतिबद्धता और दिल्ली के साथ संबंधों के बीच संतुलन बनाने की चुनौती होगी। उसके सामने सवाल होंगे कि क्या यह समझौता तब भी लागू होगा, जब टकराव की शुरुआत पाकिस्तान ने की हो। क्या पाकिस्तान से जुड़ी किसी हरकत पर भारत की जवाबी कार्रवाई को हमला माना जाएगा, जिससे समझौता सक्रिय हो जाए। समझौते को सक्रिय करने की सीमा का निर्धारण कौन करेगा।
भारत संकट से पहले इस पर स्पष्टीकरण की मांग कर सकता है। अगर सऊदी अरब समझौते के दायरे को सीमित करने वाला जवाब देता है तो जोखिम कम हो जाएगा। स्पष्टीकरण देने से इंकार करना अपने आप में एक रणनीतिक जानकारी होगी। किसी तीसरे पक्ष की गारंटी पाकिस्तान को रणनीतिक सुरक्षित पनाहगाह नहीं बनाती। यानी किसी टकराव में सऊदी की भूमिका काफी अहम हो जाती है। 
IMEC पर असर
नई दिल्ली ने रियाद या अंकारा को अपनी कार्रवाई की आजादी पर वीटो का अधिकार नहीं दिया है। भारत अगर इस नतीजे पर पहुंचता है कि उसकी सुरक्षा के लिए पाकिस्तान के खिलाफ कार्रवाई जरूरी है तो मक्का समझौता भारत के फैसले को नहीं बदल सकता। जो साझेदार भारत के मुख्य दुश्मन के प्रति सुरक्षा प्रतिबद्धता को गहरा करता है। वह यह नहीं मान सकता कि भारत से मिलने वाले लाभ तक उसकी पहुंच वैसी ही बनी रहेगी।
भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEC) पर भी इस समझौते का असर हो सकता है। यह कोई रेलवे, बंदरगाह या नक्शे पर खींची गई रेखा नहीं है। यह राजनीतिक स्थिरता के लिए लंबे समय की पूंजीगत प्रतिबद्धता है। यह भारत से उम्मीद करता है कि वह यूरोप से जुड़ने के लिए सऊदी अरब पर मुख्य कड़ी के तौर पर भरोसा करे, जबकि रियाद ने पाकिस्तान की सुरक्षा को अपनी औपचारिक जिम्मेदारियों में शामिल कर लिया है। 
गलियारे की परीक्षा
भारत-पाकिस्तान के बीच अगला संकट इस गलियारे की परीक्षा लेगा। कॉरिडोर कैपिटल के लिए सिर्फ दूरी नहीं बल्कि राजनीतिक स्थिरता भी बहुत मायने रखती है। इसलिए IMEC को 'रिडंडेंसी' (बैकअप या विकल्प) के हिसाब से फिर से डिजाइन किया जाना चाहिए। भारत के बिना IMEC का कोई अस्तित्व नहीं है, इसे सऊदी को भी समझना होगा।
नई दिल्ली अपने साझेदारों के भरोसे के आधार पर राजनीतिक कैपिटल, डिजिटल इंटीग्रेशन, एनर्जी लिंक, डेटा शेयरिंग और लॉजिस्टिकल प्लानिंग को एडजस्ट कर सकती है। सऊदी अरब अगर भारत और यूरोप के बीच भरोसेमंद पुल के तौर पर खुद को स्थापित करता है तो इससे एक वैल्यू बनती है। अगर वह उस पुल में पाकिस्तान से जुड़ी कोई समस्या (लायबिलिटी) ले आता है तो स्थिति अलग हो जाती है। 
भारत का रुख
रियाद ने एक सिक्योरिटी प्रोवाइडर पर निर्भरता कम करने के लिए पाकिस्तान और तुर्की का रुख किया। भारत सऊदी अरब के मामले में यही तरीका अपना सकता है। अमेरिकी सिक्योरिटी फ्रेमवर्क भारत की आर्थिक और समुद्री ताकत, इजरायल की इंटेलिजेंस, खाड़ी देशों से पार्टनरशिप और एक मजबूत IMEC सऊदी अरब को क्षमता तो देंगे लेकिन उसकी अंतिम सुरक्षा किसी बाहरी देश के हाथ में नहीं सौंपेंगे।
इजरायल के साथ संबंधों को सामान्य करने से जुड़ा पूरी तरह सुरक्षित US-सऊदी सिविलियन न्यूक्लियर फ्रेमवर्क रियाद की ओर से पाकिस्तानी न्यूक्लियर अस्पष्टता को दिए जाने वाले महत्व को भी कम कर देगा। दिल्ली ने दुनिया के देशों के साथ रिश्ते बनाने में बरसों लगाए हैं। उसने बिना किसी के सामने अंतिम फैसला सौंपे ये किया है। यही एक 'कनेक्टर' के तौर पर दिल्ली ताकत का आधार है। 
-Legend news

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