रिपोर्ट : LegendNews
राजकुमार राव की 'मालिक' रिलीज, मिर्च-मसाले के बाद भी कहानी फीकी
राजकुमार राव एक ऐसे अभिनेता हैं जिनका नाम आते ही दर्शकों के मन में एक भरोसे की भावना पैदा होती है। एक ऐसा भरोसा कि वह चाहे किसी भी भूमिका में हों, कुछ अलग और प्रभावशाली लेकर आएंगे। मालिक भी इस भरोसे को बड़ी हद तक कायम रखती है, लेकिन पूरी तरह से नहीं। यह 2 घंटे 29 मिनट लंबी गैंगस्टर ड्रामा फिल्म है, जो एक साधारण आदमी के अपराध की दुनिया में फिसलने और सत्ता के शिखर तक पहुँचने की यात्रा को दिखाती है। यह कहानी सिर्फ खून-खराबे और राजनीति की नहीं, बल्कि एक व्यक्ति की इच्छाओं, विश्वासघातों और आत्मा के खोने की प्रक्रिया की भी है।
कहानी: सत्ता की भूख और आत्मा का पतन
मालिक की कहानी 1980 के दशक के प्रयागराज में सेट है। यह एक आम आदमी की यात्रा को दिखाती है, जो अपने जीवन में कुछ बड़ा करना चाहता है। उसकी महत्वाकांक्षाएं, रिश्तों में मिले धोखे और सामाजिक व्यवस्था में व्याप्त भेदभाव उसे धीरे-धीरे अपराध की दलदल में धकेलते हैं। सत्ता की भूख उसे इस कदर अंधा कर देती है कि दोस्त दुश्मन बन जाते हैं और वह खुद को ऐसे मोड़ पर पाता है जहाँ से लौटना मुश्किल होता है।
फिल्म दो हिस्सों में बंटी हुई है। पहले भाग में यह दिखाया गया है कि कैसे नायक संघर्ष करता है, किन-किन रास्तों से होकर वह अपराध की दुनिया में प्रवेश करता है और कैसे वह धीरे-धीरे ताकतवर बनता है। यह भाग उत्साह और जिज्ञासा से भरपूर है। फिल्म का दूसरा भाग नायक के फैसलों के नतीजों पर केंद्रित है, जिसमें दिखाया गया है कि वह कैसे उन फैसलों के बोझ तले दबता चला जाता है। लेकिन यहीं फिल्म की गति धीमी पड़ जाती है और कहानी थोड़ी बिखरने लगती है।
लेखन और निर्देशन
मालिक को लिखा है ज्योत्सना नाथ और पुलकित ने। लेखकों ने एक ऐसी कहानी रचने की कोशिश की है, जो एक्शन, राजनीति, दोस्ती, प्रेम और विश्वासघात जैसे तमाम तत्वों से भरपूर हो। शुरूआती हिस्से में फिल्म काफी मजबूत और आकर्षक लगती है। लेकिन जैसे-जैसे फिल्म आगे बढ़ती है, खासकर मध्यांतर के बाद, उसकी पकड़ कमजोर होती जाती है। फिल्म की लंबाई इसका सबसे बड़ा नुकसान बनती है। ढाई घंटे की कहानी में अगर गति न हो, तो दर्शकों का ध्यान भटकना तय है।
निर्देशक पुलकित का निर्देशन पहले भाग में काफी प्रभावित करता है। उनके कुछ लंबे शॉट्स और सिनेमैटोग्राफी की स्टाइल तालियाँ बटोरने लायक है। प्रयागराज की गलियाँ, सामाजिक तनाव, और हिंसा के दृश्य बेहद वास्तविक लगते हैं। लेकिन दूसरे भाग में निर्देशन भी लेखन की ही तरह असंतुलित हो जाता है। कुछ किरदारों को जैसे सिर्फ नाम भर के लिए रखा गया है। प्रोसेनजीत चटर्जी का किरदार 'दास' बेहद कमज़ोर और अधूरा लगता है, जबकि हुमा कुरैशी का किरदार पूरी तरह गैरज़रूरी लगता है, न तो कहानी में कोई प्रभाव डालता है और न ही उसमें कोई भावनात्मक गहराई है।
लेकिन एक बात जो पुलकित ने बखूबी की है, वह है एक्शन को जोरदार और असली बनाए रखना। फिल्म में कोई बनावटी स्लो-मोशन या ओवरड्रामेटिक एक्शन नहीं है। हर सीन वास्तविक लगता है। खास तौर पर एक दृश्य जहां राजकुमार राव चार लोगों को अपने पीछे लटकाते हुए निकलते हैं – वह दृश्य लंबे समय तक याद रहेगा।
अभिनय: राजकुमार राव का एक और मास्टरक्लास
राजकुमार राव ने अपने करियर में अब तक कई तरह की भूमिकाएं निभाई हैं – चाहे वह एक ईमानदार सरकारी अफसर हो, एक प्यार में पागल प्रेमी, एक अंधा उद्यमी या फिर एक परेशान पत्रकार। मालिक में वह पहली बार पूरी तरह से एक गैंगस्टर के रूप में सामने आते हैं और उन्होंने यह साबित कर दिया है कि वह इस तरह की गंभीर भूमिकाओं में भी उतने ही असरदार हैं। उनकी बॉडी लैंग्वेज, डायलॉग डिलीवरी, चेहरा और आंखों की भाषा – सबकुछ उनके किरदार को गहराई देता है। वह न सिर्फ एक खतरनाक अपराधी लगते हैं बल्कि एक ऐसा इंसान भी दिखते हैं जो कभी भावनाओं से भरा हुआ था लेकिन हालातों ने उसे बर्बाद कर दिया। यह राव के करियर का अब तक का एक सबसे दमदार प्रदर्शन कहा जा सकता है।
मानुषी छिल्लर ने नायक की पत्नी की भूमिका निभाई है। कुछ दृश्यों में उन्होंने अच्छा प्रदर्शन किया है, खासकर रोमांटिक सीन में। लेकिन जब फिल्म भावनात्मक गहराई में उतरती है, तो उनका अभिनय कमजोर पड़ जाता है। एक पत्नी के रूप में जो अपने पति को हर पल मौत के करीब जाते देख रही है, उस भावना को वे परदे पर सही से नहीं उतार पाईं। प्रोसेनजीत चटर्जी, जो कि बंगाली सिनेमा के दिग्गज हैं, यहां एक पुलिस अधिकारी के किरदार में हैं लेकिन यह रोल उनके लिए सही नहीं बैठता। न उनके किरदार में कोई मजबूती है और न ही असर। लगता है जैसे उन्हें जबरन फिल्म में डाला गया हो।
दूसरी ओर, सहायक कलाकारों ने फिल्म को मजबूती दी है। सौरभ शुक्ला हमेशा की तरह शानदार हैं, उनका स्क्रीन प्रेज़ेंस ही काफी होता है। अंशुमान पुष्कर ने राव के दोस्त के रूप में बेहद प्रभावशाली काम किया है। भले ही उनका किरदार ग्रे शेड्स लिए हो, लेकिन वह दर्शकों की सहानुभूति पाने में सफल रहते हैं। स्वानंद किरकिरे भी सीमित स्क्रीन टाइम में यादगार प्रदर्शन करते हैं।
तकनीकी पक्ष
फिल्म का सिनेमैटोग्राफी और प्रोडक्शन डिज़ाइन उच्च स्तर का है। प्रयागराज का 1980 का माहौल, गलियाँ, घर, राजनीतिक सभाएँ, सब कुछ बेहद प्रामाणिक लगता है। बैकग्राउंड स्कोर कहानी को और सघन बनाता है। लेकिन एडिटिंग कमजोर है, खासकर दूसरे भाग में फिल्म खिंचती हुई महसूस होती है।
निष्कर्ष
मालिक कोई क्रांतिकारी गैंगस्टर फिल्म नहीं है, लेकिन यह एक ऐसी फिल्म है जो अपने मुख्य कलाकार के अभिनय और यथार्थवादी प्रस्तुति की वजह से खास बन जाती है। अगर आप गंभीर अपराध आधारित नाटकों के प्रशंसक हैं और एक दमदार परफॉर्मेंस देखना चाहते हैं, तो यह फिल्म आपको निराश नहीं करेगी। फिल्म का लेखन और संरचना इसकी सबसे बड़ी कमज़ोरी है, जबकि राजकुमार राव का अभिनय इसकी सबसे बड़ी ताकत। निर्देशक पुलकित की सोच और शैली सराहनीय है, लेकिन उन्हें कहानी को थोड़ा और कसावट देना चाहिए था।
राजकुमार राव की यह फिल्म उन लोगों के लिए जरूर है, जो कॉन्टेंट ड्रिवन सिनेमा की कद्र करते हैं और किसी एक्टर की अभिनय यात्रा का हिस्सा बनना चाहते हैं। 'मालिक' पूरी तरह से राव की फिल्म है, वह इसमें छाए हुए हैं और यही वजह है कि यह फिल्म देखी जानी चाहिए।
- Legedn News

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