पीएम नरेंद्र मोदी अब भारत के सबसे लंबे समय तक सेवा करने वाले, लोकतांत्रिक रूप से चुने गए प्रधानमंत्री बन गए हैं। उन्होंने नेहरू का रिकॉर्ड तोड़ दिया है। इससे भी अहम बात यह है कि यह इस बात का बड़ा सबूत है कि भारत में लोकतंत्र न सिर्फ बचा रहा, बल्कि फला-फूला भी। साल 1947 में, कई समान रूप से काबिल और समर्पित लोगों के बीच से नेहरू को देश का पहला प्रधानमंत्री चुना गया था और यह चुनाव असाधारण परिस्थितियों में हुआ था। असल में, जनता पर गांधीजी के नैतिक प्रभाव ने ही इस नियुक्ति को पक्का किया था। इसके बाद, नेहरू गांधीजी का आशीर्वाद और आजादी की लड़ाई की साख लेकर 1952 के पहले आम चुनाव में उतरे।
टाइम्स ऑफ इंडिया में लिखे अपने लेख में भारत के पूर्व प्रधानमंत्री एच डी देवगौड़ा ने कहा कि उस समय, कांग्रेस पार्टी का एकछत्र राज था। उसे किसी राजनीतिक चुनौती का सामना नहीं करना पड़ा। हालांकि, आम चुनाव में 53 राजनीतिक पार्टियों ने हिस्सा लिया था, लेकिन उनकी मौजूदगी और असर बहुत कम था। उस दौर से लेकर 2014 में मोदी के पहली बार और 2024 में तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने तक, भारत एक बिल्कुल अलग देश बन गया। आकार, विविधता और अर्थव्यवस्था के मामले में तो यह लगभग पहचान में न आने लायक हो गया। 
यह कहना बहुत आकर्षक है, हालांकि पूरी तरह समझदारी भरा नहीं, कि 2014 या 2024 की तुलना में 1952 में PM चुना जाना आसान था। यहां तक कि जब मैं 1996 में PM बना, तब तक हालात, राजनीतिक पैमाने और मुकाबला पूरी तरह बदल चुके थे। देश अब ज्यादा सवाल पूछने वाला, ज्यादा जुड़ा हुआ और ज्यादा परिपक्व हो गया था।
मेरा कार्यकाल ज्यादा लंबा नहीं था, मैं सिर्फ 11 महीने ही इस पद पर रहा और मुझे हैरानी होती है कि मोदी किस तरह बिना थके शीर्ष पर बने हुए हैं—न तो उनमें कोई थकान दिखती है और न ही उन्हें चुनने वाले लोगों में। पद पर रहते हुए उनकी सहनशक्ति और काम करने की क्षमता वाकई बहुत खास है।
आइए कुछ दिलचस्प आंकड़ों पर नजर डालें जो नेहरू के समय से अब तक आए बड़े बदलावों को दिखाते हैं। अगर सिर्फ राजनीतिक मुकाबले की बात करें, तो 1952 के चुनावों में मैदान में सिर्फ 53 पार्टियां थीं, जबकि 2024 में मोदी का मुकाबला 2,593 पार्टियों से था। नेहरू के समय मतदाताओं की संख्या 17 करोड़ थी, जो 2014 तक बढ़कर 83 करोड़ हो गई। भारत की आबादी, जो 1952 में 34 करोड़ थी, आज 146 करोड़ से ज्यादा है।
एक और बात जिसने मेरा ध्यान खींचा, वह यह है कि नेहरू की कैबिनेट में भारत की सामुदायिक, सांस्कृतिक और जातीय विविधता की झलक नहीं मिलती थी। यहां तक कि जब नेहरू प्रधानमंत्री के तौर पर अपने तीसरे और आखिरी कार्यकाल में थे, तब भी उनकी कैबिनेट में ज्यादातर ऊंची जाति के पुरुष ही थे। नेहरू ने काका केलकर कमीशन की रिपोर्ट को ठुकरा दिया था, जिसमें दबे-कुचले और पिछड़े वर्गों को आरक्षण देने की कोशिश की गई थी। 
पीएम मोदी की मौजूदा कैबिनेट में बहुत विविधता है। इसमें 27 OBC, 10 SC और 5 ST सदस्य हैं। महिलाओं की भागीदारी भी काफी बढ़ी है। मोदी ने अप्रैल 2026 में संसद की संख्या बढ़ाने का प्रस्ताव भी रखा है, ताकि महिलाओं को ऐतिहासिक प्रतिनिधित्व मिल सके और हमारा देश एक बेहतर संघ बन सके। उन्होंने महिला आरक्षण बिल पास करवाना पहले ही सुनिश्चित कर दिया है।
आज का भारत नेहरू के समय के भारत की तुलना में कहीं ज्यादा शोर-शराबे वाला और मुखर लोकतंत्र है। जाति के प्रति जागरूकता, संवैधानिक अधिकार, नागरिक अधिकार, जेंडर के प्रति जागरूकता और पर्यावरण से जुड़ी चिंताएं—इन सभी मामलों में जागरूकता का स्तर बहुत बढ़ गया है। 
नेहरू के समय में भारत में ज्यादातर लोग अनपढ़ थे। साथ ही, लोगों को यह ठीक से पता नहीं था कि लोकतांत्रिक सरकार से क्या उम्मीद की जाए। यह एक नई व्यवस्था थी। आज के नागरिक, देश और लोकतंत्र की भलाई के लिए, ज्यादा पढ़े-लिखे और जागरूक हैं। उनकी नजर से कुछ भी नहीं बचता।
नेहरू को ज्यादा से ज्यादा आधा दर्जन अखबारों से निपटना पड़ता था, लेकिन मोदी को हर पल लाखों लोगों की नजर का सामना करना पड़ता है। ऐसा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की वजह से है, जहां आलोचना बिना जांच-परख के, अनुचित और बहुत कठोर व व्यक्तिगत भी हो सकती है। इसके अलावा, उन्हें मुख्यधारा की प्रेस की चौबीसों घंटे होने वाली आलोचना और कभी-कभी उनके विरोध का भी सामना करना पड़ता है। नेहरू के समय में टेलीविजन पर समाचार नहीं होते थे। 
मैं पीएम मोदी को इस बात के लिए बधाई देता हूं कि उनकी देखरेख में भारत एक मजबूत लोकतंत्र बना हुआ है। भारत को सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था बनाए रखने की उनकी कोशिश, उनकी कल्याणकारी नीतियां और सैन्य टकराव के समय उनके फैसले लेने की क्षमता भी खास तौर पर ध्यान देने लायक हैं। देश के हितों के मामले में उन्होंने कभी कोई समझौता नहीं किया है। 
लेखक- एच डी देवगौड़ा, भारत के पूर्व प्रधानमंत्री

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