पाकिस्तान ने कहा है कि सिंधु जल संधि को अस्थगित करने के भारत के फैसले से सिंधु बेसिन पर निर्भर लाखों लोगों की जिंदगी, उनकी आजीविका और खेती को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं। पाकिस्तान ने इसे पिछले 6 दशकों की सबसे बड़ी चुनौती बताया है। आज जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के 63वें सत्र के दौरान आयोजित एक कार्यक्रम में पाकिस्तान ने सिंधु जल संधि को बहाल करने की गुहार लगाई है। परिषद का मौजूदा सत्र 7 सितंबर से 7 अक्टूबर तक चल रहा है।
यूएनएचआरसी में आयोजित इस कार्यक्रम का शीर्षक 'जल न्याय और जलवायु लचीलापन: दक्षिण एशिया और मध्य पूर्व में सीमा-पार सहयोग को बढ़ावा देना' था। इस कार्यक्रम में कानूनी विशेषज्ञों, शोधकर्ताओं, राजनयिकों, जानकारों और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों ने अंतरराष्ट्रीय जल कानून, मानवाधिकार, जलवायु लचीलापन, पर्यावरणीय न्याय और साझा नदियों के प्रबंधन पर चर्चा की। 
UNHRC में सिंधु जल संधि पर पाकिस्तानी प्रोपेगेंडा
पाकिस्तानी एक्सपर्ट्स ने कहा कि परमानेंट कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन (PCA) जो IWT से जुड़ी कार्यवाही का संचालन करता है उसने तय किया है कि भारत के इसे कुछ समय के लिए रोकने के फैसले के बावजूद संधि लागू रहेगी। भारत ने मध्यस्थता प्रक्रिया को मानने से इनकार कर दिया है जबकि पाकिस्तान ने अदालत के आदेश का हवाला देते हुए कहा है कि यह उसके इस पक्ष का समर्थन करता है कि समझौता अभी भी प्रभावी है। हालांकि भारत ने दो टूक शब्दों में कहा है कि जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद पर लगाम नहीं लगाया ये संधि बहाल नहीं होगी। 
पाकिस्तानी एक्सपर्ट और हाइड्रो-जस्टिस स्टूडेंट रिसर्च एंड पॉलिसी फेलोशिप की फाउंडर और जिनेवा यूनिवर्सिटी में PhD कैंडिडेट रशीदा अब्बास ने कहा 'नदियों को सिर्फ राज्यों के बीच के मामले के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए क्योंकि इनके असर को सीधे लोग और समुदाय महसूस करते हैं।' उन्होंने कहा 'नदियों का अनुभव सिर्फ राज्य नहीं करते बल्कि लोग करते हैं।' उन्होंने जल प्रबंधन को मानवाधिकारों से जोड़ा और बताया कि नदियों से जुड़े फैसले पीने के पानी, खेती, आजीविका, समुदायों और सेहत पर असर डाल सकते हैं। हालांकि उन्होंने पाकिस्तान की तरह से वर्षों से फैलाए जा रहे आतंकवाद पर एक शब्द भी नहीं कहा। 
पानी कोई राजनीतिक हथियार नहीं 
पाकिस्तानी मूल के कानूनी विशेषज्ञ और फेलोशिप कोऑर्डिनेशन ऑफिसर हरमयन मुजाहिद ने जल असुरक्षा को मानवाधिकारों से जुड़ी चिंताओं से जोड़ा। चर्चा में इस बात पर विचार किया गया कि नदियों के बदलते पैटर्न और जलवायु से जुड़े तनाव कमज़ोर समुदायों पर कैसे असर डाल सकते हैं और अंतरराष्ट्रीय जल कानून में राज्य की संप्रभुता के साथ-साथ समानता के सवालों पर विचार करना क्यों जरूरी है। उन्होंने कहा कि पानी को राजनीतिक हथियार नहीं बनाया जा सकता और भारत को संधि बहाल करनी चाहिए। 
-Legend News

मिलती जुलती खबरें

Recent Comments

Leave A Comment

Don’t worry ! Your Phone will not be published. Required fields are marked (*).