पाकिस्तान के ‘दोस्तों’ को अब धीरे-धीरे यह समझ आने लगा है कि इस देश की सरकार और आलाकमान के बस की कुछ नहीं है. वादा निभाना तो बहुत दूर की बात है, ये लोग मदद करने वालों की पीठ में छुरा घोंपने से भी बाज नहीं आते. पिछले दिनों की ही बात देख लीजिए, जंग की मुश्किलों से जूझ रहे यूएई (UAE) ने जब पाकिस्तान से अपना उधार दिया पैसा वापस मांगा तो ये अपने ही ‘अन्नदाता’ को बदनाम करने पर उतर आए. अब चीन का पारा भी पाकिस्तान पर सातवें आसमान पर है. पाकिस्तान में चीनी नागरिकों के साथ जो कुछ हो रहा है, उसकी वजह से बीजिंग के सब्र का बांध टूट चुका है.
चीन-पाकिस्तान के बीच आखिर ऐसा क्या चल रहा है?
चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) चीनी नागरिकों के लिए मुख्य रूप से बढ़ते आतंकवादी हमलों की वजह से खतरनाक बन चुका है. बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA) जैसे समूह CPEC परियोजनाओं का विरोध करते हैं, क्योंकि उनका मानना है कि चीन स्थानीय संसाधनों का शोषण कर रहा है और इसका लाभ वहां की जनता को नहीं मिल रहा. इस विरोध के चलते चीनी इंजीनियरों और श्रमिकों को निशाना बनाकर आत्मघाती हमले किए जा रहे हैं, जैसे 2021 का दासू बस हमला और 2024 में शांगला में हुआ आत्मघाती विस्फोट.
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक 2021 से अब तक आतंकवादी हमलों में कम से कम 20 चीनी नागरिक मारे जा चुके हैं और कई घायल हुए हैं. इसके अलावा, तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) जैसे समूहों की सक्रियता और क्षेत्रीय अस्थिरता ने भी चीनी वर्कर्स के लिए सुरक्षा जोखिम को काफी बढ़ा दिया है लेकिन शहबाज और मुनीर आर्मी इन सबकी रक्षा करने में पूरी तरह के नाकाम साबित हुआ है. 
पाकिस्तान से झुंझलाया चीन 
चीन के बड़े थिंक टैंक ने तो यहां तक दावा कर दिया है कि चीन के भीतर अब पाकिस्तान की इन हरकतों को लेकर जबरदस्त झुंझलाहट साफ दिखने लगी है. चीन के आधिकारिक बयानों में भले ही पाकिस्तान एक ‘रणनीतिक साझेदार’ है लेकिन चीनी जानकारों और शिक्षाविदों के बीच गुस्सा बढ़ रहा है. चीनी जनता अब सीधे पूछ रही है कि क्या पाकिस्तान सरकार उनके नागरिकों की जान बचाने में सक्षम है. 
क्या बोल रहे हैं चीनी एक्सपर्ट्स?
चीनी एकेडमी ऑफ सोशल साइंसेज (CASS) ने बलूचिस्तान को चीनी हितों के लिए दुनिया के सबसे खतरनाक इलाकों में से एक माना है.
पीकिंग यूनिवर्सिटी के शोध के अनुसार, अलगाववादी हिंसा और धार्मिक कट्टरपंथ CPEC प्रोजेक्ट्स के लिए सीधा खतरा बन चुके हैं. आतंकवाद के अलावा भ्रष्टाचार, सरकार और लोकल्स के बीच का तनाव भी CPEC के भविष्य को धुंधला कर रहा है.
दोस्ती अब सिर्फ ‘रिस्क मैनेजमेंट’ का खेल!
चीन अब पाकिस्तान के साथ अपने रिश्तों को जज्बातों के बजाय ‘रिस्क मैनेजमेंट’ के नजरिए से देख रहा है. साल 2026 की एक रिपोर्ट के अनुसार, तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) अब क्षेत्रीय सुरक्षा और चीनी निवेश के लिए सबसे बड़ा खतरा बनकर उभरा है. चीन को डर है कि उसका भारी निवेश कहीं पाकिस्तान की अस्थिरता की भेंट न चढ़ जाए.
क्या टूटने की कगार पर है दोस्ती?
सरकारी स्तर पर भले ही दोनों देश दोस्ती और पार्टनरशिप के दावे करते थकते न हों, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही इशारा कर रही है. सच तो ये है कि चीन, पाकिस्तान को भारत के खिलाफ एक मोहरे की तरह इस्तेमाल करता है. चीन के लिए पाकिस्तान का महत्व सिर्फ रणनीतिक नहीं बल्कि व्यापारिक भी है, अगर कभी समंदर के रास्ते व्यापार में रुकावट आई तो पाकिस्तान का सड़क मार्ग ही चीन के लिए एशिया से जुड़ने का शॉर्टकट रास्ता बनेगा.
लेकिन पेच ये है कि चीन को पाकिस्तान की जरूरत तो है, पर उसे उस पर रत्ती भर भी भरोसा नहीं है. अगर हालात ऐसे ही रहे, तो दोस्ती की कागजी बातें भले चलती रहें, पर CPEC जैसा बड़ा प्रोजेक्ट आपसी खींचतान और बढ़ते आतंकी हमलों की वजह से पूरी तरह ठप हो सकता है. 
-Legend News

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