प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी आज से इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड की यात्रा पर जा रहे हैं। हालांकि ऊपर से देखने पर ये महज एक डिप्लोमेटिक यात्रा नजर आए लेकिन अगर गहराई से देखा जाए तो ये भारतीय प्रधानमंत्री की इंडो-पैसिफिक की रणनीतिक यात्रा लगती है। भारत ने पिछले एक दशक में अपनी इंडो पैसिफिक नीति को बदलते हुए इसे बाहरी देशों से संबंध के लिए समुद्री भूगोल को आधार बना लिया है। 
इंडो-पैसिफिक को लेकर भारत की सोच अब मुख्य रूप से अफ्रीका के पूर्वी तटों से लेकर पश्चिमी प्रशांत तक फैल गया है। भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया के लिए यह एक स्थायी रणनीतिक भूगोल बन चुका है। पीएम मोदी की ये यात्रा जापान की पीएम की दिल्ली यात्रा के ठीक बात हो रहा है जिसको लेकर चीन बौखलाया हुआ है। इसीलिए चीन की तीखी प्रतिक्रिया को देखते हुए मोदी की इस यात्रा को अलग नजरिए से देखे जाने की जरूरत है। मोदी की ये यात्रा भारत के समुद्री भविष्य को आकार देने के लिए है। 
मलक्का, सुंडा, लोम्बोक स्ट्रेट... चीन के खिलाफ चोकप्वाइंट्स
मलक्का, सुंडा और लोम्बोक जलडमरूमध्य- हिंद महासागर और प्रशांत महासागर के बीच के ये तीनों स्ट्रेट मुख्य प्रवेश द्वार हैं। चीन का लगभग 80% ऊर्जा आयात और भारी व्यापार इन्हीं मार्गों से गुजरता है। इन महत्वपूर्ण जलमार्गों पर चीन की निर्भरता की वजह से भारत और उसके सहयोगी देशों को एक मजबूत रणनीतिक बढ़त मिलती है। इस मामले में इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और भारत का 'गठबंधन' काफी ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है। 
भारत के लिए भी जिसका व्यापार और ऊर्जा की आपूर्ति काफी हद तक इन्हीं समुद्री रास्तों पर निर्भर है इंडोनेशिया सिर्फ आसियान (ASEAN) का साझेदार ही नहीं रह जाता है बल्कि इंडो-पैसिफिक क्षेत्र का एक अहम देश भी बन जाता है। पीएम मोदी की ये चौथी इंडोनेशिया यात्रा है जिससे साफ पता चलता है कि भारत इस रिश्ते को कितना महत्व दे रहा है।
सबांग बंदरगाह पर तालमेल- भारत और इंडोनेशिया के बीच सबांग बंदरगाह के रणनीतिक उपयोग पर सहयोग की चर्चा होने की पूरी संभावना है। ये चीन की बढ़ती आक्रामकता के खिलाफ बहुत बड़ा कदम है। यह अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के बहुत करीब है और हिंद महासागर में चीन की पनडुब्बियों की आवाजाही पर नजर रखने में बेहद मददगार है। ये चीन के 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' को सीधा काउंटर करता है। 
क्रिटिकल मिनरल सप्लाई चेन 
दुर्लभ खनिज को लेकर भी इंडोनेशिया की भारत के लिए अहमियत काफी बढ़ जाती है। इंडोनेशिया के दुर्लभ खनिजों पर चीन का 80 प्रतिशत से ज्यादा कंट्रोल है। इंडोनेशिया अब इसमें विविधता लाने की कोशिश कर रहा है और भारत इसमें एक भागीदार बन रहा है। इसलिए स्वच्छ ऊर्जा की तरफ बढ़ने की प्रक्रिया में इंडोनेशिया के साथ सहयोग भारत के लिए और भी महत्वपूर्ण हो गया है। 
भारत-ऑस्ट्रेलिया कितने अहम साझेदार बने?
भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच हुए 'म्यूचुअल लॉजिस्टिक्स सपोर्ट एग्रीमेंट' (MLSA) के तहत भारतीय नौसेना और वायुसेना को ऑस्ट्रेलिया के रणनीतिक कोकोस (कीलिंग) द्वीप समूह (Cocos Islands) और डार्विन बंदरगाह पर सैन्य एक्सेस मिला है। अब भारतीय नौसेना के निगरानी विमान जैसे P-8I डोरनियर और लड़ाकू जहाज ईंधन भरने, मरम्मत और आराम के लिए इस ऑस्ट्रेलियाई बेस का उपयोग कर रहे हैं। ये बताता है कि ऑस्ट्रेलिया और भारत के संबंध कितने मजबूत हो चुके हैं। 
2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी तीसरी बार ऑस्ट्रेलिया जा रहे हैं। भारत और ऑस्ट्रेलिया अमेरिका और जापान के साथ क्वाड के सदस्य भी हैं। पिछले एक दशक में भारत-ऑस्ट्रेलिया संबंधों में जबरदस्त बदलाव आया है। कभी परमाणु नीति को लेकर मतभेदों के कारण दोनों देशों के संबंध काफी सीमित थे। लेकिन आज यह साझेदारी रक्षा, समुद्री सुरक्षा, लॉजिस्टिक्स सहयोग, अहम खनिजों, शिक्षा, स्वच्छ ऊर्जा, टेक्नोलॉजी और व्यापार जैसे क्षेत्रों तक फैल गई है।
कभी ऑस्ट्रेलिया ने भारत पर लगा दिए थे प्रतिबंध
जिस ऑस्ट्रेलिया ने 1998 में भारत के परमाणु परीक्षणों के बाद प्रतिबंध लगा दिए थे वो अब अपनी 'नेशनल डिफेंस स्ट्रैटेजी 2026' में भारत को 'टॉप-टियर सिक्योरिटी पार्टनर' घोषित कर चुका है। यह पहचान 2022 के आर्थिक सहयोग और व्यापार समझौते, 2020 में बनी व्यापक रणनीतिक साझेदारी और क्वाड (Quad) और मालाबार (MALABAR) अभ्यासों के ज़रिए रक्षा सहयोग में तेजी आने का नतीजा है।
इसीलिए ऑस्ट्रेलिया, भारत और इंडोनेशिया के बीच बढ़ता सहयोग इस क्षेत्र में चीन के एकाधिकार को चुनौती देता है और 'स्वतंत्र, खुले और नियम-आधारित' इंडो-पैसिफिक का निर्माण करता है। चीन निश्चित तौर पर इसपर नजर रख रहा होगा और चीन की तरफ से सख्त प्रतिक्रिया आने की संभावना है। 
-Legend News

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