रिपोर्ट : LegendNews
17 मई से 15 जून तक चलेगा ज्येष्ठ अधिक मास, ब्रजधाम में होंगे अनेक धार्मिक मनोरथ
वृन्दावन। पुरुषोत्तम माह के दौरान ब्रजधाम में अनेक धार्मिक मनोरथ आयोजित होंगे। इस वर्ष ज्येष्ठ मास का अधिक महीना है, जो 17 मई से आरम्भ होकर 15 जून तक चलेगा। सनातन वर्षीय अन्य बारह महिनों से उलट इस माह में पहले शुक्ल पक्ष व पीछे कृष्ण पक्ष आएगा। दान - पुण्य एवं पाठ - पूजा के लिए विख्यात पुरषोत्तम माह में जहाँ कई धर्म स्थलों में समूचे साल के उत्सव - महोत्सव मनाए जाएंगे, वहीं बहुत से स्थानों पर कथा - भागवत - प्रवचन इत्यादि के कार्यक्रम भी सम्पन्न होंगे।
श्रीहरिदास पीठाधीश्वर इतिहासकार आचार्य प्रहलाद बल्लभ गोस्वामी महाराज के अनुसार ब्रजमण्डल प्रदेश में इन दिनों पुरुषोत्तम माह महोत्सव के अंतर्गत आयोजित होने वाले विभिन्न धार्मिक मनोरथों की तैयारियां अत्यंत व्यापक स्तर पर चल रहीं हैं। भगवान विष्णु को समर्पित पुरषोत्तम माह को अधिक, लौंद और मल मास भी कहते हैं। इस महिने में प्रायः सभी धर्म केंद्रों में प्रभु के अद्भुत दर्शन व अनुपम सेवा सहित बहुधा प्रकार के धार्मिक - सांस्कृतिक समारोहों का आयोजन किया जाएगा।
उन्होंने बताया कि हालांकि कुछ मंदिरों में लौंद माह में समूचे साल के पर्व - त्यौहार मनाए जाते हैं, लेकिन विश्वविख्यात श्रीबाँकेबिहारी मंदिर में सिर्फ़ दैनिक दर्शन, सामान्य पर्वायोजन एवं विशेष सेवा पूजा का ही विधान है। शुद्ध ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष के पश्चात रविवार 17 मई से पुरुषोत्तम अधिक मास प्रारंभ हो जाएगा, जो 15 जून सोमवार तक चलेगा। इस बीच समस्त आस्था स्थलों पर धार्मिक कार्यक्रमों की धूमधाम छाई रहेगी।
इतिहासकार के मुताबिक अधिक मास में अन्य हिंदू महिनों से उलट पहले शुक्ल पक्ष आएगा, जिसमें श्रीबाँकेबिहारी मंदिर में मंगलवार 26 मई को दशहरा स्नान दानादौपुण्यप्रदा, बुधवार 27 मई को कमला पुरुषोत्तमी एकादशी व्रतम् , गुरुवार 28 मई को प्रदोष व्रतम् , रविवार 31 मई को पूर्णिमा स्नानदानादौ व्रत पूर्वदिने तिथिपर्व आयोजित होंगे। शुक्लपक्ष की समाप्ति के उपरांत 1 जून से पुरुषोत्तम ज्येष्ठ कृष्णपक्ष की शुरुआत होगी। जिसमें गुरुवार 11 जून को कमला पुरुषोत्तमी एकादशी व्रतम् , शुक्रवार 12 जून को प्रदोष तिथि व्रतम् , सोमवार 15 जून को सोमवती अमावस्या स्नानदानादौ मिथुन संक्रान्ति पुण्यकाल पूर्वदिने उत्सव के साथ पुरषोत्तम मास का समापन हो जाएगा।
श्रीहरिदास पीठाधीश्वर आचार्य प्रहलाद बल्लभ गोस्वामी महाराज बताते हैं कि पुरुषोत्तम मास को सनातन धर्म में भगवान विष्णु की आराधना, दान - पुण्य और आध्यात्मिक साधना के लिए अत्यंत पवित्र व फलदायी माना जाता है। यह विशेष महीना हर तीन साल में एक बार आता है और इस दौरान किए गए धार्मिक कार्यों का फल सामान्य महीनों की तुलना में कहीं अधिक प्राप्त होता है। इस महीने को भगवान विष्णु का प्रिय मास माना जाता है, इसीलिए इसे 'पुरुषोत्तम मास' कहा जाता है।
उन्होंने कहा कि यह समय आत्म - शुद्धि, जप - तप और ध्यान - साधना हेतु सर्वोत्तम होता है। कहा जाता है कि इस दौरान श्री कृष्ण या विष्णु जी की भक्ति करने से मोक्ष और समृद्धि की प्राप्ति होती है। पुरातन मान्यतानुसार इस महीने में किया गया दान, विशेषकर अन्न और वस्त्र का दान, कई गुना अधिक पुण्य प्रदान करता है। इस माह में विभिन्न धर्म शास्त्रों का तथा मुख्यतया श्रीमद्भगवद्गीता के पुरुषोत्तम योग अध्याय एवं श्रीमद्भागवत पुराण का पाठ करना अत्यंत शुभ माना जाता है। पुरुषोत्तम मास के दौरान रोज सुबह जल्दी उठकर स्नान, पूजा-पाठ, दीपदान और भगवान की सेवा करनी चाहिए। तीर्थयात्रा और साधु-संतों की सेवा भी बहुत फलदायी है।
नृसिंहावतरण ने प्रदान किया पुरुषोत्तम मास को अस्तित्व
इतिहासकार आचार्य प्रहलाद बल्लभ गोस्वामी कहते हैं कि भगवान विष्णु के चतुर्थ अवतार भगवान नृसिंहदेव के अवतरण ने पुरुषोत्तम मास को अस्तित्व प्रदान किया था। भगवान विष्णु ने साल के बारह महिनों में से किसी में भी हिरण्यकश्यप के ना मरने के ब्रह्मदेव द्वारा दिए गए वरदान की रक्षा करते हुए तेरहवें महिने के रुप में पुरुषोत्तम (अधिक) वैशाख माह की उत्पत्ति की और नृसिंहदेव के स्वरूप में प्रगट होकर भक्तराज प्रहलादजी की रक्षा करने के साथ ही साथ इस धराधाम को दैत्यराज हिरण्यकश्यप के अत्याचारों से मुक्ति दिलाई।
मल मास में नहीं होते मांगलिक कार्य
आचार्य गोस्वामी बताते हैं कि मल मास (अधिक) की सम्पूर्ण अवधि में विवाह, मुंडन, जनेऊ, गृह प्रवेश जैसे मांगलिक या शुभ कार्यों को करने की मनाही होती है। यह महीना भौतिक सुखों के बजाय आध्यात्मिक ऊर्जा को बढ़ाने और ईश्वर के समीप जाने का एक दुर्लभ अवसर होता है।
खगोलीय और वैज्ञानिक आधार भी है अधिक मास का
इतिहासकार के अनुसार पौराणिक महत्व के साथ ही साथ अधिक मास खगोलीय एवं वैज्ञानिक आधार पर भी अत्यधिक पुष्ट है। वैज्ञानिक दृष्टि से, पुरुषोत्तम मास की उत्पत्ति सौर वर्ष और चंद्र वर्ष के बीच के अंतर को संतुलित करने के लिए हुई है। एक सौर वर्ष की अवधि जहाँ लगभग 365 दिन की होती है, वहीं चंद्र वर्ष लगभग 354 दिनों का होता है। इन दोनों के बीच का करीब 11 दिनों का अंतर, हर तीसरे वर्ष एक अतिरिक्त महीना पुरुषोत्तम (अधिक) मास के रूप में जोड़कर बराबर किया जाता है।

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